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Prabhat Vaibhav,Digital Desk : पश्चिम एशिया में जारी भीषण संघर्ष आज अपने 18वें दिन में प्रवेश कर गया है, लेकिन शांति की कोई किरण नजर नहीं आ रही है। युद्ध की यह आग अब केवल सीमाओं तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसका मनोवैज्ञानिक और आर्थिक असर सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), कतर और लेबनान जैसे देशों के आम नागरिकों पर साफ देखा जा रहा है। जैसे-जैसे मिसाइलों और ड्रोन्स के हमले तेज हो रहे हैं, इन संपन्न देशों में रहने वाले लोग गहरे डर और अनिश्चितता के साये में जीने को मजबूर हैं। बाज़ारों में सन्नाटा है और लोगों के मन में बस एक ही सवाल है—क्या यह संघर्ष विश्व युद्ध की शुरुआत है?

सऊदी और यूएई में बढ़ी चिंता, व्यापारिक गलियारों में हलचल

खाड़ी के सबसे स्थिर माने जाने वाले देश सऊदी अरब और यूएई में भी अब युद्ध की तपिश महसूस की जा रही है। हालांकि यहाँ सीधे तौर पर कोई हमला नहीं हुआ है, लेकिन सुरक्षित माने जाने वाले इन देशों के नागरिक अब भविष्य को लेकर आशंकित हैं। यूएई के व्यापारिक केंद्रों और पर्यटन स्थलों पर पर्यटकों की आवाजाही पर असर पड़ने लगा है। तेल की कीमतों में संभावित उछाल और एयरस्पेस के बंद होने के डर ने यहाँ के निवासियों को जरूरी सामानों का स्टॉक करने पर मजबूर कर दिया है। लोगों को डर है कि यदि ईरान और इस्राइल के बीच सीधा टकराव बढ़ा, तो पूरा क्षेत्र इसकी चपेट में आ जाएगा।

लेबनान में तबाही का मंजर और कतर की कूटनीतिक दौड़

लेबनान की स्थिति सबसे भयावह बनी हुई है। यहाँ के सीमावर्ती इलाकों में रहने वाले हजारों परिवार अपना घर-बार छोड़कर सुरक्षित स्थानों की ओर पलायन कर रहे हैं। राजधानी बेरुत में आए दिन होने वाले धमाकों ने लोगों की रातों की नींद उड़ा दी है। वहीं, कतर जो अब तक मध्यस्थ की भूमिका में था, वहां भी अब डर का माहौल है। कतर में रहने वाले विदेशी कामगार अपने वतन वापसी की योजना बना रहे हैं। कतर सरकार लगातार युद्धविराम के लिए कूटनीतिक प्रयास कर रही है, लेकिन 18वें दिन भी सफलता हाथ नहीं लगी है।

आम आदमी की आंखों में आंसू और बेबसी

सऊदी से लेकर लेबनान तक, आम लोगों की दिनचर्या पूरी तरह बदल गई है। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो और खबरें डर को और बढ़ा रही हैं। लेबनान के एक स्थानीय निवासी ने बताया कि हर आहट पर उन्हें धमाके का अहसास होता है। बच्चों के स्कूल बंद हैं और अस्पतालों में घायलों की भीड़ बढ़ती जा रही है। खाड़ी देशों में काम करने वाले लाखों भारतीय प्रवासी भी अपने परिवारों की सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं और लगातार दूतावासों के संपर्क में हैं। पश्चिम एशिया का यह संघर्ष अब केवल दो देशों की जंग नहीं, बल्कि मानवीय त्रासदी में बदलता जा रहा है।