कौन हैं भगवान जगन्नाथ के ‘प्रथम सेवक’? जो रथ यात्रा से पहले सोने की झाड़ू से साफ करते हैं भगवान का रास्ता

कौन हैं भगवान जगन्नाथ के ‘प्रथम सेवक’? जो रथ यात्रा से पहले सोने की झाड़ू से साफ करते हैं भगवान का रास्ता

उड़ीसा के पुरी में आयोजित होने वाली भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा (Puri Rath Yatra) अपने आप में कई अनोखी परंपराओं और रहस्यों को समेटे हुए है। जब भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ रथों पर सवार होकर गुंडिचा मंदिर के लिए निकलते हैं, तो उस महायात्रा की शुरुआत से ठीक पहले एक ऐसी रस्म निभाई जाती है, जो पूरी दुनिया को सामाजिक समानता और विनम्रता का सबसे बड़ा संदेश देती है। इस बेहद पवित्र रस्म को निभाने वाले शख्स को ही भगवान जगन्नाथ का 'प्रथम सेवक' (First Servant of Lord Jagannath) माना जाता है।

पुरी के गजपति राजा ही हैं भगवान के 'प्रथम सेवक'

शाही परंपराओं के अनुसार, पुरी के राजा यानी गजपति महाराज (Gajapati Maharaja) को ही भगवान जगन्नाथ का प्रथम सेवक माना जाता है। वर्तमान में पुरी के गजपति महाराज 'दिव्यसिंह देव' (Divyasinghe Deva) हैं। सदियों पुरानी इस परंपरा के तहत, भले ही वे राज परिवार से ताल्लुक रखते हों और आम जनता के लिए राजा हों, लेकिन भगवान जगन्नाथ के सामने वे खुद को सिर्फ एक अदना सा सेवक मानते हैं। रथ यात्रा के दिन वे एक आम सेवक की तरह भगवान की सेवा में हाजिर होते हैं।

'छेरा पहरा' रस्म: जब हाथों में सोने की झाड़ू थामते हैं राजा

रथ यात्रा के पावन अवसर पर जब तीनों भगवान अपने-अपने भव्य रथों पर विराजमान हो जाते हैं, तब गजपति महाराज अपने शाही महल से पालकी में सवार होकर रथों के पास पहुंचते हैं। इसके बाद शुरू होती है सबसे प्रसिद्ध 'छेरा पहरा' (Chera Pahara) की रस्म। इस रस्म के दौरान राजा अपनी राजसी हेकड़ी और ठाट-बाठ को भूलकर, अपने हाथों में सोने की मूंज वाली झाड़ू (Golden Broom) थामते हैं। वे स्वयं झुककर तीनों रथों के मंडप और भगवान के रास्ते को झाड़ू लगाकर साफ करते हैं।

सुगंधित जल और चंदन का छिड़काव

सोने की झाड़ू से रास्ते को साफ करने के बाद, गजपति महाराज उस पवित्र मार्ग पर सुगंधित जल और चंदन के पानी का छिड़काव करते हैं। इस पूरी प्रक्रिया को बेहद आदर और पवित्रता के साथ पूरा किया जाता है। राजा द्वारा इस सेवा को संपन्न करने के बाद ही, वहां मौजूद लाखों श्रद्धालुओं का हुजूम जयकारों के साथ भगवान के रथों को खींचना शुरू करता है। यह रस्म रथ यात्रा के शुरू होने के दिन और फिर नौ दिन बाद भगवान की वापसी (बहुदा यात्रा) के दिन, दोनों बार निभाई जाती है।

सामाजिक समानता का दुनिया को सबसे बड़ा संदेश

'छेरा पहरा' की यह अद्भुत परंपरा सदियों से चली आ रही है और इसके पीछे एक बेहद गहरा आध्यात्मिक व सामाजिक संदेश छिपा है। यह रस्म दुनिया को बताती है कि भगवान जगन्नाथ की नजर में इस संसार का कोई भी व्यक्ति छोटा या बड़ा नहीं है। चाहे वह राज्य का राजा हो या कोई साधारण गरीब नागरिक, भगवान के दरबार में सभी समान हैं। स्वयं राजा का झाड़ू लगाना यह दर्शाता है कि अहंकार को त्यागकर ही ईश्वर की सच्ची भक्ति और सेवा की जा सकती है।

 

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