post-slider

Apara Ekadashi 2026: कल है पुण्यदायिनी अपरा एकादशी, यहाँ पढ़ें व्रत कथा और इसके अचूक लाभ

Up kiran, Digital Desk : हिंदू धर्म में एकादशी व्रत का विशेष महत्व है, और ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी, जिसे 'अपरा एकादशी' कहा जाता है, अपने नाम के अनुरूप अपार पुण्य देने वाली मानी गई है। साल 2026 में यह शुभ तिथि 13 मई को पड़ रही है। इस दिन व्रत रखने और भगवान विष्णु की विधि-विधान से पूजा करने से बड़े से बड़े पापों का नाश होता है। पद्म पुराण के अनुसार, इस दिन श्रद्धापूर्वक व्रत करने से मनुष्य को वह फल प्राप्त होता है जो कठिन तपस्या और तीर्थों में स्नान से मिलता है।

अपरा एकादशी का पौराणिक महत्व: श्रीकृष्ण और युधिष्ठिर का संवाद

पद्म पुराण में वर्णित कथा के अनुसार, धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से ज्येष्ठ कृष्ण एकादशी के महत्व के बारे में पूछा था। तब भगवान जनार्दन ने बताया कि 'अपरा एकादशी' बड़े-बड़े पापों को नष्ट करने वाली है। ब्रह्महत्या, गोत्र-हत्या, झूठी गवाही, या युद्ध से भागने जैसे पापों से भी यह व्रत मुक्ति दिलाता है। श्रीकृष्ण ने कहा कि जो पुण्य फल सूर्यग्रहण में कुरुक्षेत्र में दान करने से या काशी में शिवरात्रि का व्रत करने से मिलता है, वही फल मात्र अपरा एकादशी का उपवास करने से प्राप्त हो जाता है।

राजा महीध्वज की कथा: कैसे मिली प्रेत योनि से मुक्ति?

ज्योतिषाचार्य विमल जैन के अनुसार, अपरा एकादशी की सबसे प्रचलित कथा राजा महीध्वज से जुड़ी है। प्राचीन काल में महीध्वज नाम के एक धर्मात्मा राजा थे। उनका छोटा भाई वज्रध्वज अत्यंत क्रूर और अधर्मी था। द्वेष के कारण वज्रध्वज ने अपने बड़े भाई महीध्वज की हत्या कर दी और उनके शव को एक पीपल के पेड़ के नीचे दबा दिया।

अकाल मृत्यु के कारण राजा महीध्वज प्रेत बनकर उसी पीपल के पेड़ पर रहने लगे और वहां से गुजरने वाले लोगों को परेशान करने लगे। एक दिन धौम्य ऋषि उस मार्ग से गुजरे और अपने तपोबल से राजा के अतीत को जान लिया। ऋषि ने दयावश राजा की आत्मा को प्रेत योनि से मुक्त करने का निर्णय लिया। उन्होंने स्वयं विधि-विधान से अपरा एकादशी (अचला एकादशी) का व्रत किया और उसका पुण्य फल राजा महीध्वज को अर्पित कर दिया। व्रत के प्रभाव से राजा को प्रेत योनि से मुक्ति मिली और वे दिव्य देह धारण कर स्वर्ग लोक प्रस्थान कर गए।

अपरा एकादशी व्रत के नियम और फल

शास्त्रों के अनुसार, अपरा एकादशी के दिन भगवान वामन (विष्णु जी का स्वरूप) की पूजा की जाती है। इस व्रत को करने वाले व्यक्ति को दशमी की रात से ही नियमों का पालन करना चाहिए।

  • पूजन विधि: एकादशी की सुबह स्नान कर पीले वस्त्र धारण करें और भगवान केशव की फूलों व दीपों से पूजा करें।

  • भोजन निषेध: वेदव्यास जी के अनुसार, एकादशी के दिन अन्न का सेवन वर्जित है।

  • द्वादशी का महत्व: व्रत का पारण अगले दिन यानी द्वादशी को ब्राह्मणों को भोजन कराने और दान देने के बाद ही करना चाहिए।

अचूक फल की प्राप्ति

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, अपरा एकादशी की कथा को पढ़ने या सुनने मात्र से ही सहस्त्र (हजार) गोदान के बराबर फल प्राप्त होता है। यह व्रत न केवल वर्तमान जीवन के कष्टों को दूर करता है, बल्कि मृत्यु के पश्चात विष्णु लोक में स्थान दिलाने में भी सहायक माना गया है।

Tags: