UP Panchayat Chunav : गांवों में लोकतंत्र का उत्सव शुरू, सोशल मीडिया का सहारा ले रहे उम्मीदवार

उम्मीदवार घर-घर पहुंच कर अपने लिए समर्थन मांग रहे हैं। नाली-खड़ंजे, राशन कार्ड और इंडिया मार्का हैंड पाइप से लेकर आवास दिलाने के वादे किये जा रहे हैं। पुराने रिश्तों की भी दुहाई दी जा रही है।

लखनऊ। उत्तर प्रदेश में Panchayat Chunav का डंका बज चुका है। गांवों में उत्सव जैसा माहौल है। खेत-खलिहानों से लेकर चौपालों तक जीत-हार की रणनीति तैयार हो रही है। उम्मीदवार दिन-रात मतदाताओं की चरण-वंदना कर रहे हैं। सोशल मीडिया का भी सहारा लिया जा रहा है। उम्मीदवारों के पास वादों की पोटली है तो मतदातों के पास भी समस्याओं का अंबार। गांव से दूर महानगरों में रहने वाले लोगों से भी संपर्क साधे जा रहे हैं।

यूपी के गांवों में लोकतंत्र का उत्सव शुरू हो गया है। गांवों के चौराहों पर होर्डिंगस और बैनर भी लगे हैं। नुक्कड़ों और चौपालों में बैठकें भी सजने लगी हैं। उम्मीदवार घर-घर पहुंच कर अपने लिए समर्थन मांग रहे हैं। नाली-खड़ंजे, राशन कार्ड और इंडिया मार्का हैंड पाइप से लेकर आवास दिलाने के वादे किये जा रहे हैं। पुराने रिश्तों की भी दुहाई दी जा रही है। उम्मीदवारों को एक-एक वोट का हिसाब रखना और मतदाताओं को समझाना पड़ रहा है। यह काम पिछले एक साल से चल रहा है।

ग्राम प्रधान, बीडीसी और जिला पंचायत सदस्य के उम्मीदवार चुनाव में जमकर खर्च भी कर रहे हैं। हालांकि पूछने पर अधिकांश उम्मीदवार बस इतना ही कहते हैं कि गांव वालों की सेवा में लगे हैं। शराब और मुर्गों की पार्टियों का दौर भी शुरू ही गया है। पांच साल तक सीधे मुंह बात न करने वाले प्रधान लोगों के घर-घर जाकर दिक्कतें पूछ रहे हैं। तमाम गावों में वोट के बदले नोट कार्यक्रम भी शुरू हो गया है।

इस बार पंचायत चुनाव में उम्मीदवार व उनके समर्थक सोशल मीडिया का जमकर सहारा ले रहे हैं। कोई सोशल मीड़िया पर खुद को बेहतर बताने में जुटा है तो कोई मतदाताओें से झांसे में न आने और उम्मीदवार व उसके समर्थकों के चरित्र को देखकर मतदान की अपील कर रहा है। उम्मीदवार सोशल मीड़िया पर ग्रुप बनाकर मतदाताओं से जुड़ने के प्रयास में भी लगे हैं। सोशल मीड़िया पर हर उम्मीदवार इस बार ईमानदार प्रधान चुनने के मैसेज डालकर प्रचार प्रसार में जुटे हैं।

कहा जाता है कि ग्रामसभा का चुनाव लोकसभा और विधान सभा चुनाव से भी कठिन होता है। इस चुनाव में एक-एक वोट को सहेजना होता है। गांव की सरकार चुनने के लिए होने वाले चुनाव में राजनीतिक दलों की प्रत्यक्ष भूमिका नहीं होती है। पंचायत चुनाव पार्टी सिंबल (Party symbol) के आधार पर नहीं होते हैं। अहम बात ये है कि इस चुनाव में उम्मीदवारों और मतदाताओं के बीच सनातन रिश्ता होता है।

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