F-35 की नई बिसात: तुर्किये को ट्रंप का ऑफर और भारत-पाकिस्तान के समीकरणों पर असर

F-35 की नई बिसात: तुर्किये को ट्रंप का ऑफर और भारत-पाकिस्तान के समीकरणों पर असर

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा तुर्किये पर लगे प्रतिबंधों को हटाने और उसे F-35 लड़ाकू विमान बेचने की संभावनाओं ने वैश्विक भू-राजनीति में एक नई हलचल पैदा कर दी है। साल 2019 में रूसी S-400 मिसाइल डिफेंस सिस्टम खरीदने के कारण तुर्किये को इस प्रोग्राम से बाहर कर दिया गया था, लेकिन ट्रंप का यह 'यू-टर्न' अब एक बड़े रणनीतिक बदलाव की ओर इशारा कर रहा है।

क्या पाकिस्तान को मिलेगा अप्रत्यक्ष लाभ?

भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता का विषय तुर्किये और पाकिस्तान के बीच गहराते रक्षा संबंध हैं। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि तुर्किये को F-35 मिलता है, तो आने वाले समय में:

  • तकनीकी साझाकरण: तुर्किये और पाकिस्तान के बीच घनिष्ठ सैन्य सहयोग के कारण भारत को डर है कि कहीं F-35 की उन्नत तकनीक या इसकी परिचालन संबंधी जानकारियाँ अप्रत्यक्ष रूप से पाकिस्तान तक न पहुँच जाएँ।

  • सामरिक संतुलन: 'ऑपरेशन सिंदूर' के दौरान तुर्किये द्वारा पाकिस्तान को दी गई सैन्य मदद को देखते हुए, F-35 का तुर्किये के पास होना दक्षिण एशिया के हवाई युद्ध संतुलन को प्रभावित कर सकता है।

भारत की चुनौती और अमेरिकी कूटनीति

भारत इस पूरे घटनाक्रम को बहुत बारीकी से देख रहा है। भारत के पास भी S-400 सिस्टम है, लेकिन उसे अब तक किसी अमेरिकी प्रतिबंध का सामना नहीं करना पड़ा है। ट्रंप प्रशासन का यह रुख कि तुर्किये 'पहले से अधिक वफादार' रहा है, वाशिंगटन की बदलती प्राथमिकताओं को दर्शाता है। भारत के लिए चुनौती यह है कि वह वाशिंगटन के साथ अपने रणनीतिक संबंधों को कैसे संतुलित रखे, जबकि उसके पड़ोसी देश के सबसे करीबी रणनीतिक सहयोगी को दुनिया का सबसे आधुनिक लड़ाकू विमान मिल रहा हो।

क्या यह डील इतनी आसान है?

भले ही ट्रंप ने सैद्धांतिक सहमति के संकेत दिए हों, लेकिन इस डील के रास्ते में अभी भी कई बाधाएं हैं:

  • अमेरिकी कांग्रेस का विरोध: अमेरिकी संसद के कई सदस्य अभी भी तुर्किये को F-35 देने के खिलाफ हैं।

  • तकनीकी पेच: रूस का S-400 सिस्टम और अमेरिकी F-35 का एक साथ उपयोग तकनीकी रूप से अमेरिकी सुरक्षा के लिए खतरा माना जाता है। जब तक तुर्किये इसे हल नहीं करता, तब तक डील पूरी होना मुश्किल है।

  • इजरायल की चिंता: इजरायल इस डील का सबसे कड़ा विरोधी है क्योंकि वह मध्य-पूर्व में अपनी 'क्वालिटेटिव मिलिट्री एज' (QME) को बनाए रखना चाहता है।

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