पुण्यतिथि विशेष: मोहम्मद रफी को सुरों का बेताज बादशाह कहा जाता है, उनकी गायकी की दुनिया दीवानी थी

आज से 40 वर्ष पहले यानी 31 जुलाई को बॉलीवुड का एक ऐसा फनकार हमसे बिछड़ गया जिसकी गायकी के देश ही नहीं दुनिया दीवानी थी, उन्हें हिंदी सिनेमा का सुरों का बेताज बादशाह कहा जाता है। उनकी आवाज जैसे ईश्वर ने बनाई हो।

बॉलीवुड. तुम मुझे यूं भुला न पाओगे… बहारों फूल बरसाओ मेरा महबूब आया है…. ओ दुनिया के रखवाले.. दिल के झरोखों में रखूंगा मैं.. ये दुनिया ये महफिल मेरे काम की नहीं .. क्या हुआ तेरा वादा.. जैसे हजारों सुपरहिट गीत देने वाले फनकार को दुनिया आज भी नहीं भूली। दिल और दिमाग को खुश करने में संगीत बेहद प्रभावशाली है। ऐसे में लाखों दिलों की धड़कन को याद न किया जाए तो फिर संगीत शब्द ही निरर्थक माना जाएगा।

आज मोहम्मद रफी की 40वीं पुण्यतिथि

आज से 40 वर्ष पहले यानी 31 जुलाई को बॉलीवुड का एक ऐसा फनकार हमसे बिछड़ गया जिसकी गायकी के देश ही नहीं दुनिया दीवानी थी, उन्हें हिंदी सिनेमा का सुरों का बेताज बादशाह कहा जाता है। उनकी आवाज जैसे ईश्वर ने बनाई हो। आज हम बात करेंगे हिंदी सिनेमा के महान गायक मोहम्मद रफी की ।

आज मोहम्मद रफी की 40वीं पुण्यतिथि है, 31 जुलाई वर्ष 1980 में रफी ने दुनिया को अलविदा कह दिया था। लेकिन आज भी लाखों करोड़ों प्रशंसक उनके आवाज और गाने के दीवाने हैं। नई गायक पीढ़ीं भी उनके गानों से गुण सीखती है और खुद में ढालने की कोशिश करती है।

बता दें कि हिंदी के अलावा असामी, कोंकणी, भोजपुरी, ओड़िया, पंजाबी, बंगाली, मराठी, सिंधी, कन्नड़, गुजराती, तेलुगू, माघी, मैथिली, उर्दू, के साथ साथ इंग्लिश, फारसी, अरबी और डच भाषाओं में भी मोहम्मद रफी ने गीत गाए हैं ।‌ आपको बता दें कि रफी साहब को गाने की प्रेरणा एक फकीर से मिली थी। दरअसल उनके मोहल्ले में एक फकीर हमेशा गाते हुए आता था।

वह फकीर अक्सर एक ही गाना गाता था पागाह वालियों नाम जपो, मौला नाम जपो। फकीर का ये गाना सुनकर मोहम्मद रफी बचपन में उनके पीछे-पीछे चलने लगते थे। मोहम्मद रफी का जन्म 24 दिसंबर 1924 को अमृतसर में हुआ था। मोहम्मद रफी ने उस्ताद अब्दुल वाहिद खान, पंडित जीवन लाल मट्टू और फिरोज निजामी से शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ली थी।

13 साल की उम्र में मोहम्मद रफी ने गाने गाने शुरू कर दिए थे-

13 साल की उम्र में मोहम्मद रफी ने लाहौर में उस जमाने के मशहूर अभिनेता ‘के एल सहगल’ के गानों को गाकर पब्लिक परफॉर्मेंस दी थी। रफी साहब ने सबसे पहले लाहौर में पंजाबी फिल्म ‘गुल बलोच’ के लिए ‘गोरिये नी, हीरिये नी’ गाना गाया था। उसके बाद मोहम्मद रफी ने मुंबई आकर साल 1944 में पहली बार हिंदी फिल्म के लिए गीत गाया था ।

फिल्म का नाम ‘गांव की गोरी’ था। मोहम्मद रफी ने सबसे ज्यादा डुएट गाने ‘आशा भोसले’ के साथ गाए। रफी अपने समय के सभी सुपर स्टार्स जैसे कि दिलीप कुमार, भारत भूषण, देवानंद, शम्मी कपूर, राजेश खन्ना और धर्मेंद्र की आवाज बने। रफी को ‘क्या हुआ तेरा वादा’ गाने के लिए ‘नेशनल अवॉर्ड’ से सम्मानित किया गया था। उन्होंने करीब 8,000 से ज्यादा गाने गाए है।

मोहम्मद रफी संगीतकार नौशाद, शंकर-जयकिशन, एसडी. बर्मन, ओपी नैय्यर, मदन मोहन जैसे संगीत निर्देशकों की पहली पसंद थे। रफी साहब को 6 बार फिल्मफेयर अवार्ड से भी नवाजा गया था । 1967 में उन्हें भारत सरकार की तरफ से ‘पद्मश्री’ अवॉर्ड से भी सम्मानित किया गया ।

अंतिम यात्रा में तेज बारिश होने के बावजूद प्रशंसकों का उमड़ा जनसैलाब-

आपको बता दें कि 31 जुलाई 1980 को जब महान गायक मोहम्मद रफी ने दुनिया को अलविदा कह दिया था। उस दिन मुंबई में मूसलाधार बारिश हो रही थी। रफी की अंतिम यात्रा में प्रशंसक अपने आप को रोक नहीं पाए। मोहम्मद रफी साहब के कदरदानों का प्यार उस तेज बारिश में भी नहीं रुका और उनके अंतिम दर्शनों के लिए फैन्स दूर-दूर से उनकी अंतिम यात्रा में शरीक होने के लिए आए।

उस वक्त वहां उपस्थित लोगों की नम आंखों के साथ उनकी जुबानें भी यह कह रही थीं कि रफी के जाने का शोक आसमान भी कर रहा है। मोहम्मद रफी एक ऐसे शख्स थे, जिन्हें हर वर्ग, हर मजहब का व्यक्ति चाहता था। क्या सिख, क्या मुस्लिम क्या, क्या हिंदू उनकी अंतिम यात्रा में उनको कांधा देने के लिए हर व्यक्ति शामिल हुआ था।

शंभू नाथ गौतम, वरिष्ठ पत्रकार

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