किसानों के प्रदर्शन पर मायावती की मोदी सरकार को नसीहत, कहा- कृषि कानूनों पर करें जरूर करें ये

अखिलेश बोले, अमीरों की पक्षधर भाजपा का खेती-खेत, सब कुछ, बड़े लोगों को गिरवी रखने का षड्यंत्र

नए कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों के विरोध प्रदर्शन का समर्थन करते हुए विरोधी दल सरकार को घेरने में जुटे हैं। बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती ने केन्द्र सरकार को नसीहत दी है। उन्होंने इन कानूनों पर पुनर्विचार करने को कहा है। मायावती ने रविवार को अपने ट्वीट में कहा कि केन्द्र सरकार द्वारा कृषि से सम्बन्धित हाल में लागू किए गए तीन कानूनों को लेकर अपनी असहमति जताते हुए पूरे देश में किसान काफी आक्रोशित व आन्दोलित भी हैं।

उन्होंने कहा कि इसके मद्देनजर, किसानों की आम सहमति के बिना बनाए गए, इन कानूनों पर केन्द्र सरकार अगर पुनर्विचार कर ले तो बेहतर। वहीं समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने कहा कि किसानों को आतंकवादी कहकर अपमानित करना भाजपा का निकृष्टतम रूप है। ये अमीरों की पक्षधर भाजपा का खेती-खेत, छोटा-बड़ा व्यापार, दुकानदारी, सड़क, परिवहन सब कुछ, बड़े लोगों को गिरवी रखने का षड्यंत्र है। अगर भाजपा के अनुसार किसान आतंकवादी हैं तो भाजपाई उनका उगाया न खाने की कसम खाएं।

अखिलेश ने इससे पहले कहा कि किसानों पर इतना अन्याय कभी नहीं हुआ। अपनी जायज मांगों को लेकर प्रदर्शन कर रहे किसानों पर आंसू गैस छोड़ना, वाटर कैनन से पानी की बौछार करना और लाठियां बरसाना कहां की सभ्यता है। यह तो सरकार का आतंकी हमला है। उन्होंने कहा कि भाजपा ने इन्हीं किसानों से वादा किया था कि उनकी आय दोगनी करेंगे। लागत का ड्योढ़ा मूल्य देंगे। इन वादों का क्या हुआ। भाजपा राज में धान की लूट हुई, किसान को न्यूनतम समर्थन मूल्य भी नहीं मिला। पंजाब, हरियाणा ही नहीं उत्तर प्रदेश के किसान भी भाजपा की कुनीतियों से आंदोलित और आक्रोशित है।

उन्होंने कहा कि किसान की मदद करनी है तो सरकार उनको बाजार के भरोसे नहीं छोड़े। उससे भलाई नहीं होगी। किसान और व्यापार का पुराना रिश्ता है। भाजपा ने खेती और व्यापार दोनों को बर्बाद किया है। मिसकाल व्यवस्था से भाजपा दुनिया की बड़ी पार्टी बनने का दावा तो करती है पर वह मिसकाल में उस जगह का पता नहीं बताती जहां किसान धान पहुंचाए, उसको फसल की सही कीमत मिले। और नौजवान को जहां रोजगार हासिल हो सके। समाजवादी काले कानून के खिलाफ है। समाजवादी पार्टी किसानों की मांगों का समर्थन करती हैं।

 

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