यमन के हूती विद्रोहियों के हमलों के बीच पाकिस्तानी सेना का बड़ा बयान
मध्य पूर्व यानी मिडिल ईस्ट (Middle East) के भू-राजनीतिक गलियारों से एक बेहद सनसनीखेज और चौंकाने वाली खबर सामने आ रही है, जिसने पूरी दुनिया के रक्षा विशेषज्ञों के कान खड़े कर दिए हैं। यमन के कुख्यात और आक्रामक हूती विद्रोहियों द्वारा लगातार खाड़ी देशों और रणनीतिक ठिकानों पर किए जा रहे मिसाइल व ड्रोन हमलों के बीच अब पाकिस्तानी सेना की तरफ से एक बहुत बड़ा और आक्रामक बयान जारी किया गया है। इस बयान में पाकिस्तानी सैन्य प्रतिष्ठान ने दो टूक शब्दों में यह ऐलान किया है कि उनका देश खाड़ी के अपने सबसे पुराने और भरोसेमंद सहयोगी सऊदी अरब की संप्रभुता और सुरक्षा की रक्षा करने के लिए किसी भी हद तक जाने को पूरी तरह से तैयार है। यह बयान ऐसे समय में सामने आया है जब यमन के हूती विद्रोही लगातार सऊदी अरब और उसके पड़ोसी क्षेत्रों को निशाना बना रहे हैं, जिससे पूरे क्षेत्र में युद्ध का खतरा मंडरा रहा है। पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच रक्षा सहयोग का इतिहास पुराना रहा है, लेकिन इस बार पाकिस्तानी सेना द्वारा जिस आक्रामक लहजे में यह प्रतिबद्धता दोहराई गई है, उससे राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या पाकिस्तान अब सीधे तौर पर हूतियों के खिलाफ इस भीषण क्षेत्रीय संघर्ष में कूदने जा रहा है और इसके वैश्विक कूटनीति पर क्या गंभीर परिणाम होंगे।
सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच दशकों पुराने रक्षा संबंध और रणनीतिक समझौतों का इतिहास
पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच कूटनीतिक और सैन्य संबंधों की जड़ें बहुत गहरी हैं, और दोनों देशों ने समय-समय पर एक-दूसरे की आंतरिक व बाहरी सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इतिहास गवाह है कि जब भी सऊदी अरब की सीमाओं या उसके तेल प्रतिष्ठानों पर कोई बाहरी खतरा मंडराया है, तो रियाद के हुक्मरानों ने हमेशा इस्लामाबाद की तरफ मदद का हाथ बढ़ाया है। पाकिस्तानी सेना के प्रशिक्षित सैनिक और रक्षा विशेषज्ञ लंबे समय से सऊदी अरब की सेना को ट्रेनिंग देने और वहां की सामरिक सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने में अहम योगदान देते रहे हैं। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में यमन गृहयुद्ध और हूती विद्रोहियों के बढ़ते हमलों के बाद से मध्य पूर्व की राजनीति काफी जटिल हो चुकी है, जहां एक तरफ ईरान समर्थित हूती संगठन लगातार खाड़ी देशों पर दबाव बना रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ पाकिस्तान जैसे देशों के लिए यह संतुलन बनाना बहुत कठिन होता जा रहा है कि वे किस हद तक इस प्रत्यक्ष सैन्य संघर्ष में शामिल हों। ताजा बयान के बाद यह साफ होता नजर आ रहा है कि पाकिस्तान अपनी आर्थिक मजबूरियों के बावजूद खाड़ी के इस पारंपरिक और वित्तीय रूप से बेहद मजबूत सहयोगी के साथ अपने रणनीतिक रिश्तों को किसी भी कीमत पर कमजोर नहीं होने देना चाहता है।
यमन के हूती विद्रोहियों के बढ़ते मिसाइल हमले और मध्य पूर्व में मंडराता महाविनाश का खतरा
यमन के हूती विद्रोही पिछले कुछ समय से जिस आक्रामक रुख के साथ सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और लाल सागर के सामरिक जलमार्गों पर लगातार ड्रोन और बैलिस्टिक मिसाइल हमले कर रहे हैं, उसने अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नींद उड़ा दी है। ईरान समर्थित इन विद्रोहियों की मंशा खाड़ी देशों की अर्थव्यवस्था को अस्त-व्यस्त करने और वैश्विक तेल आपूर्ति श्रृंखला को बाधित करने की रही है, जिससे अमेरिका और उसके पश्चिमी सहयोगी भी लगातार चिंतित नजर आते हैं। जब किसी संप्रभु राष्ट्र के ऊपर इस प्रकार के लगातार आतंकवादी और सामरिक हमले होते हैं, तो वहां की सरकारें अपनी रक्षा के लिए हर संभव कूटनीतिक और सैन्य विकल्प तलाशने पर मजबूर हो जाती हैं। सऊदी अरब जैसे देश अपनी आधुनिक वायु रक्षा प्रणालियों (Air Defense Systems) के जरिए इन हमलों को नाकाम तो कर रहे हैं, लेकिन लगातार बन रहे युद्ध जैसे हालात ने पूरे मिडिल ईस्ट को एक बार फिर बारूद के ढेर पर ला खड़ा किया है। ऐसे में पाकिस्तानी सेना का यह ताजा बयान इस बात का संकेत देता है कि यदि हूती विद्रोही अपनी हरकतों से बाज नहीं आए, तो सऊदी अरब के समर्थन में पाकिस्तान अपनी सेना के बड़े दस्तों को मैदान में उतारने से भी पीछे नहीं हटेगा, जिससे इस संघर्ष का दायरा और अधिक व्यापक हो सकता है।
पाकिस्तानी सेना के इस आक्रामक बयान के भू-राजनीतिक और क्षेत्रीय कूटनीति पर पड़ने वाले दूरगामी असर
पाकिस्तान की घरेलू अर्थव्यवस्था इस समय गंभीर दौर से गुजर रही है और वह खुद अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के कर्ज तथा भारी महंगाई से जूझ रहा है, ऐसे में किसी बाहरी युद्ध में सीधे तौर पर उलझना इस्लामाबाद के लिए आर्थिक सुसाइड जैसा साबित हो सकता है। इसके बावजूद, पाकिस्तानी सेना द्वारा इस तरह के बड़े और कड़े बयान देने के पीछे कई छिपे हुए कूटनीतिक और आर्थिक निहितार्थ हो सकते हैं, जिनमें सऊदी अरब से मिलने वाले भारी वित्तीय पैकेज, तेल रियायतें और विदेशी मुद्रा भंडार की जरूरतें सबसे अहम मानी जाती हैं। विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान अपनी सरजमीं पर आर्थिक संकट से जनता का ध्यान भटकाने और अपनी सेना की ताकत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दिखाने के लिए ऐसे बयानों का इस्तेमाल करता है। हालांकि, कूटनीतिक मोर्चे पर यह देखना बेहद दिलचस्प और चिंताजनक होगा कि क्या पाकिस्तान केवल जुबानी जमाखर्च कर रहा है या वाकई वह यमन के हूतियों के खिलाफ सऊदी अरब के साथ कंधे से कंधा मिलाकर किसी प्रत्यक्ष सैन्य अभियान का हिस्सा बनता है। यदि पाकिस्तान इस जंग में सीधे रूप से कूदता है, तो इससे ईरान और अन्य क्षेत्रीय ताकतों के साथ उसके संबंधों में भारी खटास आ सकती है, जिससे पूरे एशियाई और खाड़ी क्षेत्र का शक्ति संतुलन पूरी तरह से बदल जाएगा।