महिला की इस गंभीर समस्या पर डॉक्टर ने बताई हैरान करने वाली असली वजह
महिला स्वास्थ्य और मातृत्व से जुड़े मामलों में कई बार ऐसी चिकित्सीय प्रक्रियाएं और समस्याएं सामने आती हैं, जिनके बारे में खुलकर बात करना समाज में आज भी एक बड़ा वर्जित विषय माना जाता है। स्त्री रोग विशेषज्ञों (Gynecologists) के पास अक्सर ऐसी अनगिनत महिलाएं और युवतियां अपनी गंभीर परेशानियां लेकर पहुंचती हैं, जो गर्भपात या अन्य कारणों के बाद करवाई जाने वाली डीएंडसी यानी गर्भाशय की सफाई (Dilation and Curettage / D&C) प्रक्रिया के बाद से शारीरिक और मानसिक रूप से गहरे संकट में आ जाती हैं। हाल ही में एक महिला ने अपनी ऐसी ही एक बेहद दर्दनाक और उलझन भरी दास्तान साझा करते हुए डॉक्टर से सवाल किया कि जब से उसने अपने गर्भाशय की सफाई करवाई है, तब से उसके पीरियड्स यानी मासिक धर्म का प्रवाह बहुत ज्यादा कम हो गया है और तमाम कोशिशों के बावजूद उसकी प्रेग्नेंसी (Pregnancy) भी नहीं ठहर पा रही है। इस प्रकार की समस्याएं न केवल महिलाओं के शारीरिक स्वास्थ्य को अंदर से खोखला कर देती हैं, बल्कि उनके पारिवारिक जीवन और मातृत्व के सपनों को भी बुरी तरह झकझोर कर रख देती हैं। चिकित्सा विज्ञान और आधुनिक तकनीक के इस दौर में यह जानना बेहद आवश्यक हो गया है कि आखिर गर्भाशय की सफाई के बाद महिलाओं के शरीर में ऐसा क्या परिवर्तन आ जाता है, जो उनके मासिक चक्र और गर्भधारण की क्षमता को सीधे तौर पर प्रभावित करता है।
गर्भाशय की सफाई यानी डीएंडसी प्रक्रिया क्या होती है और इसे मेडिकल जगत में कब जरूरी माना जाता है
किसी भी महिला के शरीर में जब गर्भपात (Miscarriage), अनचाहा गर्भ, अत्यधिक ब्लीडिंग या गर्भाशय के भीतर किसी प्रकार के असामान्य ऊतकों (Tissues) को हटाने की आवश्यकता पड़ती है, तो चिकित्सक डीएंडसी यानी डायलेशन और क्यूरेटेज की प्रक्रिया की सलाह देते हैं। इस मेडिकल प्रक्रिया के दौरान गर्भाशय के मुंह यानी सर्विक्स को थोड़ा चौड़ा करके अंदरूनी परत (Endometrium) की सफाई की जाती है, ताकि संक्रमण या ब्लीडिंग जैसी किसी भी आपातकालीन स्थिति से मरीज को बचाया जा सके। हालांकि, यह एक बहुत ही सामान्य और रूटीन सर्जिकल प्रक्रिया मानी जाती है, जिसे अनुभवी डॉक्टरों की देखरेख में किया जाता है, लेकिन इसके बावजूद यदि इस प्रक्रिया के दौरान थोड़ी सी भी लापरवाही बरती जाए या गर्भाशय की आंतरिक परत को अत्यधिक खुरच दिया जाए, तो इसके परिणाम भविष्य के लिए बहुत घातक साबित हो सकते हैं। अनगिनत महिलाओं को इस बात की पूरी जानकारी नहीं होती है कि उनके शरीर पर इस छोटी सी दिखने वाली सर्जरी का कितना गहरा और दूरगामी असर पड़ सकता है, जिसके कारण वे बाद में हॉर्मोनल असंतुलन और बांझपन जैसी समस्याओं का सामना करने के लिए मजबूर हो जाती हैं।
पीरियड्स का कम होना और प्रेग्नेंसी न ठहरने के पीछे छुपा हुआ सबसे बड़ा कारण एशमैन सिंड्रोम
जब उस महिला ने डॉक्टर को अपनी यह समस्या बताई कि सफाई के बाद से उसके पीरियड्स लगभग न के बराबर हो गए हैं और गर्भधारण नहीं हो रहा है, तो डॉक्टर ने इसके पीछे 'एशमैन सिंड्रोम' (Asherman Syndrome) नामक चिकित्सा स्थिति की ओर इशारा किया। चिकित्सा भाषा में इसे इंट्रासाइनोवाइटर एडहेसंस (Intrauterine Adhesions) भी कहा जाता है, जिसका सीधा मतलब यह होता है कि गर्भाशय की सफाई के दौरान अंदरूनी दीवारों पर अत्यधिक दबाव पड़ने या जख्म हो जाने के कारण वे आपस में चिपक जाती हैं। जब गर्भाशय की दीवारें आपस में चिपक जाती हैं, तो एंडोमेट्रियल परत को विकसित होने के लिए पर्याप्त जगह नहीं मिलती, जिसके कारण मासिक धर्म के दौरान ब्लीडिंग बहुत कम या दुर्लभ हो जाती है। इसके अलावा, भ्रूण (Embryo) को रोपण यानी इम्प्लांटेशन के लिए एक स्वस्थ और साफ गर्भाशय की गुहा (Uterine Cavity) की आवश्यकता होती है, लेकिन एडहेसंस के कारण वहां बच्चे के ठहरने के लिए कोई जगह नहीं बचती, जिससे बार-बार गर्भपात होने लगता है या प्रेग्नेंसी ठहरती ही नहीं है। यह स्थिति उन महिलाओं के लिए किसी सदमे से कम नहीं होती जो भविष्य में मां बनने का सपना देख रही होती हैं, और इसके इलाज के लिए एक बार फिर सेHysteroscopy जैसी उन्नत सर्जरी की जरूरत पड़ सकती है।
इस गंभीर समस्या से बचाव के क्या हैं उपाय और महिलाओं को किन सावधानियों का रखना चाहिए ध्यान
यदि किसी महिला को गर्भाशय की सफाई या किसी अन्य सर्जरी के बाद से पीरियड्स में अचानक भारी कमी महसूस हो रही है या गर्भधारण करने में कठिनाई आ रही है, तो उन्हें इसे बिल्कुल भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। इस प्रकार के लक्षणों के दिखाई देते ही तुरंत किसी अच्छे और अनुभवी स्त्री रोग विशेषज्ञ से मिलकर अल्ट्रासाउंड (Ultrasound) या हिस्ट्रोस्कोपी जांच करवानी चाहिए ताकि समय रहते गर्भाशय के भीतर की स्थिति का पता लगाया जा सके। एशमैन सिंड्रोम जैसी समस्याओं का इलाज संभव है, जिसमें लेप्रोस्कोपिक या हिस्ट्रोस्कोपिक सर्जरी के जरिए चिपकी हुई दीवारों को सावधानीपूर्वक अलग किया जाता है और हॉर्मोनल दवाइयों के माध्यम से गर्भाशय की परत को दोबारा सामान्य बनाया जाता है। महिलाओं को हमेशा यह सलाह दी जाती है कि वे किसी भी प्रकार की सर्जिकल प्रक्रिया करवाने से पहले डॉक्टर से उसके संभावित जोखिमों और दुष्प्रभावों के बारे में खुलकर चर्चा करें और केवल अत्यधिक योग्य सर्जनों से ही अपना इलाज करवाएं। जागरूकता और समय पर सही चिकित्सीय परामर्श ही महिलाओं को इस प्रकार के मानसिक और शारीरिक संकट से सुरक्षित बाहर निकालने का सबसे अचूक साधन है।