रणबीर कपूर को भगवान श्रीराम के रूप में कभी स्वीकार नहीं कर सकता', लीजेंड के पोते के इस बयान से मचा तड़का
भारतीय सिनेमा और टेलीविजन के इतिहास में जब भी धार्मिक और पौराणिक कथाओं पर आधारित महाकाव्यों का जिक्र किया जाता है, तो रामानंद सागर द्वारा रीतबद्ध किए गए ऐतिहासिक धारावाहिक 'रामायण' का नाम सबसे पहले आदर के साथ लिया जाता है। इस अमर धारावाहिक के हर एक पात्र ने दर्शकों के दिलों में इस प्रकार की गहरी छाप छोड़ी है कि आज भी लोग उन किरदारों को भगवान की तरह पूजते हैं। इन दिनों बॉलीवुड में निर्देशक नितेश तिवारी द्वारा बनाई जा रही मेगा-बजट फिल्म 'रामायण' को लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म है, जिसमें अभिनेता रणबीर कपूर को भगवान श्रीराम के मुख्य किरदार में कास्ट किए जाने की खबरें लगातार सुर्खियां बटोर रही हैं। इसी बीच, मूल रामायण के रचयिता और легенड्री निर्देशक रामानंद सागर के पोते का एक ऐसा तीखा और बड़ा बयान सामने आया है, जिसने फिल्म जगत और सोशल मीडिया पर एक नई बहस छेड़ दी है। उनके इस बयान ने इंडस्ट्री के भीतर चल रही कास्टिंग और पौराणिक किरदारों की मर्यादा को लेकर कई बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं, जिससे फैंस के बीच भी मतभेद साफ देखे जा सकते हैं। इस विस्तृत और खास लेख के माध्यम से आइए जानते हैं कि रामानंद सागर के परिवार के सदस्य ने रणबीर कपूर की कास्टिंग पर क्या आपत्ति जताई है और इसके पीछे के असली कारण क्या हैं।
रामानंद सागर के परिवार का तीखा वार: क्यों रणबीर कपूर को श्रीराम के रूप में देखना पसंद नहीं कर रहे पुराने दिग्गज
भारतीय टेलीविज़न पर रामायण को घर-घर तक पहुँचाने वाले स्वर्गीय रामानंद सागर की विरासत से जुड़े उनके पोते (प्रेम सागर) ने एक इंटरव्यू के दौरान खुलकर अपनी बात रखी और कहा कि वे अभिनेता रणबीर कपूर को भगवान श्रीराम के रूप में कभी भी स्वीकार नहीं कर सकते हैं। उनका यह तर्क है कि भगवान श्रीराम का चरित्र भारतीय संस्कृति में केवल एक काल्पनिक किरदार नहीं बल्कि मर्यादा, त्याग, पवित्रता और आदर्श जीवन का सर्वोच्च प्रतीक है, जिसके लिए एक खास तरह की सात्विक छवि और जीवनशैली की आवश्यकता होती है। आधुनिक समय के अभिनेताओं की व्यक्तिगत छवि, उनकी सोशल लाइफ और फिल्मों में निभाए गए ग्रे या मॉडर्न किरदारों का प्रभाव दर्शकों के मन में इस कदर बसा होता है कि उन्हें अचानक से किसी दिव्य या पौराणिक भूमिका में स्वीकार करना दर्शकों और पारंपरिक सोच वाले परिवारों के लिए बहुत कठिन हो जाता है। यही वजह है कि परिवार के इस सदस्य ने इस बात पर जोर दिया है कि महाकाव्यों पर आधारित फिल्मों में काम करने वाले कलाकारों का चयन करते समय उनकी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा और सात्विक पृष्ठभूमि का बहुत बारीकी से ध्यान रखा जाना चाहिए।
पौराणिक किरदारों के लिए नए और बेदाग चेहरों को मौका देने की मांग क्यों उठा रहे हैं विशेषज्ञ
रामानंद सागर के पोते ने अपने इस बयान में एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात यह भी कही है कि फिल्म मेकर्स को रामायण या महाभारत जैसे महान ग्रंथों पर फिल्म बनाते समय स्थापित और महंगे बॉलीवुड स्टार्स के पीछे भागने के बजाय किसी नए, फ्रेश और पूरी तरह से बेदाग चेहरे को मौका देना चाहिए। जब पर्दे पर कोई ऐसा अभिनेता भगवान राम का किरदार निभाता है जिसकी पुरानी फिल्में या इमेज पूरी तरह से अलग जॉनर की होती है, तो दर्शक उस किरदार के साथ भावनात्मक रूप से जुड़ाव महसूस नहीं कर पाते हैं। इसके विपरीत, यदि किसी नए और थिएटर बैकग्राउंड से आने वाले युवा कलाकार को इस भूमिका के लिए चुना जाए, तो दर्शक उसे बिना किसी पूर्वाग्रह के सीधे भगवान के रूप में स्वीकार कर लेते हैं, जैसा कि अतीत के लोकप्रिय धारावाहिकों में देखने को मिला था। पुराने दौर के कलाकारों अरुण गोविल और दीपिका चिखलिया का उदाहरण देते हुए उन्होंने यह स्पष्ट किया कि उन कलाकारों ने अपने जीवन में भी वैसी ही मर्यादा और सादगी बनाए रखी, जिसके कारण लोग आज भी उन्हें भगवान की तरह सम्मान देते हैं।
बॉलीवुड की मेगा-बजट रामायण फिल्म और उसकी स्टार कास्ट को लेकर चल रहा है भारी विवाद
नितेश तिवारी के निर्देशन में बन रही इस बहुप्रतीक्षित फिल्म 'रामायण' में रणबीर कपूर के अलावा साई पल्लवी (माता सीता के रूप में) और यश (रावण के रूप में) जैसे बड़े कलाकारों के होने की चर्चाएं हैं, जिसे भारतीय सिनेमा की सबसे महंगी फिल्मों में गिना जा रहा है। फिल्म के मेकर्स इस प्रोजेक्ट को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ले जाने के लिए वीएफएक्स और आधुनिक तकनीक का भारी इस्तेमाल कर रहे हैं, ताकि दुनिया भर के दर्शक भारतीय संस्कृति के इस महान इतिहास से रूबरू हो सकें। लेकिन जैसे-जैसे फिल्म की शूटिंग और कास्टिंग से जुड़ी जानकारियां बाहर आ रही हैं, वैसे-वैसे सोशल मीडिया पर एक वर्ग इसका लगातार विरोध भी कर रहा है, और पुराने पारंपरिक मूल्यों की दुहाई दे रहा है। ऐसे संवेदनशील समय में रामानंद सागर के परिवार की तरफ से आया यह बयान इस बहस को और अधिक तेज कर देता है कि क्या कमर्शियल सिनेमा के बड़े सितारों को पौराणिक भूमिकाएं सौंपना उचित है या फिर इसके लिए एक बिल्कुल अलग और पवित्र दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए।
भारतीय संस्कृति और सिनेमा के भविष्य के लिए क्या संदेश देता है यह पूरा विवाद
यह पूरा घटनाक्रम इस बात का आईना है कि भारतीय दर्शक अपने धार्मिक और सांस्कृतिक प्रतीकों के प्रति कितने अधिक संवेदनशील और सजग हैं, और वे किसी भी हाल में अपनी आस्था के साथ समझौता होते देखना पसंद नहीं करते हैं। फिल्म निर्माताओं के लिए यह एक बहुत बड़ा सबक है कि वे केवल बॉक्स ऑफिस के कलेक्शन और स्टार पावर के आधार पर पौराणिक फिल्मों की कास्टिंग न करें, बल्कि दर्शकों की भावनाओं और चरित्र की गरिमा का भी पूरा सम्मान करें। आने वाले समय में जब यह फिल्म सिनेमाघरों में रिलीज होगी, तो बॉक्स ऑफिस पर इसके परिणाम यह तय करेंगे कि जनता ने इस आधुनिक प्रयोग को स्वीकार किया या फिर पुरानी परंपराओं के प्रति अपनी निष्ठा बनाए रखी। फिलहाल, इस बड़े बयान ने बॉलीवुड के गलियारों में हलचल मचा दी है और हर कोई यही सोच रहा है कि क्या रणबीर कपूर पर्दे पर राम के रूप में दर्शकों का दिल जीत पाएंगे या फिर यह विवाद फिल्म की रिलीज से पहले और अधिक तूल पकड़ेगा।