बिहार की सियासत में क्या होने वाला है? मामूली उलटफेर से गिर सकती है नीतीश सरकार

इस तरह सामान्य तौर पर तो नीतीश सरकार बहुमत में है, लेकिन लालू को जमानत मिलने के बाद से ही एनडीए के भीतर घबराहट है।

पटना। राष्ट्रीय जनता दल सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव को जमानत मिलने के साथ ही बिहार की सियासत में हलचल तेज हो गई है। बीजेपी नीत एनडीए खेमा बेचैन है। एनडीए के घटक दल हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा द्वारा लालू प्रसाद यादव की जमानत का स्वागत किये जाने के बाद अब यह माना जाने लगा है कि बिहार की सियासत में बड़ा उलट-फेर तय है। तेजप्रताप यादव ने भी अपने एक बयान में लालू यादव की रिहाई के साथ ही नीतीश सरकार की सत्ता से विदाई की बात कह चुके हैं।

उल्लेखनीय है कि बिहार विधानसभा का मौजूदा सियासी गणित ऐसा है कि मामूली उलटफेर से नीतीश सरकार गिर सकती है। दरअसल, महागठबंधन की 110 सीटें हैं, जिनमें आरजेडी के 75, कांग्रेस के 19 और लेफ्ट पार्टी के 16 विधायक हैं। 243 सदस्यीय विधानसभा में बहुमत के लिए 122 विधायकों का समर्थन चाहिए। इस समय नीतीश सरकार के साथ 127 विधायक हैं। इनमें बीजेपी के 74, जेडीयू के 44, हम के 4, वीआईपी के 4 और एक निर्दलीय विधायक शामिल है। सोमवार को जेडीयू के विधायक मेवालाल चौधरी के निधन से एक सीट खाली हो चुकी है। इसके अलावा 5 विधायक AIMIM के हैं।

इस तरह सामान्य तौर पर तो नीतीश सरकार बहुमत में है, लेकिन लालू को जमानत मिलने के बाद से ही एनडीए के भीतर घबराहट है। बीजेपी के राज्यसभा सांसद सुशील कुमार मोदी के उस ब्यान में भी घबराहट ही झलकती है, जिसमे उन्होंने कहा कि लालू प्रसाद को जमानत मिलने या न मिलने से बिहार की राजनीति पर कोई असर नहीं पड़ेगा।

एनडीए के घटक दल हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा और विकासशील इंसान पार्टी नीतीश सरकाए से नाराज चल रही है। हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा के अध्यक्ष जीतन राम मांझी और इंसान पार्टी के अध्यक्ष मुकेश सहनी मंत्रिपरिषद में और हिस्सा चाहते थे। हालांकि दोनों ही नेताओं की उम्मीद पूरी नहीं हो पाई है। ऐसे में लालू खेमे में रह चुके दोनों नेताओं का रुख कभी भी बदल सकता है।

इन परिस्थितियों में अब लालू यादव के जेल से बाहर आने के बाद महागठबंधन में जहां मनोवैज्ञानिक रूप से जोश नजर आ रहा है, वहीं एनडीए खेमे में बेचैनी नजर आ रही है। ऐसे में सियासत के बड़े खिलाड़ी लालू प्रसाद यादव बड़ा कमाल कर सकते हैं। दरअसल, जिस अंदाज में मांझी की पार्टी ने लालू की रिहाई का स्वागत किया है, उसे एक बड़ा सियासी संदेश माना जा रहा है।

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बताते चलें कि महागठबंधन को नीतीश सरकार को गिराकर अपनी सरकार बनाने के लिए सिर्फ 12 विधायकों का जुगाड़ करना है। यदि मांझी और मुकेश सहनी अपने चार-चार विधायकों के साथ पाला बदलते हैं तो 118 का आंकड़ा बनता है। इसमें यदि AIMIM के पांच विधायकों का समर्थन महागठबंधन को मिल जाता है तो यह संख्या 119 तक पहुंच जाती है। सूत्रों के मुताबिक़ एक निर्दल विधायक भी महागठबंधन में शामिल होने को बेताब है।

इस तरह महागठबन्धन के पास बहुमत से दो विधायक अधिक हो जाएंगे और नीतीश सरकार का गिरना तय हो जाएगा। हालांकि यह खेल इतना आसान भी नहीं है, क्योंकि नीतीश भी सियासत के धुरंधर खिलाड़ी हैं। लेकिन एनडीए की बैचैनी और लालू यादव के लिए एनडीए घटक दलों में उमड़ रहे प्यार से बिहार में बड़े सियासी उलटफेर से इंकार भी नहीं किया जा सकता है।

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