प्रशांत महासागर के बीच 30 दिनों तक मौत से लड़ा नाविक, टूटी नाव और शार्क के साये में कटीं रातें; रूह कंपा देगी यह दास्तान

प्रशांत महासागर के बीच 30 दिनों तक मौत से लड़ा नाविक, टूटी नाव और शार्क के साये में कटीं रातें; रूह कंपा देगी यह दास्तान

विशाल और अथाह प्रशांत महासागर (Pacific Ocean) के बीच से एक ऐसी खौफनाक और चमत्कारिक कहानी सामने आई है, जिसे सुनकर किसी की भी रूह कांप जाए। एक अकेले नाविक की नाव बीच समंदर में भीषण तूफान के चलते टूट गई, जिसके बाद वह गहरे समंदर में भटक गया। बिना किसी आधुनिक संपर्क साधन, बिना पर्याप्त भोजन और पीने के पानी के, इस नाविक ने पूरे 30 दिनों तक मौत के मुंह में रहकर जिंदगी की जंग लड़ी। जब चारों तरफ सिर्फ खूंखार शार्क मछलियां और लहरों का तांडव था, तब इस शख्स ने हार नहीं मानी और आखिरकार मौत को मात देकर सकुशल वापस लौट आया।

एक भयानक तूफान और बीच समंदर में टूट गया संपर्क 52 वर्षीय अनुभवी नाविक अपनी छोटी नाव लेकर एक द्वीप से दूसरे द्वीप की यात्रा पर निकला था। शुरुआती सफर बेहद शांत था, लेकिन तीसरे दिन अचानक प्रशांत महासागर में मौसम ने करवट ली। चक्रवाती हवाओं और कई फीट ऊंची लहरों ने उसकी नाव को खिलौने की तरह उछाल दिया। इस भीषण तबाही में नाव का मस्तूल (Mast) टूट गया और उसका जीपीएस (GPS) व रेडियो कम्युनिकेशन सिस्टम पूरी तरह तबाह हो गया। नाव में पानी भरने लगा और वह लहरों के सहारे उस दिशा में बहने लगी, जहां दूर-दूर तक किसी इंसानी बस्ती का नामोनिशान नहीं था।

कच्ची मछली और आसमान से बरसे पानी ने बचाई जान जब नाव में मौजूद राशन के कुछ डिब्बे खत्म हो गए, तो असली परीक्षा शुरू हुई। भूख और प्यास से तड़पते हुए नाविक ने जीने के लिए हर मुमकिन कोशिश की। उसने नाव के मलबे से एक नुकीला तार निकाला और उससे छोटी मछलियां पकड़कर उन्हें कच्चा ही चबाना शुरू किया। प्यास बुझाने के लिए उसके पास कोई साधन नहीं था, इसलिए वह रात में गिरने वाली ओस की बूंदों और बारिश के पानी को एक प्लास्टिक की पन्नी में इकट्ठा करता था। कई दिन ऐसे भी बीते जब चिलचिलाती धूप में उसे एक बूंद पानी नसीब नहीं हुआ और वह बेहोशी की हालत में पहुंच गया।

नाव के चारों तरफ मंडराती थीं आदमखोर शार्क इस भयानक सफर का सबसे खौफनाक मंजर तब होता था जब सूरज ढल जाता था। टूटी हुई नाव के नीचे और आसपास दर्जनों आदमखोर शार्क मछलियां तैरती रहती थीं। नाविक ने बताया कि कई बार बड़ी शार्क नाव से आकर टकराती थीं, जिससे ऐसा लगता था कि नाव अभी पलट जाएगी और सब कुछ खत्म हो जाएगा। पूरी-पूरी रात वह जागकर गुजारता था कि कहीं कोई शार्क उस पर हमला न कर दे। अकेलेपन के उस खौफ ने उसे मानसिक रूप से पूरी तरह तोड़ दिया था, लेकिन परिवार से दोबारा मिलने की उम्मीद ने उसे जिंदा रखा।

30वें दिन फरिश्ता बनकर आया मालवाहक जहाज पूरे एक महीने यानी 30 दिनों तक मौत से आंख मिचौली खेलने के बाद, नाविक की किस्मत ने उसका साथ दिया। एक अंतरराष्ट्रीय रूट से गुजर रहे विशाल मालवाहक जहाज (Cargo Ship) के कैप्टन की नजर दूरबीन से इस टूटी हुई नाव पर पड़ी। जहाज के क्रू मेंबर्स ने तुरंत रेस्क्यू ऑपरेशन चलाया और नाविक को समंदर से बाहर निकाला। जब उसे बचाया गया, तब उसका वजन करीब 20 किलो कम हो चुका था और वह ठीक से खड़ा भी नहीं हो पा रहा था। डॉक्टरों के मुताबिक, इतनी विपरीत परिस्थितियों में 30 दिन तक जिंदा रहना किसी चमत्कार से कम नहीं है।

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