Prabhat Vaibhav, Digital Desk : मध्य पूर्व (Middle East) की राजनीति और वैश्विक ऊर्जा बाजार में एक ऐसा भूचाल आया है जिसने पूरी दुनिया को चौंका दिया है। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) की नाकाबंदी के बीच, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने पेट्रोलियम निर्यातक देशों के संगठन ओपेक (OPEC) से अलग होने का ऐतिहासिक फैसला लिया है। 60 वर्षों की लंबी साझेदारी के बाद यूएई का यह कदम सऊदी अरब के नेतृत्व वाले इस शक्तिशाली ग्रुप के लिए अब तक का सबसे बड़ा झटका माना जा रहा है।
UAE ने क्यों छोड़ा OPEC का साथ?
यूएई पिछले काफी समय से ओपेक के भीतर घुटन महसूस कर रहा था। इसका मुख्य कारण 'उत्पादन कोटा' (Production Quota) को लेकर उपजा विवाद है।
क्षमता विस्तार: यूएई ने अपनी तेल उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए अरबों डॉलर का निवेश किया है और वह ज्यादा तेल बेचना चाहता है।
कोटा की पाबंदी: ओपेक बाजार में कीमतें स्थिर रखने के लिए सदस्य देशों पर तेल उत्पादन कम रखने का दबाव डालता है। यूएई का मानना है कि यह पाबंदी उसकी आर्थिक प्रगति में बाधा बन रही है।
रणनीतिक स्वायत्तता: रूस और सऊदी अरब के दबदबे वाले ओपेक+ से बाहर निकलकर यूएई अब अपनी तेल नीति खुद तय कर सकेगा।
ओपेक के वजूद पर संकट: सऊदी अरब की बढ़ी चिंता
ओपेक की स्थापना 1960 में हुई थी और यूएई 1967 में इसका हिस्सा बना था। यूएई के बाहर निकलने का मतलब है:
उत्पादन का नुकसान: यूएई दुनिया के शीर्ष 10 तेल उत्पादकों में शामिल है और रोजाना लगभग 29 लाख बैरल तेल का उत्पादन करता है।
संगठन में दरार: यूएई ओपेक का सबसे अनुशासित सदस्य था। विशेषज्ञों को डर है कि यूएई के बाद नाइजीरिया या अंगोला जैसे देश भी संगठन छोड़ने पर विचार कर सकते हैं।
सऊदी का दबदबा कम: अब सऊदी अरब के लिए अकेले वैश्विक तेल कीमतों को नियंत्रित करना और शेष सदस्यों को एकजुट रखना बेहद कठिन होगा।
भारत पर प्रभाव: पेट्रोल-डीजल की कीमतों में मिल सकती है राहत?
भारत अपनी जरूरत का 80% से अधिक कच्चा तेल आयात करता है, इसलिए यूएई का यह फैसला भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए गेम-चेंजर साबित हो सकता है।
1. कीमतों में गिरावट की संभावना
यदि यूएई ओपेक की पाबंदियों से मुक्त होकर तेल का उत्पादन बढ़ाता है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की सप्लाई बढ़ेगी। सप्लाई बढ़ने से कीमतों में गिरावट आ सकती है, जिससे भारत में पेट्रोल और डीजल के दाम कम हो सकते हैं।
2. मजबूत रणनीतिक साझेदारी
पिछले कुछ वर्षों में पीएम मोदी के नेतृत्व में भारत और यूएई के संबंध नई ऊंचाइयों पर पहुंचे हैं।
तीसरा बड़ा साझेदार: यूएई भारत का तीसरा सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार है।
रुपये में व्यापार: दोनों देश अब कच्चे तेल का व्यापार स्थानीय मुद्रा (रुपये और दिरहम) में करने की दिशा में बढ़ रहे हैं। ओपेक से बाहर होने के बाद यूएई भारत को रियायती दरों पर अधिक तेल की आपूर्ति कर सकता है।
3. होर्मुज जलडमरूमध्य का जोखिम
हालांकि, एक बड़ा खतरा भी बरकरार है। यदि ईरान और अमेरिका के बीच तनाव के कारण होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) बंद होता है, तो यूएई ओपेक में रहे या न रहे, तेल की सप्लाई चेन बुरी तरह प्रभावित होगी। भारत के लिए यह रास्ता ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से सबसे महत्वपूर्ण है।




