चेतावनी है चमोली आपदा, यदि अब भी नहीं चेते तो … विनाशकारी त्रासदी तय

बेहद संवेदनशील है हिमालयी क्षेत्र, बंद होना चाहिए अंधाधुंध दोहन

desk । उत्तराखंड के चमोली जिले में ग्लेशियर फटने से काफी कुछ तबाह हो चुका है। देश का पूरा तंत्र राहत एवं बचाव कार्य में लगा हुआ है। कुछ दिनों बाद पता चल पायेगा कि कितने जान माल का नुक्सान हुआ है। फिलहाल यर आपदा हमारे लिए चुनौती के साथ चेतावनी भी है। चेतावनी इसलिए कि हम वैज्ञानिकों और पर्यावरणविदों के सुझावों को दरकिनार के देते हैं। लेकिन अब हमें संभलना होगा। हमे वैज्ञानिकों और पर्यावरण विशेषज्ञों के सुझावों पर अमल करना होगा। हिमालयी क्षेत्र बेहद संवेदनशील है। इसका अंधाधुंध दोहन बंद होना चाहिए। तमाम चेतावनियों के बाद भी हम हिमालयी क्षेत्र के प्राकृतिक स्वरुप से छेड़छाड़ कर विनाशकारी त्रासदियों को ही न्योता दे रहे हैं।

उल्लेखनीय है कि देहरादून स्थित वाडिया भू-वैज्ञानिक संस्थान के वैज्ञानिकों ने आठ महीने पहले ही सम्पूर्ण हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियरों द्वारा नदियों के प्रवाह को अवरुद्ध करने और उससे बनने वाली झील के खतरों के प्रति आगाह किया था। इसी तरह वर्ष 2019 में भी वैज्ञानिकों ने एक रिपोर्ट जारी की थी, जिसमे कहा गया था कि हिमालय क्षेत्र के ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं।

जानकारी के मुताबिक़ वैज्ञानिकों ने उसी समय उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर और हिमाचल के कई इलाकों में कभी भी ग्लेशीयरों के फटने को लेकर आगाह किया था। इस सन्दर्भ में वैज्ञानिकों ने जम्मू-कश्मीर के काराकोरम रेंज में स्थित श्योक नदीं का उदाहरण भी दिया था। बताते चलें कि एक ग्लेशियर द्वारा श्योक नदी के प्रवाह को अवरुद्ध कर देने से वहां एक बड़ी झील बन गई। झील में ज्यादा पानी जमा होने से उसके फटने की आशंका है। हिमालय पर शोध कर रहे शोधकर्ताओं के मुताबिक ग्लेशियरों के कारण बनने वाली झीलें बड़े खतरे का कारण बन सकती हैं। 2013 की भीषण आपदा इसी तरह से एक झील के फट जाने से ही आई थी।

आज हिमालय स्वयं खतरे में है। अनियंत्रित विकास के चलते कार्बन का अत्यधिक उत्सर्जन हिमालय क्षेत्र को विनाश की ओर ले जा रहा है। वैज्ञानिकों को आशंका है कि कार्बन-उत्सर्जन की तीव्र गति के कारण अगले बीस से तीस बरस में हिमालय के ग्लेशियर पूरी तरह पिघल जाएंगे। इसके बाद सौ करोड़ से ज्यादा लोगों को पानी की किल्लत के कारण विस्थापित होना पद सकता है। ये 21वीं शताब्दी की हृदय विदारक त्रासदी हो सकती है।

हिमालय क्षेत्र में गंगा समेत सभी नदियों पर डैम बनाये गए हैं। यह नदियों की सेहत के साथ ही पुरे पर्यावरण को विगाड़ रहा है। विकसित देशों में डैमों के नुकासन को देखकर उन्हें तोड़ा जा रहा है, लेकिन भारत में सरकरें डैम-निर्माण को ही विकास का पैमाना मानती आ रही हैं। नदियों की अविरलता और निर्मलता को अवरुद्ध करना आखिर में कितना नैतिक और विज्ञान सम्मत है?

वैज्ञानिकों और पर्यावरणविदों का सुझाव है कि हमे हिमालय के संसाधनों के अंधाधुंध दोहन से बचना होगा। हिमालयी क्षेत्र की समस्या को भू-गर्भीय सरंचना को ध्यान में रखकर पूरी समग्रता में देखना होगा। हिमालयी क्षेत्र में वृक्षों का कटान पूर्णतः प्रतिबंधित होना चाहिए। इसी तरह इस पूरे क्षेत्र में कार्बन उत्सर्जन को भी बंद करना पड़ेगा। हमारे पूर्वज प्राकृतिक संपदा को क्षति पहुंचाए बिना हिमालय की गोंद में बैठकर परमानंद की अनुभूति किया करते थे। इसीलिए तो हिमालयी क्षेत्र को देवभूमि कहा जाता है।

 

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