अंटार्कटिका में बर्फ पिघलने का बड़ा खतरा! दुनिया के पास तबाही से बचने के लिए बचे हैं इतने साल
जलवायु परिवर्तन के कारण दुनिया भर के वैज्ञानिकों की चिंताएं लगातार बढ़ती जा रही हैं, और इस बार चेतावनी सीधे पृथ्वी के सबसे ठंडे और बर्फीले महाद्वीप अंटार्कटिका से आई है। ग्लोबल वार्मिंग के चलते अंटार्कटिका में तेजी से पिघलती बर्फ ग्लोबल सी-लेवल (समुद्र के जलस्तर) में भारी उछाल ला सकती है, जिससे दुनिया के तटीय शहर भारी खतरे में आ सकते हैं। हालिया वैज्ञानिक अध्ययनों और जलवायु रिपोर्ट्स में यह बात सामने आई है कि यदि समय रहते कार्बन उत्सर्जन और वैश्विक तापमान वृद्धि को नियंत्रित नहीं किया गया, तो मानवता के पास इस तबाही से निपटने के लिए बेहद कम समय बचा है।
वैज्ञानिकों की चेतावनी: अनियंत्रित रूप से पिघल रहा है महाद्वीप
अंटार्कटिका और ग्रीनलैंड की बर्फ पर लगातार नजर रख रहे शोधकर्ताओं का कहना है कि तापमान में हो रही लगातार वृद्धि अब 'टिपिंग पॉइंट' (विनाशकारी मोड़) के करीब पहुंच रही है। इस बिंदु पर पहुंचने के बाद बर्फ के तेजी से टूटने और पिघलने की प्रक्रिया को रोकना इंसानी बस के बाहर हो जाएगा। अंटार्कटिका के विशाल ग्लेशियर, विशेष रूप से 'थ्वाइट्स ग्लेशियर' (जिसे 'डूम्सडे ग्लेशियर' भी कहा जाता है), पहले ही अस्थिर स्थिति में हैं। इनके टूटने से समुद्र के जलस्तर में कई फीट तक की बढ़ोतरी हो सकती है, जिससे दुनिया के प्रमुख तटीय महानगरों के डूबने का खतरा पैदा हो गया है।
तबाही से बचने के लिए दुनिया के पास बचे हैं सिर्फ इतने साल
क्लाइमेट मॉडल और रिपोर्ट्स के अनुसार, यदि दुनिया ने अगले कुछ दशकों—विशेष तौर पर वर्ष 2050 तक—अपने कार्बन उत्सर्जन को शून्य (Net Zero) तक नहीं पहुंचाया और ग्लोबल वार्मिंग को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित नहीं किया, तो इसके परिणाम भयावह होंगे। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि हमारे पास इस जलवायु संकट के सबसे बुरे प्रभावों को टालने और स्थिति को संभालने के लिए महज कुछ ही साल बचे हैं। अगर इस तयशुदा समय सीमा के भीतर ठोस वैश्विक कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाली पीढ़ियों को इसके विनाशकारी दुष्परिणामों का सामना करना पड़ेगा।
ग्लोबल इम्पैक्ट: भारत समेत कई देशों के तटीय शहर खतरे में
अंटार्कटिका के ग्लेशियरों के पिघलने से सिर्फ ध्रुवीय क्षेत्र ही प्रभावित नहीं होंगे, बल्कि इसका सीधा असर पूरी दुनिया पर पड़ेगा। समुद्र का जलस्तर बढ़ने से भारत के मुंबई, कोलकाता, चेन्नई जैसे बड़े तटीय शहरों के साथ-साथ दुनिया के कई अन्य देश और द्वीप राष्ट्र पानी में समा सकते हैं। इसके अलावा, भारी मात्रा में मीठे पानी के मिलने से समुद्री धाराओं का चक्र बिगड़ जाएगा, जिससे दुनिया भर के मौसम का मिजाज पूरी तरह बदल जाएगा और कृषि व खाद्य सुरक्षा पर भी बड़ा संकट खड़ा हो सकता है।