पंजाब कांग्रेस में 'महाभारत': चन्नी के बागी तेवर से हाईकमान की बढ़ी टेंशन, क्या पलटा जाएगा फैसला?
पंजाब कांग्रेस में इस वक्त राजनीतिक घमासान अपने चरम पर है। हाल ही में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (AICC) द्वारा घोषित नई संगठनात्मक टीम और चुनाव समितियों के ऐलान के बाद से ही पार्टी के भीतर असंतोष का ज्वालामुखी फूट पड़ा है। पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी की नाराजगी इस 'महाभारत' का केंद्र बिंदु बनी हुई है।
क्या है पूरा मामला और क्यों नाराज हैं चन्नी?
कांग्रेस हाईकमान ने पंजाब में आगामी 2027 के विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए कई नई समितियों का गठन किया है। इसमें चरणजीत सिंह चन्नी को 'कैंपेन कमेटी' का चेयरमैन तो बनाया गया है, लेकिन प्रदेश कांग्रेस कमेटी (PCC) के अध्यक्ष पद पर अमरिंदर सिंह राजा वडिंग को बरकरार रखा गया है। चन्नी गुट का मानना है कि यदि पार्टी को सत्ता में वापसी करनी है, तो नेतृत्व में बदलाव जरूरी है। वे खुले तौर पर या तो चन्नी को प्रदेश अध्यक्ष बनाने या उन्हें मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित करने की मांग कर रहे हैं।
शक्ति प्रदर्शन और 7 दिन का अल्टीमेटम
शुक्रवार, 3 जुलाई 2026 को मोरिंडा स्थित अपने आवास पर चन्नी ने एक महत्वपूर्ण बैठक बुलाई, जिसमें कई पूर्व मंत्री, विधायक और पार्टी के वरिष्ठ पदाधिकारी शामिल हुए। इसे चन्नी के शक्ति प्रदर्शन के रूप में देखा जा रहा है।
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अल्टीमेटम: रिपोर्टों के अनुसार, चन्नी समर्थकों ने पार्टी हाईकमान को 7 दिनों का अल्टीमेटम दिया है।
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नेताओं का रुख: पूर्व विधायक दर्शन सिंह बराड़ और त्रिपत राजिंदर सिंह बाजवा जैसे नेताओं ने खुलकर कहा है कि वे हाईकमान के फैसले के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन उन्हें अपनी आपत्तियां दर्ज कराने का पूरा अधिकार है। उनका कहना है कि पार्टी के नेतृत्व को कार्यकर्ताओं की भावनाओं को सुनना चाहिए।
हाईकमान के सामने बड़ी चुनौती
इस पूरे घटनाक्रम ने राहुल गांधी और कांग्रेस नेतृत्व के सामने एक बड़ी चुनौती पेश कर दी है। एक तरफ पार्टी 'जट सिख' नेतृत्व और चन्नी के 'दलित' जनाधार के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रही है, तो दूसरी तरफ सुखजिंदर सिंह रंधावा जैसे वरिष्ठ नेताओं की केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात ने भी अटकलों का बाजार गर्म कर दिया है। हालांकि रंधावा ने इसे केवल पंजाब में कानून-व्यवस्था की स्थिति पर चर्चा बताया है, लेकिन पार्टी के भीतर मची इस खींचतान से एकजुटता का दावा कमजोर पड़ता दिख रहा है।
अब आगे क्या? सवाल यह है कि क्या हाईकमान चन्नी के दबाव के आगे झुकेगा और अपने फैसले को बदलेगा? फिलहाल, गेंद कांग्रेस हाईकमान के पाले में है। यदि नेतृत्व ने समय रहते इस असंतोष को नहीं संभाला, तो आने वाले विधानसभा चुनाव में पंजाब कांग्रेस के लिए बड़ी टूट या चुनावी नुकसान का खतरा बन सकता है।