जानें कौन हैं पहाड़ के गांधी, जिन्होंने कहा था- ये जनता का फैसला, इस पर सवाल कैसा

1989 में लोस चुनाव में मिली हार को बडोनी ने गर्मजोशी से स्वीकारा

देहरादून॥ पहाड़ के गांधी स्व. इंद्रमणि बडोनी का 24 दिसम्बर यानी आज बर्थडे है। बडोनी के बर्थडे पर आज इस बात पर चर्चा होना स्वाभाविक है कि मौजूदा राजनीति का स्वरूप कितना बदल गया है। आज आरोप-प्रत्यारोप के बीच लोकतंत्र के मूल्यों के विपरीत जनता के फैसले पर सवाल उठाना एक ट्रेंड सा बन गया। लोकतंत्र की दुहाई देने वाले राजनीतिक दल और राजनेता भी मर्यादाओं को लांघ जाते हैं।

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बदले हालातों के बीच के बदली राजनीति का वह समय याद आ रहा है, जब पहाड़ के गांधी इंद्रमणि बडोनी वर्ष 1989 में टिहरी लोकसभा सीट से चुनाव मैदान में उतरे। मुकाबले में केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री रह चुके ब्रहमदत्त थे, जिन्हें हर लिहाज से समर्थ और ताकतवार नेता माना जाता था।

बडोनी फक्कड़ मिजाज के मनुष्य, किंतु जनता में पकड़ रखने वाले सामाजिक कार्यकर्ता थे। देवप्रयाग विधानसभा सीट से तीन बार विधायक रह चुके थे। मुकाबला कड़ा हुआ और दस हजार वोट से ब्रहमदत्त जीत गए। बडोनी के समर्थकों ने चुनाव में धांधली के आरोप लगाए, किंतु पहाड़ के गांधी ने यह कहकर सबको चुप करा दिया, यह जनता का फैसला, इस पर सवाल कैसा। चुनाव नतीजे के खिलाफ कोर्ट कचहरी या फिर पुनर्मतगणना को भी बडोनी तैयार नहीं हुए।

तीन बार के विधायक बडोनी का राजनीति का प्रोफाइल उपलब्धियों से भरा रहा, किंतु मूल रूप से वह सामाजिक और सांस्कृतिक कार्यकर्ता थे। यही वजह है कि पहाड़ के जनजीवन यहां की संस्कृति के बारे में उन्हें जब जो मंच मिला, उस पर बात की। नाट्य मंडली बनाकर माधो सिंह भंडारी और पहाड़ को गौरान्वित करने वाले अन्य महानायकों की कहानी को दिल्ली और मुंबई तक ले गए।

उत्तराखंड आंदोलन को वर्ष 1994 में पौड़ी के जिस आमरण अनशन कार्यक्रम से तेजी मिली, उसका बडोनी प्रमुख हिस्सा रहे। उन्हें जबरन अनशन से उठाया गया और फिर पहाड़ में राज्य आंदोलन भड़क गया।

बडोनी के भांजे और वरिष्ठ पत्रकार सुधाकर भट्ट को अच्छे से याद है कि एक राजनेता रहते हुए उनके आचार-विचार में किस तरह गांधीवादी दर्शन हमेशा रचा-बसा रहा। उन्होंने कभी सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। जो सही लगा, उस अनुरूप निर्णय लिए और फिर उस पर अडिग रहे। बडोनी के सांस्कृतिक अभियानों का गवाह रहे भट्ट बताते हैं कि पहाड़ की लोकसंस्कृति उनके केंद्र में रही, चाहे फिर वह किसी भी जगह या क्षेत्र में सक्रिय क्यों न रहे हो।

इंद्रमणि बडोनी सादगी की मिसाल रहे। चुनाव जीतने या न जीतने पर कोई फर्क नहीं पड़ा। बडोनी की बहन कमला भट्ट बताती हैं कि अपनी व्यस्तता के बावजूद वह रिश्ते निभाने में कोई कमी नहीं छोड़ते थे। खेत में रोपाई का जब वक्त होता था, वह विधायक रहते हुए भी अपनी बहन का हाथ बंटाने उसके ससुराल मुंडेती गांव आ जाया करते थे।

 

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