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Prabhat Vaibhav, Digital Desk : आम आदमी पार्टी (AAP) के भविष्य पर अब तक का सबसे बड़ा संकट मंडरा रहा है। पार्टी के दिग्गज नेता और राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा के नेतृत्व में एक अभूतपूर्व विद्रोह हुआ है, जिसने दिल्ली से लेकर पंजाब तक की सियासत में भूचाल ला दिया है। खबर है कि राघव चड्ढा, स्वाति मालीवाल और हरभजन सिंह समेत कुल 7 सांसद आम आदमी पार्टी को अलविदा कहकर भारतीय जनता पार्टी (BJP) में शामिल होने जा रहे हैं। इस सामूहिक इस्तीफे ने 'आप' के वजूद पर ही सवालिया निशान लगा दिया है।

'दो-तिहाई' सांसदों के साथ बगावत: कानूनी पेंच से बचने की तैयारी

एक नाटकीय प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान सांसद राघव चड्ढा ने संदीप पाठक और अशोक मित्तल के साथ अपने इस्तीफे का ऐलान किया। चड्ढा ने दावा किया कि उनके पास राज्यसभा में आम आदमी पार्टी के दो-तिहाई सदस्यों का समर्थन प्राप्त है। संविधान के प्रावधानों के अनुसार, यदि दो-तिहाई सदस्य एक साथ पाला बदलते हैं, तो उन पर दलबदल विरोधी कानून के तहत कार्रवाई का खतरा कम हो जाता है। चड्ढा ने स्पष्ट किया कि वे सभी मिलकर भाजपा में शामिल होने का निर्णय ले चुके हैं।

इन दिग्गजों ने छोड़ा केजरीवाल का साथ

भाजपा में शामिल होने वाले संभावित नामों की सूची में 'आप' के वे चेहरे शामिल हैं जो पार्टी की रीढ़ माने जाते थे:

राघव चड्ढा (पार्टी का युवा चेहरा)

स्वाति मालीवाल (पूर्व DCW अध्यक्ष)

हरभजन सिंह (पूर्व क्रिकेटर)

संदीप पाठक (रणनीतिकार)

अशोक मित्तल

विक्रमजीत सिंह साहनी

संजीव अरोड़ा

"सिद्धांतों से भटक गई है पार्टी": राघव चड्ढा का तीखा हमला

पार्टी छोड़ने के कारणों पर बात करते हुए राघव चड्ढा भावुक नजर आए। उन्होंने कहा, "मैंने अपनी जवानी के 15 साल और अपना खून-पसीना इस पार्टी को सींचने में लगा दिया। लेकिन आज यह पार्टी अपने मूल सिद्धांतों और मूल्यों से पूरी तरह भटक गई है। यह अब राष्ट्रहित के बजाय निजी स्वार्थ के लिए काम कर रही है।" वहीं संदीप पाठक ने भी भारी मन से कहा कि उन्होंने हमेशा केजरीवाल और पार्टी को खुद से ऊपर रखा, लेकिन अब स्थितियां बदल चुकी हैं।

आम आदमी पार्टी के लिए अस्तित्व की लड़ाई

यदि ये सात सांसद एक साथ भाजपा का दामन थामते हैं, तो राज्यसभा में आम आदमी पार्टी की ताकत लगभग शून्य हो जाएगी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह अरविंद केजरीवाल के लिए अब तक का सबसे बड़ा राजनीतिक झटका है। चुनाव से ठीक पहले इतने बड़े स्तर पर हुई बगावत पार्टी के संगठन को पूरी तरह छिन्न-भिन्न कर सकती है। अब देखना यह होगा कि आम आदमी पार्टी इस 'सियासी सुनामी' का सामना कैसे करती है।