Prabhat Vaibhav,Digital Desk : उत्तराखंड की राजधानी देहरादून इन दिनों किसी शहर से ज्यादा एक चलता-फिरता जाम चैंबर बन गई है। बाहर से चमकते हाईवे, कटे पहाड़ और नए एक्सप्रेसवे तैयार हैं, लेकिन शहर में कदम रखते ही हालात ऐसे लगते हैं कि मानो कोई अदृश्य दीवार कह रही हो, “दून में आपका स्वागत है… अब जाम में फंसकर अपनी परीक्षा दें।” सप्ताहांत हो, छुट्टी का दिन या सामान्य दिन, सड़कों पर रेंगती गाड़ियों की कतारें, हार्न की आवाज, सैलानियों की उलझन और स्थानीय लोगों की बेचैनी मिलकर दून को यातायात जाम की ‘राजधानी’ बना रही हैं।
मुख्य सड़कों पर जाम का आलम
राजपुर रोड, शहर की सबसे प्रमुख सड़क, सुबह 10 बजे से रात नौ बजे तक वाहनों से भरी रहती है। ट्रैफिक सिग्नलों के पास लंबी कतारें और दोनों तरफ अतिक्रमण ने सड़क की सांसें बंद कर रखी हैं। कौलागढ़-बल्लीवाला–आईएसबीटी कारिडोर भी अब ट्रैफिक का डरावना तिकोन बन चुका है। जीएमएस रोड, बल्लूपुर चौक और कमला पैलेस तिराहे पर वाहन ऐसे फंसते हैं कि बिना यातायात पुलिस के निकलना लगभग असंभव हो जाता है। आइएसबीटी के आसपास अनियंत्रित आटो-विक्रम और ई-रिक्शा, अवैध पार्किंग और बसों के प्रतिबंध के बावजूद सड़कों पर भीड़ लगातार बनी रहती है।
घंटाघर-चकराता रोड और मसूरी मार्ग पर पीक टाइम का दबाव
घंटाघर-चकराता रोड-प्रेमनगर मार्ग की सबसे बड़ी समस्या सड़क चौड़ी न होना और वाहनों की संख्या में तेजी से वृद्धि है। पीक टाइम में 1 किलोमीटर का सफर 30 से 40 मिनट में पूरा होता है। हरिद्वार बाईपास-जोगीवाला पर हाईवे की तेज रफ्तार शहर की सीमा में आते ही रुक जाती है। मसूरी मार्ग दून का सबसे ज्यादा दबाव झेलने वाला मार्ग बन गया है। सप्ताहांत, त्योहार या छुट्टी के दौरान यहां गाड़ियों की कतारें कई किलोमीटर लंबी हो जाती हैं। दून से ‘क्वीन ऑफ हिल्स’ तक का सफर जाम में तीन-चार घंटे तक खिंच जाता है। लाइब्रेरी चौक, हाथीपांव, भट्टाफाल, मैगी प्वाइंट और मसूरी डायवर्जन के समीप वाहन इंच-इंच बढ़ते हैं।
सैलानियों और शहरवासियों की निराशा
दिल्ली, नोएडा, गुरुग्राम, गाजियाबाद, मेरठ, पानीपत, पंजाब और उत्तर प्रदेश से आने वाले सैलानी अक्सर यही कहते हैं कि “हम हाईवे से तेज आए, पर शहर में कौन सा रास्ता लें?” एक्सप्रेसवे की रफ्तार पकड़कर आए पर्यटक शहर में कदम रखते ही जाम के जाल में फंस जाते हैं, जहां लंबी कतारें, धूप में तपते चेहरे और बढ़ता तनाव उनकी यात्रा का मजा खराब कर देते हैं। राजपुर रोड और जीएमएस रोड-बल्लीवाला चौक की ओर बढ़ते हुए उत्साह फीका पड़ जाता है।
प्रशासन की योजनाएं: कागज पर मजबूत, जमीन पर कमजोर
मल्टीलेवल पार्किंग, स्मार्ट सिग्नलिंग और ई-रिक्शा रूट पुनर्गठन की बातें सुनाई अधिक देती हैं, लेकिन शहर के दबाव वाले रूटों पर ट्रैफिक मैनेजमेंट और रोड इंजीनियरिंग की कमी साफ दिखती है। शहरवासी कहते हैं, “यातायात नहीं, अब तो जाम ही देहरादून की पहचान बन गया है।”
शहर का बढ़ता दबाव और सीमित सड़कें
हर साल करीब 50 हजार नए वाहन रजिस्टर होते हैं, लेकिन पार्किंग सुविधाएं नाम मात्र हैं। कम से कम 20–25 प्रतिशत रोड अतिक्रमण में घिरी हैं। 30 साल पुराने नक्शे पर चल रहा शहर नई आबादी, नई कॉलोनियां और अपार्टमेंट झेल नहीं पा रहा। पब्लिक ट्रांसपोर्ट की रीढ़ कमजोर होने के कारण लोग मजबूरी में निजी वाहन बढ़ा रहे हैं। नतीजा यह कि हाईवे चमकते हैं, लेकिन शहर की रफ्तार घुटनों पर आ गई है।




