'गलतफहमी में न रहे सऊदी अरब': मक्का रक्षा डील पर भड़का ईरान, पाकिस्तान-तुर्किये के साथ को लेकर दी कड़ी चेतावनी

'गलतफहमी में न रहे सऊदी अरब': मक्का रक्षा डील पर भड़का ईरान, पाकिस्तान-तुर्किये के साथ को लेकर दी कड़ी चेतावनी

मध्य पूर्व (Middle East) की भू-राजनीति में एक बार फिर तनाव गहराने लगा है। सऊदी अरब और ईरान के बीच हालिया कूटनीतिक सुधारों के बावजूद क्षेत्रीय वर्चस्व की जंग थमने का नाम नहीं ले रही है। ताजा विवाद सऊदी अरब द्वारा अपनी रक्षा क्षमताओं को मजबूत करने और पवित्र शहर मक्का की सुरक्षा को लेकर किए गए रणनीतिक समझौतों के बाद भड़का है। ईरान ने सऊदी अरब को कड़ी चेतावनी देते हुए साफ शब्दों में कहा है कि वह 'किसी भी तरह की गलतफहमी में न रहे', क्योंकि पाकिस्तान और तुर्किये जैसे देशों के साथ सैन्य गठजोड़ या रक्षा डील करने से उसे कोई पक्की या स्थाई सुरक्षा नहीं मिलने वाली है। आइए जानते हैं क्या है पूरा मामला और क्यों भड़का है ईरान।

क्या है मक्का रक्षा डील और ईरान की आपत्ति की वजह?

हाल ही में खाड़ी देशों और इस्लामिक दुनिया में सुरक्षा समीकरण तेजी से बदल रहे हैं। सऊदी अरब ने अपनी सीमाओं और विशेष रूप से पवित्र स्थलों की सुरक्षा को चाक-चौबंद करने के लिए कई मुस्लिम बहुसंख्यक देशों, खासकर पाकिस्तान और तुर्किये के साथ अपने सैन्य व रक्षा सहयोग को गहरा किया है।

  • रक्षा समझौतों का दायरा: सऊदी अरब विभिन्न अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों के तहत अपनी सैन्य ट्रेनिंग, खुफिया साझाकरण और आधुनिक डिफेंस सिस्टम को मजबूत कर रहा है।

  • ईरान की बौखलाहट: ईरान को इस बात से गहरी आपत्ति है कि खाड़ी क्षेत्र में गैर-क्षेत्रीय या बाहरी इस्लामिक देशों (विशेषकर पाकिस्तान और तुर्किये) की बढ़ती सैन्य दखलअंदाजी से क्षेत्र का शक्ति संतुलन ईरान के खिलाफ जा सकता है। तेहरान का मानना है कि इस तरह के समझौते क्षेत्र में स्थिरता लाने के बजाय तनाव को और बढ़ावा देंगे।

'गलतफहमी में न रहें रियाद' - ईरानी अधिकारियों की दो टूक

ईरान के शीर्ष राजनीतिक और सैन्य हलकों से जारी बयानों में सऊदी अरब को आड़े हाथों लेते हुए कहा गया है कि रियाद को यह मुगालता नहीं पालना चाहिए कि पाकिस्तान या तुर्किये के साथ किसी प्रकार की रक्षा डील या परमाणु सुरक्षा का छतरी साया मिलने से उसे स्थाई सुरक्षा मिल जाएगी।

  • क्षेत्रीय सुरक्षा पर ईरान का तर्क: ईरान का हमेशा से यह रुख रहा है कि पश्चिम एशिया की सुरक्षा केवल क्षेत्रीय देशों (खाड़ी के पड़ोसी देशों) के आपसी सहयोग और संवाद से ही सुनिश्चित की जा सकती है, न कि पश्चिमी या अन्य बाहरी देशों के सैन्य गठबंधनों के जरिए।

  • कड़े कूटनीतिक संदेश: तेहरान ने स्पष्ट किया है कि इस तरह के सुरक्षा समझौते क्षेत्र में अविश्वास की खाई को और चौड़ा करते हैं, जिसका खामियाजा पूरे मध्य पूर्व को भुगतना पड़ सकता है।

क्या है इसके भू-राजनीतिक मायने?

सऊदी अरब और ईरान के बीच पिछले कुछ सालों में चीन की मध्यस्थता से कूटनीतिक संबंध भले ही बहाल हुए हों, लेकिन यमन संकट, क्षेत्रीय नेतृत्व और सैन्य गठबंधनों को लेकर दोनों देशों के बीच अविश्वास की दीवार अब भी पूरी तरह गिरी नहीं है। सऊदी अरब द्वारा अपनी रक्षा सुरक्षा के लिए पश्चिमी देशों के साथ-साथ अब मुस्लिम देशों के साथ बनाए जा रहे नए रणनीतिक संबंध ईरान की बेचैनी को साफ तौर पर बढ़ा रहे हैं।

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