img

Prabhat Vaibhav,Digital Desk : उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने रामनगर के बहुचर्चित और रोंगटे खड़े कर देने वाले 2016 के डकैती व यौन उत्पीड़न मामले में एक अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने इस मामले में सजा काट रहे पांचों अभियुक्तों को बरी कर दिया है। न्यायमूर्ति रवींद्र मैठाणी और न्यायमूर्ति सिद्धार्थ साह की खंडपीठ ने हल्द्वानी की विशेष पॉक्सो कोर्ट द्वारा सुनाई गई उम्रकैद की सजा के आदेश को रद्द करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में पूरी तरह विफल रहा है।

क्या था 2016 का वो सनसनीखेज मामला?

जुलाई 2016 की एक खौफनाक रात को रामनगर में करीब 10 से 12 हथियारबंद बदमाश एक घर में घुसे थे। बदमाशों ने न केवल परिवार के साथ मारपीट और लूटपाट की, बल्कि मां के सामने ही दो मासूम बच्चियों के साथ दरिंदगी (यौन उत्पीड़न) को अंजाम दिया था। इस घटना ने पूरे राज्य को हिलाकर रख दिया था। निचली अदालत ने 2016 में सफीक कुरैशी, रोहित, आमिर मोहम्मद, निजामुद्दीन और शौकीन मेवाती को दोषी मानते हुए कठोर कारावास और जुर्माने की सजा सुनाई थी।

हाईकोर्ट में क्यों कमजोर पड़ा पुलिस का पक्ष?

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में पुलिस जांच और अभियोजन की दलीलों में कई बड़ी खामियां उजागर की हैं, जिनके आधार पर अभियुक्तों को बरी किया गया:

पहचान की विफलता: सबसे मुख्य आधार यह रहा कि एफआईआर में किसी भी आरोपी का नाम नहीं था। चश्मदीदों और पीड़ितों ने बताया था कि हमलावरों ने चेहरे ढके हुए थे, केवल आंखें दिख रही थीं। कोर्ट ने पाया कि बिना किसी 'पहचान परेड' (Identification Parade) के अदालत में की गई पहचान विश्वसनीय नहीं है।

मेडिकल रिपोर्ट में विरोधाभास: कोर्ट ने चिकित्सा साक्ष्यों को भी संदिग्ध माना। घटना के तुरंत बाद हुई पहली जांच में पीड़ितों के शरीर पर चोट के निशान नहीं मिले थे, जबकि दो दिन बाद की रिपोर्ट में चोटें दर्ज की गईं। कोर्ट ने इस देरी और विसंगति पर सवाल उठाए।

बरामदगी पर सवाल: पुलिस द्वारा गहनों और चाकू की जो बरामदगी दिखाई गई थी, उसे भी कोर्ट ने अविश्वसनीय पाया। बरामदगी की प्रक्रिया के दौरान स्वतंत्र गवाहों की कमी और जांच अधिकारियों की मौजूदगी ने साक्ष्यों को कमजोर कर दिया।

निचली अदालत के फैसले को बताया त्रुटिपूर्ण

खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि हल्द्वानी की विशेष अदालत ने साक्ष्यों के उचित मूल्यांकन के बिना अभियुक्तों को सजा देने में गलती की थी। कोर्ट ने आदेश दिया कि यदि ये पांचों किसी अन्य मामले में वांछित नहीं हैं, तो उन्हें तुरंत जेल से रिहा किया जाए। इस मामले में अभियुक्तों की ओर से अधिवक्ता खुशी चौधरी ने पैरवी की थी।