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Prabhat Vaibhav,Digital Desk : पहाड़ों में गुलदार (तेंदुए) का खौफ अब केवल सूरज ढलने तक सीमित नहीं रह गया है। अगर आप यह सोचकर निश्चिंत हैं कि दिन के उजाले में गुलदार हमला नहीं करेगा, तो आप भारी भूल कर रहे हैं। 'बायोलॉजी बुलेटिन' जर्नल में प्रकाशित एक हालिया और चौंकाने वाले शोध ने सदियों पुरानी इस धारणा को तोड़ दिया है कि हिंसक जानवर केवल रात के अंधेरे में सक्रिय होते हैं। शोध के नतीजे बताते हैं कि गुलदार अब अपना व्यवहार बदल चुका है और वह दिन के वक्त ही इंसानों और मवेशियों को अपना निवाला बना रहा है।

92 फीसदी हमले दिन में: टिहरी के आंकड़ों ने चौंकाया

गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय हरिद्वार के सेवानिवृत्त प्रोफेसर दिनेश भट्ट के नेतृत्व में किए गए इस विस्तृत अध्ययन में टिहरी जिले को केंद्र बनाया गया। वर्ष 2011 से 2021 के बीच के आंकड़ों और लगभग 300 ग्रामीणों के अनुभवों के आधार पर जो सच सामने आया है, वह रोंगटे खड़े कर देने वाला है। रिपोर्ट के अनुसार, क्षेत्र में होने वाले कुल हमलों में से 92 प्रतिशत हमले दिन के उजाले में हुए हैं, जबकि केवल 8 प्रतिशत घटनाओं में गुलदार ने रात का इंतजार किया। यह बदलाव मानव-वन्यजीव संघर्ष की दिशा में एक नया और बेहद खतरनाक मोड़ है।

झाड़ियों का 'जाल' और घात लगाता गुलदार

अध्ययन में इस व्यवहार परिवर्तन के पीछे 'लैंटाना' (Lantana) की घनी झाड़ियों को सबसे बड़ी वजह माना गया है। यह शत्रु वनस्पति गांवों की पगडंडियों, खेतों के किनारों और रास्तों पर तेजी से फैल चुकी है। इसकी सघनता इतनी अधिक होती है कि गुलदार इसमें छिपकर बड़ी आसानी से दिन में भी घात लगा लेता है। शोध में पाया गया कि 61 प्रतिशत हमले गांव के रास्तों और पगडंडियों पर हुए, जबकि 30 प्रतिशत हमले घरों के बिल्कुल पास दर्ज किए गए। हैरान करने वाली बात यह है कि जंगल के भीतर हमले की दर केवल 7 प्रतिशत रही, जो सिद्ध करता है कि गुलदार अब जंगलों से निकलकर आबादी वाले रास्तों पर अपना डेरा जमा चुका है।

11 साल में गई 29 जानें, व्यवहार बदलने से बढ़ी चुनौती

आंकड़ों की भयावहता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 11 वर्षों के भीतर केवल इस क्षेत्र में गुलदार के हमलों में 29 लोगों की मौत हुई और 77 लोग गंभीर रूप से घायल हुए। शोधकर्ताओं का मानना है कि जंगलों में प्राकृतिक शिकार की कमी और इंसानी बस्तियों के पास छिपने के सुरक्षित ठिकानों (लैंटाना झाड़ियों) की उपलब्धता ने गुलदार को और अधिक आक्रामक और निडर बना दिया है। अब वह खेत जाने वाले किसानों, स्कूल जाने वाले बच्चों और बाजार जाने वाले ग्रामीणों के लिए दिन के वक्त भी काल बनकर मंडरा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर समय रहते इन झाड़ियों का उन्मूलन नहीं किया गया और सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम नहीं हुए, तो आने वाले समय में यह संघर्ष और भी जानलेवा हो सकता है।