img

Prabhat Vaibhav,Digital Desk : बिहार की राजनीति में पिछले कई दिनों से जारी सस्पेंस आखिरकार खत्म हो गया है। राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) के प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा एक बार फिर राज्यसभा जाने के लिए तैयार हैं। मंगलवार को एनडीए (NDA) गठबंधन ने उनकी उम्मीदवारी पर आधिकारिक मुहर लगा दी। वे 5 मार्च को पटना में अपना नामांकन पत्र दाखिल करेंगे। दिलचस्प बात यह है कि इसी दिन भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन और शिवेश कुमार भी अपना पर्चा भरेंगे। इस घोषणा के साथ ही उन अटकलों पर विराम लग गया है, जिनमें कहा जा रहा था कि कुशवाहा की पार्टी का भाजपा में विलय हो सकता है या उन्हें इस बार मौका नहीं मिलेगा।

दिल्ली में हाई-प्रोफटेज मीटिंग के बाद बनी बात

उपेंद्र कुशवाहा की उम्मीदवारी को लेकर संशय इसलिए था क्योंकि वे 2024 के लोकसभा चुनाव में काराकाट सीट से हार गए थे। इसके बाद भाजपा ने उन्हें अपने कोटे से राज्यसभा भेजा था, लेकिन उनका कार्यकाल अब समाप्त हो रहा था। शनिवार को दिल्ली में भाजपा के शीर्ष नेतृत्व (अमित शाह और जेपी नड्डा) के साथ हुई मुलाकात के बाद उनकी राह आसान हुई। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी ने भी इस फैसले की पुष्टि करते हुए कहा कि एनडीए पूरी एकजुटता के साथ चुनाव लड़ रहा है।

वोटों का गणित: पांचवीं सीट पर फंसा है पेंच?

बिहार की 5 राज्यसभा सीटों के लिए होने वाले इस चुनाव में एनडीए की राह जितनी आसान दिख रही है, उतनी है नहीं।

नंबर गेम: बिहार विधानसभा में कुल 243 सदस्य हैं। एक सीट जीतने के लिए कम से कम 41 विधायकों का समर्थन जरूरी है।

NDA की ताकत: एनडीए के पास वर्तमान में 202 विधायक (भाजपा-89, जदयू-85, लोजपा-आर-19, हम-5 और रालोमो-4) हैं। इस हिसाब से एनडीए की 4 सीटों पर जीत पक्की है (164 वोट खर्च होने के बाद 38 वोट बचते हैं)।

चुनौती: पांचवीं सीट (उपेंद्र कुशवाहा की सीट) को सुरक्षित करने के लिए एनडीए को 3 अतिरिक्त विधायकों के समर्थन की जरूरत होगी। वहीं, विपक्ष (महागठबंधन) के पास केवल 35 विधायक हैं, जो एक सीट जीतने के लिए भी पर्याप्त नहीं है। ऐसे में माना जा रहा है कि निर्दलीय या विपक्षी खेमे में सेंधमारी (क्रॉस वोटिंग) के जरिए एनडीए पांचों सीटें जीत सकता है।

उपेंद्र कुशवाहा का राजनीतिक कद

उपेंद्र कुशवाहा बिहार के कद्दावर नेता माने जाते हैं। वे पूर्व केंद्रीय राज्य मंत्री रह चुके हैं और बिहार विधानसभा व विधान परिषद के सदस्य भी रहे हैं। 2023 में जदयू से अलग होकर उन्होंने अपनी नई पार्टी 'राष्ट्रीय लोक मोर्चा' बनाई थी। एनडीए में उनकी वापसी और अब राज्यसभा के लिए फिर से चुने जाने को आगामी विधानसभा चुनाव (2027) से पहले लव-कुश समीकरण को साधे रखने की भाजपा की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है।