एमएमडीआर कानून पर केंद्र पर बरसे सुबोधकांत सहाय: बोले- सिर्फ हेमंत सोरेन की नहीं, हर झारखंडी के स्वाभिमान की बड़ी लड़ाई है
झारखंड की राजनीतिक गलियारों और राष्ट्रीय स्तर पर खनिज अधिकारों को लेकर एक बार फिर घमासान मच गया है। देश के पूर्व केंद्रीय मंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सुबोधकांत सहाय ने केंद्र सरकार की नीतियों और एमएमडीआर (MMDR - Mines and Minerals Development and Regulation) अधिनियम के प्रावधानों को लेकर तीखा हमला बोला है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि वर्तमान में झारखंड के संसाधनों और अधिकारों को लेकर जो परिस्थितियां बनाई जा रही हैं, वह किसी एक व्यक्ति विशेष या पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की व्यक्तिगत कानूनी लड़ाई तक सीमित नहीं है, बल्कि यह राज्य के सवा करोड़ से अधिक झारखंडी नागरिकों के आत्मसम्मान, जल, जंगल, जमीन और खनिज अधिकारों की एक निर्णायक व ऐतिहासिक लड़ाई है। इस बयान के सामने आने के बाद से राज्य की राजनीति में भूचाल आ गया है और पक्ष-विपक्ष के बीच तीखी बयानबाजी का दौर शुरू हो गया है।
क्या है पूरा मामला और क्यों गरमाई है एमएमडीआर कानून पर झारखंड की सियासत?
झारखंड एक ऐसा भूभाग है जो अपनी खनिज संपदा, कोयला, लोहा, अभ्रक और अन्य बहुमूल्य प्राकृतिक संसाधनों के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है। देश के कुल औद्योगिक विकास में झारखंड के खनिजों का बहुत बड़ा योगदान रहा है। लेकिन लंबे समय से यहां की स्थानीय सरकारों और केंद्र के बीच खनन रॉयल्टी, बकाया भुगतान और एमएमडीआर अधिनियम के नियमों को लेकर खींचतान चलती रही है। पूर्व केंद्रीय मंत्री सुबोधकांत सहाय ने आरोप लगाया है कि केंद्र सरकार संवैधानिक संस्थाओं और केंद्रीय एजेंसियों का इस्तेमाल करके झारखंड के संसाधनों पर परोक्ष रूप से नियंत्रण स्थापित करने और राज्य के खनिज अधिकारों को दबाने का प्रयास कर रही है। उनका तर्क है कि जब भी झारखंड के हक और बकाया राशि की मांग मुखर रूप से उठाई जाती है, तब-तब इस प्रकार के राजनीतिक और कानूनी अवरोध खड़े कर दिए जाते हैं, जिससे राज्य के विकास की गति प्रभावित होती है।
सुबोधकांत सहाय का कड़ा बयान: 'झारखंड की खनिज संपदा और अस्मिता पर प्रहार बर्दाश्त नहीं'
रांची में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस और राजनीतिक सभा के दौरान सुबोधकांत सहाय ने केंद्र सरकार पर जमकर निशाना साधते हुए कहा कि झारखंड की जनता अपने अधिकारों के लिए जागरूक हो चुकी है। उन्होंने जोर देकर कहा कि झारखंडी अवाम अपनी जल, जंगल और जमीन की हिफाजत करना अच्छी तरह जानती है। हेमंत सोरेन के पक्ष में और उनके समर्थन में बोलते हुए उन्होंने कहा कि यदि देश के संघीय ढांचे (Federal Structure) में किसी राज्य के मुख्यमंत्री या उसकी जनता को उनके जायज अधिकारों के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है, तो यह लोकतंत्र के लिए एक चिंता का विषय है। उन्होंने जनता से आह्वान किया कि इस घड़ी में सभी को दलीय सीमाओं से ऊपर उठकर झारखंड की अस्मिता की रक्षा के लिए एकजुट होना होगा, क्योंकि यह लड़ाई सिर्फ एक नेता की नहीं बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य की है।
विपक्षी दलों की प्रतिक्रिया और राज्य में बढ़ती राजनीतिक सरगर्मी
सुबोधकांत सहाय के इस तीखे बयान के बाद झारखंड के राजनीतिक दलों में जुबानी जंग तेज हो गई है। एक तरफ जहां झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) और कांग्रेस के नेताओं ने इस बयान का समर्थन करते हुए केंद्र पर सौतेला व्यवहार करने का आरोप लगाया है, वहीं दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने पलटवार करते हुए कहा है कि संवैधानिक मामलों और भ्रष्टाचार के कानूनी पहलुओं को राजनीतिक रंग देना विपक्ष की पुरानी आदत है। भाजपा नेताओं का कहना है कि कानून अपना काम कर रहा है और केंद्र सरकार ने हमेशा झारखंड के विकास के लिए बिना किसी भेदभाव के पूरा सहयोग दिया है। बहरहाल, इस बयान के बाद आने वाले दिनों में राज्य के भीतर खनन अधिकारों और केंद्रीय नीतियों को लेकर राजनीतिक पारा और अधिक चढ़ने के आसार हैं।
जनता के अधिकार और खनिज नीति: एक दूरगामी बहस
यह पूरा प्रकरण केवल तात्कालिक राजनीतिक बयानों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका संबंध देश की खनिज नीतियों और राज्यों की स्वायत्तता से जुड़ा हुआ है। भारत जैसे विकासशील देश में जहां खनिज बहुल राज्य अपनी आर्थिक मजबूती के लिए राजस्व और रॉयल्टी पर निर्भर रहते हैं, वहां एमएमडीआर कानून के तहत नियमों का पालन और अधिकारों का बंटवारा बेहद संवेदनशील मुद्दा बन जाता है। विश्लेषकों का मानना है कि जब तक केंद्र और राज्य सरकारों के बीच इस तरह के नीतिगत मतभेद बने रहेंगे, तब तक स्थानीय मुद्दों पर राजनीति होती रहेगी। आने वाले समय में देखना यह होगा कि झारखंड के इन ज्वलंत मुद्दों पर राष्ट्रीय स्तर पर क्या रुख अपनाया जाता है और जनता इस राजनीतिक संघर्ष को किस रूप में लेती है।