CM की कुर्सी से बगावत तक: बिहार, झारखंड और अब पंजाब! जानें उन 3 पूर्व मुख्यमंत्रियों की कहानी, जो अपनों के लिए ही बन गए सबसे बड़ा सिरदर्द
भारतीय राजनीति में सत्ता का मोह और कुर्सी की जंग कोई नई बात नहीं है, लेकिन पिछले कुछ समय में क्षेत्रीय और राष्ट्रीय पार्टियों के भीतर से ही कुछ ऐसे बड़े बगावती सुर उठे हैं जिन्होंने आलाकमान की रातों की नींद उड़ा दी है। अक्सर पार्टियां संकट के समय या रणनीतिक फेरबदल के तहत किसी भरोसेमंद चेहरे को मुख्यमंत्री (CM) की कुर्सी सौंपती हैं, लेकिन वक्त बदलने के साथ वही 'भरोसेमंद' चेहरा पार्टी के लिए सबसे बड़ा कांटा बन जाता है। बिहार और झारखंड के बाद अब बगावत की यह चिंगारी पंजाब तक पहुंच चुकी है। आइए जानते हैं देश के उन तीन कद्दावर पूर्व मुख्यमंत्रियों के बारे में, जिन्हें अपनों ने ही आगे बढ़ाया, लेकिन आज वे अपनी ही मूल पार्टी के अस्तित्व और सियासी समीकरणों के लिए सबसे बड़ी मुसीबत बन चुके हैं।
1. बिहार: नीतीश कुमार के फैसलों को चुनौती देने वाले जीतन राम मांझी
बिहार की राजनीति में 'बगावत' और 'कुर्सी' का एक बेहद चर्चित अध्याय जीतन राम मांझी के नाम दर्ज है। साल 2014 के लोकसभा चुनाव में जेडीयू (JDU) की करारी हार के बाद नीतीश कुमार ने नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था और बेहद भरोसे के साथ महादलित चेहरे के रूप में जीतन राम मांझी को बिहार का ताज सौंपा था। लेकिन कुर्सी संभालते ही मांझी के तेवर पूरी तरह बदल गए। उन्होंने नीतीश कुमार के वफादार अफसरों को हटाना और स्वतंत्र रूप से बड़े राजनीतिक फैसले लेना शुरू कर दिया। जब नीतीश कुमार को अपनी गलती का अहसास हुआ और उन्होंने दोबारा सीएम की कुर्सी संभालनी चाही, तो मांझी ने खुलकर बगावत कर दी। उन्होंने अपनी नई पार्टी 'हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा' (HAM) बनाई और तब से लेकर आज तक वे बिहार के राजनीतिक घटनाक्रम में नीतीश कुमार और विपक्षी गठबंधन दोनों के लिए एक अनप्रेडिक्टेबल फैक्टर बने हुए हैं।
2. झारखंड: हेमंत सोरेन की जेल यात्रा के बाद बगावत की राह चुनने वाले चंपई सोरेन
झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के भीतर साल 2024 में हुआ सियासी ड्रामा देश ने बेहद करीब से देखा। जमीन घोटाले से जुड़े मामले में जब मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को जेल जाना पड़ा, तो उन्होंने पार्टी के सबसे सीनियर, वफादार और 'झारखंड आंदोलन के कद्दावर नेता' चंपई सोरेन को सूबे की कमान सौंपी। चंपई सोरेन को 'झारखंड का टाइगर' भी कहा जाता है। उन्होंने कुछ महीनों तक सरकार को बखूबी चलाया, लेकिन जैसे ही हेमंत सोरेन जेल से रिहा होकर बाहर आए, चंपई सोरेन को कुर्सी छोड़ने का आदेश दे दिया गया। इस फैसले को चंपई सोरेन बर्दाश्त नहीं कर पाए और उन्होंने इसे अपने आत्मसम्मान पर चोट बताया। उन्होंने सोशल मीडिया पर अपना दर्द बयां करते हुए जेएमएम से नाता तोड़ लिया और भारतीय जनता पार्टी (BJP) का दामन थाम लिया, जिससे कोल्हान क्षेत्र में सोरेन परिवार और जेएमएम के पारंपरिक आदिवासी वोट बैंक को बहुत बड़ा झटका लगा।
3. पंजाब: कैप्टन की विदाई के बाद उभरे और अब कांग्रेस के लिए मुसीबत बने चरणजीत सिंह चन्नी
बगावत की इस लिस्ट में सबसे ताजा और चौंकाने वाला नाम पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी का जुड़ गया है। साल 2022 के पंजाब विधानसभा चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस आलाकमान ने कैप्टन अमरिंदर सिंह को हटाकर राज्य के पहले दलित मुख्यमंत्री के रूप में चरणजीत सिंह चन्नी को कुर्सी पर बैठाया था। चुनाव में कांग्रेस की करारी हार और आम आदमी पार्टी की बंपर जीत के बाद चन्नी कुछ समय के लिए नेपथ्य में चले गए थे। लेकिन हालिया राजनीतिक घटनाक्रमों और टिकट बंटवारे को लेकर चन्नी के तेवर कांग्रेस आलाकमान के खिलाफ बेहद तल्ख हो चुके हैं। पंजाब कांग्रेस के भीतर चन्नी की सक्रियता और उनके बगावती बयान वर्तमान प्रदेश लीडरशिप के लिए गले की हड्डी बन चुके हैं। चन्नी का यह रुख पंजाब में खुद को दोबारा स्थापित करने की कोशिश कर रही कांग्रेस के अंदरूनी कलह को सरेआम उजागर कर रहा है, जिससे पार्टी की चुनावी राह और मुश्किल होती दिख रही है।