भाद्रपद मासिक शिवरात्रि 2026: 9 या 10 सितंबर कब है सही व्रत तिथि? जानिए पूजा का शुभ मुहूर्त

भाद्रपद मासिक शिवरात्रि 2026: 9 या 10 सितंबर कब है सही व्रत तिथि? जानिए पूजा का शुभ मुहूर्त

सनातन धर्म में देवाधिदेव महादेव भगवान शिव की आराधना के लिए हर माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मासिक शिवरात्रि के रूप में अत्यंत पवित्र और फलदायी माना जाता है। इस बार भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष की मासिक शिवरात्रि को लेकर देश भर के शिव भक्तों के मन में संशय बना हुआ है कि यह व्रत 9 सितंबर 2026 को रखा जाएगा या 10 सितंबर 2026 को। पंचांग के सटीक गणना और वेध के अनुसार, मासिक शिवरात्रि का व्रत मुख्य रूप से रात्रि की बेला और निशीथ काल से जुड़ा होता है, जिसके कारण तिथियों के फेर को लेकर अक्सर असमंजस की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। इस विशेष और विस्तृत लेख के माध्यम से आइए जानते हैं भाद्रपद मास की मासिक शिवरात्रि की बिल्कुल सटीक तिथि, पूजा का शुभ मुहूर्त, निशीथ काल का समय और इस दिन लगने वाले भद्रा काल से जुड़ी सभी जरूरी बातें।

भाद्रपद मासिक शिवरात्रि 2026 की सही तिथि और चतुर्दशी का समय

पंचांगीय गणना के अनुसार, इस वर्ष भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि 9 सितंबर 2026, बुधवार को दोपहर 12 बजकर 32 मिनट पर आरंभ हो रही है। यह चतुर्दशी तिथि अगले दिन यानी 10 सितंबर 2026, गुरुवार को सुबह 10 बजकर 35 मिनट तक मान्य रहेगी। चूंकि मासिक शिवरात्रि की मुख्य पूजा प्रदोष काल और विशेषकर मध्य रात्रि यानी निशीथ काल में की जाती है, इसलिए उदयातिथि या दिन के सूर्योदय से अधिक महत्व रात्रि की व्याप्ति का होता है। नौ सितंबर की रात को चतुर्दशी तिथि पूरी तरह से मौजूद रहेगी और निशीथ काल के समय को स्पर्श करेगी, जिसके चलते शिव भक्तों को 9 सितंबर 2026 को ही मासिक शिवरात्रि का व्रत रखना और भगवान भोलेनाथ की पूजा-अर्चना करना शास्त्र सम्मत और पूरी तरह से उचित माना गया है।

निशीथ काल पूजा का शुभ मुहूर्त और महादेव की आराधना का महत्व

शिव पुराण के अनुसार, मासिक शिवरात्रि के दिन भगवान शंकर की पूजा के लिए निशीथ काल (मध्य रात्रि का समय) को सबसे अधिक शक्तिशाली और पवित्र माना जाता है। इस बार 9 सितंबर की रात को निशीथ काल का शुभ मुहूर्त लगभग रात 11 बजकर 53 मिनट से शुरू होकर 10 सितंबर की तड़के 12 बजकर 40 मिनट तक रहेगा। इस 48 मिनट की अवधि में जो साधक सच्चे मन से शिवलिंग का जलाभिषेक, रुद्राभिषेक और पंचाक्षर मंत्र 'ॐ नमः शिवाय' का जाप करते हैं, उनकी समस्त मनोकामनाएं पूरी होती हैं और जीवन के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं। इस दौरान शिव मंदिर में या अपने घर के पूजा स्थल पर दूध, दही, घी, शहद, गंगाजल और बेलपत्र अर्पित करके विधिवत पूजा करने से विशेष आध्यात्मिक ऊर्जा की प्राप्ति होती है।

क्या है भद्रा काल का साया और इसका पूजा पर क्या रहेगा प्रभाव

अक्सर व्रत और त्योहारों के दौरान भद्रा काल को लेकर लोगों के मन में डर या संशय बना रहता है कि इसका शुभ कार्यों पर कोई नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा या नहीं। ज्योतिषीय जानकारों का यह स्पष्ट करना है कि मासिक शिवरात्रि का व्रत पूरी तरह से चंद्र आधारित और रात्रि कालीन साधना पर केंद्रित होता है, इसलिए सामान्य पंचांगीय चेतावनियों का सीधा असर महादेव की रात्रि पूजा पर नहीं पड़ता है। हालांकि, यदि दिन के समय किसी विशेष मांगलिक या शुभ कार्य को करने से पहले भद्रा के समय का ध्यान रखना आवश्यक होता है, लेकिन शिव आराधना और रात्रि जागरण में भगवान शिव के स्मरण मात्र से सभी प्रकार की बाधाएं और नकारात्मक ऊर्जाएं स्वतः ही समाप्त हो जाती हैं। भक्तों को पूरी श्रद्धा और बिना किसी मानसिक संशय के केवल अपने आराध्य की भक्ति में लीन रहना चाहिए।

व्रत के नियम, चार प्रहर की पूजा और व्रत पारण का सही समय

मासिक शिवरात्रि का व्रत रखने वाले को पूरे दिन उपवास या फलाहार रखते हुए संयम और ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। जो लोग अत्यधिक कठिन व्रत रखना चाहते हैं वे रात्रि के चारों प्रहर में अलग-अलग द्रव्यों से शिव जी का अभिषेक करते हैं, जिसमें पहले प्रहर में जल, दूसरे प्रहर में दही, तीसरे प्रहर में घी और चौथे प्रहर में शहद से अभिषेक करने का विधान बताया गया है। व्रत का पारण अगले दिन यानी 10 सितंबर की सुबह सूर्योदय के बाद और चतुर्दशी तिथि की समाप्ति से पहले स्नान करके भगवान को भोग लगाने के बाद किया जाता है। भाद्रपद मास की यह मासिक शिवरात्रि पितृपक्ष और आगामी बड़े त्योहारों से ठीक पहले आती है, इसलिए मानसिक शांति और पापों के नाश के लिए इस व्रत को अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है।

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