मानव जाति को प्रेम, करुणा और भाईचारे का संदेश देता है रमजान का पवित्र महीना!

हाफिज ने कहा कि जो रमजान उल मुबारक के महीने में रोजा रखता है, अल्लाह उसको बहुत पसंद करता है। खुश किस्मत है वह जो अल्लाह के हुक्म को मानता है।

बेगूसराय।। इस्लाम कैलेंडर का सबसे पवित्र माह-ए-रमजान शुरू हो गया। बाजार सज चुके हैं, कोरोना प्रोटोकॉल का पालन करते हुए सेहरी और इफ्तार की जमकर खरीददारी हो रही है। मस्जिद में सोशल डिस्टेंस का पालन करते हुए नमाज अदा की जा रही है। बेगूसराय के जेल में भी कुरान के आयत के साथ अल्लाह हो अकबर गूंजने है। जेल में बंद 55 कैदी रोजा रख रहे हैं। कारा अधीक्षक बृजेश सिंह मेहता ने बताया कि जेल प्रशासन द्वारा रोजा के सेहरी और इफ्तार के सामान उपलब्ध कराये गए हैं। इस दौरान कैदी अपने गुनाहों पर शर्मिंदा होकर अल्लाह से माफी मांगने खेसा कोरोना से बचाव के लिए भी दुआ कर रहे हैं।

हाफिज ने कहा कि जो रमजान उल मुबारक के महीने में रोजा रखता है, अल्लाह उसको बहुत पसंद करता है। खुश किस्मत है वह जो अल्लाह के हुक्म को मानता है। इमाम मौलाना काजी अरशद कासमी ने कहा है कि यह कुरान शरीफ के दुनियां में नाजिल होने का महीना है। यह महीना हम सबको नेकियों, आत्मसंयम और आत्मनियंत्रण का अवसर तथा समूची मानव जाति को प्रेम, करुणा और भाईचारे का संदेश देता है। नफरत और हिंसा से भरे इस दौर में रमजान का संदेश पहले से और ज्यादा प्रासंगिक हो चला है। रोजा बन्दों को जब्ते नफ्स अर्थात आत्मनियंत्रण की तरबियत देता है और उनमें परहेजगारी अर्थात आत्मसंयम पैदा करता है।

हम सब जिस्म और रूह दोनों के समन्वय के नतीजे हैं। आम तौर पर हमारा जीवन जिस्म की जरूरतों भूख, प्यास, शारिरिक सुख आदि के गिर्द घूमता है। रमजान का महीना दुनियावी चीजों पर नियंत्रण रखने की साधना है। रोजे में परहेज, आत्मसंयम और जकात का मकसद यह है कि आप अपनी जरूरतों में थोड़ी-बहुत कटौती कर समाज के अभावग्रस्त लोगों की कुछ जरूरतें पूरी कर सकें।

रोजा सिर्फ मुंह और पेट का ही नहीं, आंख, कान, नाक और जुबान का भी होता है। यह सदाचार और पाकीजगी की शर्त है। रमजान रोजादारों को आत्मावलोकन और खुद में सुधार का मौका देता है। दूसरों को नसीहत देने के बजाय अगर हम अपनी कमियों को पहचान कर उन्हें दूर कर सकें तो हमारी दुनिया ज्यादा मानवीय होगी। उन्होंने कहा कि रमजान के महीने को तीन हिस्सों या अशरा में बांटा गया है। महीने के पहले दस दिन ‘रहमत’ के हैं, जिसमें अल्लाह रोजेदारों पर रहमतों की बारिश करता है। दूसरा अशरा ‘बरकत’ का है, जब अल्लाह रोजेदारों पर बरकत नाजिल करता है। रमजान का तीसरा अशरा ‘मगफिरत’ का है जब अल्लाह अपने बंदों को गुनाहों से पाक कर देता है।

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