कानपुर बिकरू कांड: विकास दुबे मुठभेड़ की जांच करेगा तीन सदस्यीय न्यायिक आयोग

कोर्ट ने कहा कि न्यायिक आयोग सभी पहलुओं को देखेगा। आयोग यह भी देखेगा कि गंभीर मुकदमों के रहते दुबे जेल से बाहर कैसे था। आयोग एक हफ्ते में अपना काम शुरू करेगा। कोर्ट ने आयोग को 2 महीने में रिपोर्ट सौंपने का आदेश दिया।

लखनऊ. विकास दुबे मुठभेड़ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस बीएस चौहान के नेतृत्व में तीन सदस्यीय न्यायिक आयोग के गठन पर मुहर लगाई है। इस कमेटी में हाई कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस शशिकांत अग्रवाल और पूर्व डीजीपी केएल गुप्ता शामिल हैं।

तीन सदस्यीय न्यायिक आयोग के गठन-

कोर्ट ने कहा कि न्यायिक आयोग सभी पहलुओं को देखेगा। आयोग यह भी देखेगा कि गंभीर मुकदमों के रहते दुबे जेल से बाहर कैसे था। आयोग एक हफ्ते में अपना काम शुरू करेगा। कोर्ट ने आयोग को 2 महीने में रिपोर्ट सौंपने का आदेश दिया। कोर्ट ने साफ किया कि आयोग के चलते 2-3 जुलाई को मुठभेड़ में मारे गए पुलिसकर्मियों को लेकर चल रहे ट्रायल पर कोई असर नहीं पड़ेगा। केंद्र सरकार आयोग को स्टाफ उपलब्ध कराएगी। कोर्ट ने जांच की निगरानी करने से इनकार कर दिया।

गंभीर मुकदमों के रहते दुबे जेल से बाहर कैसे-

कोर्ट ने कहा कि ये पहलू भी देखा जाए कि मुख्यमंत्री, उप-मुख्यमंत्री जैसे लोगों ने क्या बयान दिए? क्या उनके कहे मुताबिक वैसा ही पुलिस ने भी किया? दरअसल सुनवाई के दौरान याचिकर्ताओं ने एनकाउंटर को लेकर दिये इन बयानों का हवाला देते हुए UP सरकार की मंशा पर सवाल खड़े करते हुए स्वतंत्र जांच की मांग की थी। UP सरकार ने पिछले 17 जुलाई को विकास दूबे एनकाउंटर मामले में सुप्रीम कोर्ट में जवाब दाखिल कर एनकाउंटर को सही बताया था। UP सरकार ने कहा है कि एनकाउंटर को फर्जी नहीं कहा जा सकता। इसे लेकर किसी तरह का संशय नहीं रहे इसके लिए सरकार ने सभी तरह का कदम उठाया है।
इस मामले में दो याचिकाएं दायर की गई थीं। एक याचिका सुप्रीम कोर्ट के वकील अनूप प्रकाश अवस्थी ने दायर की थी। इस याचिका में 2 जुलाई को 8 पुलिस वालों की हत्या के मामले में भी CBI या एसआईटी से जांच कराने की मांग की गई है। अनूप अवस्थी का कहना था कि पुलिस, राजनेता और अपराधियों के गठजोड़ की तह तक पहुंचना ज़रूरी है। दूसरी याचिका NJO पीपुल्स युनियन फॉर सिविल लिबर्टीज ने दायर करके इस एनकाउंटर की न्यायिक जांच की मांग की थी। याचिका में कहा गया था कि त्वरित न्याय के नाम पर पुलिस इस तरह कानून अपने हाथ में नहीं ले सकती है।

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