बचपन से दाहिना पैर दिव्यांग, फिर भी नहीं मानी हार; जमुई के शैलेश ने जापान में जीता गोल्ड

बचपन से दाहिना पैर दिव्यांग, फिर भी नहीं मानी हार; जमुई के शैलेश ने जापान में जीता गोल्ड

कठिन परिस्थितियां, शरीर की शारीरिक सीमाएं और समाज के ताने अक्सर साधारण इंसान के हौसलों को तोड़कर रख देते हैं, लेकिन कुछ असाधारण प्रतिभाएं ऐसी होती हैं जो अपनी जिद और पक्के इरादों से किस्मत की लकीरों को ही बदल देती हैं। बिहार के एक छोटे से जिले जमुई के सुदूर ग्रामीण इलाके से ताल्लुक रखने वाले युवा शैलेश कुमार ने अपनी शारीरिक कमजोरी को कभी अपनी लाचारी नहीं बनने दिया। बचपन से ही दाहिने पैर में दिव्यांगता का दंश झेलने वाले शैलेश ने विपरीत परिस्थितियों से लोहा लेते हुए हाल ही में जापान की धरती पर आयोजित एक प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए स्वर्ण पदक (Gold Medal) अपने नाम कर लिया है। उनकी इस ऐतिहासिक और गौरवान्वित कर देने वाली सफलता ने न केवल उनके परिवार और गृह जिले जमुई का मस्तक ऊंचा कर दिया है, बल्कि पूरे देश में भारत का तिरंगा झंडा शान से लहराकर अंतरराष्ट्रीय मंच पर देश का नाम अमर कर दिया है।

शैलेश कुमार का यहां तक पहुंचने का सफर फूलों की सेज बिल्कुल नहीं रहा है, बल्कि यह पसीने, आंसुओं और संघर्षों के अनगिनत कांटों से भरा हुआ था। जमुई के एक साधारण परिवार में जन्मे शैलेश को जब बचपन में पोलियो या अन्य कारणों से अपने दाहिने पैर में दिव्यांगता का सामना करना पड़ा, तो उनके सामने भविष्य को लेकर तमाम सवाल खड़े हो गए थे। चलने-फिरने में भारी परेशानी होने के बावजूद उनके भीतर खेलकूद और कुछ कर दिखाने की जो आग सुलग रही थी, उसे किसी भी शारीरिक बाधा ने बुझाया नहीं। शुरुआती दिनों में जब उनके पास खेलने के लिए आधुनिक खेल उपकरण या जूते तक नहीं थे, तब उन्होंने अपने गांव के उबड़-खाबड़ खेतों और मिट्टी के मैदानों में ही पसीना बहाना शुरू किया। स्थानीय स्तर पर जब उन्होंने खेलना शुरू किया, तो कई लोगों ने उन्हें ताने भी दिए कि इस शारीरिक स्थिति के साथ खेलकूद में कुछ हासिल नहीं किया जा सकता, लेकिन शैलेश ने अपनी बहरी कानों से उन तमाम नकारात्मक आवाजों को दरकिनार कर दिया और पूरी तरह से अपने अभ्यास पर फोकस रखा।

अपनी कड़ी मेहनत, निरंतरता और उत्कृष्ट खेल कौशल के दम पर राष्ट्रीय स्तर पर कई पदक जीतने के बाद आखिरकार शैलेश कुमार का चयन जापान में होने वाली इस अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिता के लिए हुआ। जापान के बड़े स्टेडियम में जब दुनिया भर के बेहतरीन और फिट एथलीटों के बीच मुकाबला चल रहा था, तब शैलेश ने अपने जज्बे और शानदार तकनीक का प्रदर्शन करते हुए सभी को पीछे छोड़ दिया। प्रतियोगिता के फाइनल राउंड में उन्होंने अभूतपूर्व प्रदर्शन करते हुए अपने सभी प्रतिद्वंद्वियों को कड़ी शिकस्त दी और स्वर्ण पदक पर अपना कब्जा जमा लिया। जैसे ही मंच पर भारत का राष्ट्रगान बजा और उनके गले में गोल्ड मेडल पहनाया गया, उनकी आंखों में संघर्ष के वे तमाम दिन तैर गए जिन्हें उन्होंने अकेले रहकर काटा था। जापान के उस अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का राष्ट्रीय ध्वज ऊंचा होते देख वहां मौजूद हर भारतीय की छाती गर्व से फूल उठी।

शैलेश कुमार की यह असाधारण सफलता आज देश के करोड़ों युवाओं, खासकर उन लाखों दिव्यांग भाई-बहनों के लिए एक बहुत बड़ी प्रेरणा है जो किसी न किसी शारीरिक या मानसिक चुनौती के कारण अपने जीवन में हार मान लेते हैं। शैलेश ने यह साबित कर दिया है कि सफलता आपके शरीर के अंगों से नहीं, बल्कि आपके मजबूत इरादों और अटूट आत्मविश्वास से तय होती है। जापान से स्वर्ण पदक जीतकर स्वदेश लौटने पर उनका भव्य स्वागत किया गया और विभिन्न प्रशासनिक अधिकारियों तथा खेल प्रेमियों ने उन्हें बधाई दी। अपनी इस सफलता का श्रेय अपने माता-पिता, गुरुओं और अपनी कड़ी मेहनत को देने वाले शैलेश का अगला लक्ष्य आगामी वैश्विक आयोजनों में देश के लिए और अधिक पदक जीतना है। उनकी यह कहानी चीख-चीख कर यह कहती है कि राहें चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, यदि आपके कदम आगे बढ़ने का जज्बा रखते हैं, तो एक दिन दुनिया आपके कदमों में झुकने को मजबूर हो जाती है।