'चक्रव्यूह में अभिमन्यु की तरह अकेला पड़ गया था', हार के बाद अभिषेक झा का छलका दर्द

'चक्रव्यूह में अभिमन्यु की तरह अकेला पड़ गया था', हार के बाद अभिषेक झा का छलका दर्द

राजनीति की दुनिया जितनी बाहर से चमकदार और आकर्षक दिखाई देती है, अंदर से उतनी ही बेरहम और स्वार्थी होती है। चुनाव के मैदान में जब हार का सामना करना पड़ता है, तो कई बार कड़वी सच्चाइयां खुलकर सामने आ जाती हैं। ऐसा ही कुछ देखने को मिला जब जाने-माने राजनेता और युवा चेहरे अभिषेक झा ने अपनी हालिया चुनावी हार के बाद खुलकर अपना दर्द बयां किया। एक दिल को छू लेने वाले और बेहद तीखे इंटरव्यू में अभिषेक झा ने कहा कि चुनावी रणक्षेत्र में वे बिल्कुल महाभारत के वीर अभिमन्यु की तरह अकेले पड़ गए थे, जिन्हें अपनों ने ही चक्रव्यूह के ऐसे मोर्चे पर छोड़ दिया था जहां से निकलना नामुमकिन था। उनके इस बयान के सामने आते ही सियासी गलियारों में भूचाल आ गया है और यह चर्चा तेज हो गई है कि आखिर वे कौन लोग थे जिन्होंने अपनों की ही पीठ में छुरा घोंपा। आइए जानते हैं अभिषेक झा के इस दर्दनाक और विस्फोटक खुलासे की पूरी कहानी विस्तार से।

चुनावी मैदान में अकेले पड़ने की दास्तान और अपनों के भीतरघात का दर्द

अभिषेक झा ने मीडिया के सामने अपने दिल का गुबार निकालते हुए बताया कि चुनाव प्रचार के दौरान उन्हें किस प्रकार की मानसिक और रणनीतिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ा। उन्होंने कहा कि उन्होंने पार्टी की जीत के लिए दिन-रात एक कर दिया था, जनता के बीच जाकर अपनी नीतियां रखीं और पूरी ईमानदारी के साथ जनसंपर्क अभियान चलाया। लेकिन जब वक्त समर्थन और एकजुटता दिखाने का था, तो पार्टी के भीतर के कुछ जयचंदों और स्वार्थी तत्वों ने उनकी राह में कांटे बिछाने शुरू कर दिए। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि बाहरी दुश्मनों से तो लड़ा जा सकता है, लेकिन जब अपने ही लोग पीठ पीछे खंजर भोंकने लगें, तो मजबूत से मजबूत योद्धा भी धराशायी हो जाता है। यही कारण था कि वे चुनाव के उस जटिल चक्रव्यूह में फंसकर रह गए, जहां उन्हें चारों तरफ से अपनों का ही असहयोग मिला।

महाभारत के अभिमन्यु से क्यों की अपनी तुलना, क्या था वह राजनीतिक चक्रव्यूह?

अभिषेक झा ने अपने राजनीतिक संघर्ष की तुलना पौराणिक पात्र अभिमन्यु से करते हुए कहा कि जिस तरह चक्रव्यूह में प्रवेश करने के बाद अभिमन्यु को अपनों की रणनीति और अपनों के धोखे के कारण अपनी जान गंवानी पड़ी थी, कुछ वैसा ही हाल उनके साथ चुनावी मैदान में किया गया। उन्हें उम्मीद थी कि पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व और स्थानीय कार्यकर्ता उनके साथ कंधे से कंधا मिलाकर चलेंगे, लेकिन ऐन वक्त पर उन्हें योजनाबद्ध तरीके से अकेला छोड़ दिया गया। न तो समय पर प्रचार सामग्री पहुंचाई गई और न ही बूथ मैनेजमेंट के लिए जरूरी संसाधन मुहैया कराए गए। यह सब इस साजिश के तहत किया गया ताकि वे चुनाव हार जाएं। इस खुलासे ने राजनीतिक विश्लेषकों को भी हैरान कर दिया है कि कैसे आंतरिक कलह किसी भी मजबूत उम्मीदवार को हराने के लिए काफी होती है।

पार्टी के भीतर की गुटबाजी और टिकट वितरण की नीतियों पर उठे गंभीर सवाल

अभिषेक झा के इस बयान के बाद अब पार्टी के भीतर की गुटबाजी खुलकर सतह पर आ गई है। विश्लेषकों का मानना है कि यह केवल एक व्यक्ति का दर्द नहीं है, बल्कि आज के राजनीतिक दलों में जिस तरह से भाई-भतीजावाद, टिकट बंटवारे में धांधली और आपसी खींचतान चल रही है, उसका यह जीता-जागता प्रमाण है। जब पार्टी के भीतर ही लोग यह तय करने लगते हैं कि कौन जीतेगा और कौन हारेगा, तो जनता की आवाज दब जाती है। अभिषेक झा ने इशारों-इशारों में उन तमाम वरिष्ठ नेताओं और पदाधिकारियों पर भी सवाल उठाए जिन्होंने चुनावी दौर में उनसे दूरी बना ली थी और विरोधी खेमों के साथ गुप्त समझौते कर लिए थे। इस तरह की कार्यशैली पार्टी के जमीनी आधार को खोखला कर देती है और कर्मठ कार्यकर्ताओं का मोहभंग होने लगता है।

समर्थकों में भारी गुस्सा और जनता के बीच सहानुभूति की लहर

जैसे ही अभिषेक झा का यह साक्षात्कार प्रसारित हुआ, उनके समर्थकों और क्षेत्र की आम जनता के बीच भारी गुस्सा और आक्रोश देखने को मिला। सोशल मीडिया पर उनके समर्थन में हजारों संदेश वायरल होने लगे, जिसमें लोगों ने लिखा कि जनता उनके साथ थी लेकिन कुछ राजनीतिक दलालों ने उनकी जीत को साजिश के तहत हरा दिया। समर्थकों ने मांग की है कि पार्टी हाईकमान को इस मामले का संज्ञान लेना चाहिए और भीतरघात करने वाले उन चेहरों को बेनकाब कर पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाना चाहिए। दूसरी तरफ, आम जनता के बीच अभिषेक झा के प्रति गहरी सहानुभूति की लहर दौड़ गई है, क्योंकि एक युवा और जुझारू नेता को इस तरह षड्यंत्र के तहत गिराए जाने से लोग आहत हैं।

राजनीतिक भविष्य और आगे की रणनीति: क्या अब कोई नया कदम उठाएंगे अभिषेक झा?

इस बड़ी हार और अपनों के धोखे के बाद अब यह सवाल सबसे बड़ा बन गया है कि अभिषेक झा का अगला राजनीतिक कदम क्या होगा? क्या वे पार्टी के भीतर रहकर इन भीतरघाती ताकतों के खिलाफ जंग जारी रखेंगे या फिर कोई नया और बड़ा राजनीतिक फैसला लेंगे? जानकारों का कहना है कि राजनीति में धैर्य और संघर्ष बहुत जरूरी होता है, और अभिषेक झा जिस तरह से खुलकर सामने आए हैं, उससे यह साफ है कि वे इतनी आसानी से हार मानने वाले नहीं हैं। उनका यह दर्द भरा बयान आने वाले दिनों में पार्टी के भीतर एक बड़े आंतरिक विद्रोह या पुनर्गठन की वजह बन सकता है। फिलहाल, इस पूरे प्रकरण ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि राजनीति में सबसे खतरनाक दुश्मन बाहर नहीं बल्कि अपनों के बीच ही छिपे होते हैं।