राजकुमार राव की फिल्म का 13 साल बाद OTT पर आना और पुराना दर्द
भारतीय सिनेमा जगत में कई ऐसी बेहतरीन और वैचारिक फिल्में बनती हैं जो अपने समय से इतनी आगे होती हैं कि बॉक्स ऑफिस की कमर्शियल चकाचौंध में दबकर रह जाती हैं, लेकिन वक्त गुजरने के साथ उनकी प्रासंगिकता और गहराई लोगों को समझ में आती है। बॉलीवुड के वर्सेटाइल और मंजे हुए अभिनेता राजकुमार राव (Rajkummar Rao) के अभिनय से सजी एक ऐसी ही फिल्म को रिलीज होने के लिए पूरे 13 साल का लंबा इंतजार करना पड़ा। जब इतने लंबे अंतराल के बाद यह फिल्म आखिरकार एक प्रमुख ओटीटी (OTT) प्लेटफॉर्म पर दर्शकों के सामने आई, तो न केवल दर्शकों ने इसकी गहराई को सराहा, बल्कि इसके मूल लेखक और रचनाकारों का पुराना दर्द भी एक बार फिर से ताजा हो गया। इतने सालों बाद जब फिल्म के राइटर ने इसकी रिलीज और उस दौर के हालातों को याद किया, तो उनका कलेजा कचोट उठा और उन्होंने देश की मौजूदा व्यवस्था और 'डर की राजनीति' पर कई तीखे और गंभीर सवाल खड़े किए।
'डर की राजनीति' और सेंसरशिप के उस दौर की अनकही दास्तान
यह फिल्म जब अपने शुरुआती निर्माण के दौर में थी और रिलीज होने के लिए संघर्ष कर रही थी, तब देश के राजनीतिक और सामाजिक माहौल में वैचारिक असहिष्णुता और सेंसरशिप की दीवारें बहुत ऊंची हुआ करती थीं। फिल्म की कहानी एक ऐसे संवेदनशील विषय पर आधारित थी जो समाज में व्याप्त डर, राजनीतिक षड्यंत्रों और आम आदमी की बेबसी को बहुत ही बेबाकी के साथ आईना दिखाने का काम करती है। लेखक का कहना है कि उस दौर में इस तरह की कहानी को पर्दे पर उतारना किसी बड़े खतरे से खाली नहीं था। सेंसर बोर्ड के कैंची चलाने से लेकर राजनीतिक दबाव और धमकियों के बीच इस फिल्म को सिनेमाघरों तक पहुँचाने में जो संघर्ष करना पड़ा, वह किसी बुरे सपने जैसा था। आज जब 13 साल बाद यह फिल्म बिना किसी डर के डिजिटल प्लेटफॉर्म पर स्वतंत्र रूप से उपलब्ध है, तो यह इस बात की गवाही देती है कि सच को भले ही कुछ समय के लिए दबाया जा सकता है, लेकिन उसे हमेशा के लिए मिटाया नहीं जा सकता।
राइटर का छलका दर्द और रचनात्मक स्वतंत्रता पर बहस
फिल्म के लेखक ने सोशल मीडिया और इंटरव्यू के माध्यम से अपने दिल का हाल बयां करते हुए कहा कि एक कलाकार और लेखक के लिए अपनी ही रचना को वर्षों तक बक्से में बंद देखना सबसे बड़ी पीड़ा होती है। जब कोई रचनाकार समाज की सच्चाई को कला के माध्यम से कागज़ पर उतारता है, तो वह यह उम्मीद करता है कि लोग उसे देखें और उस पर विचार करें। लेकिन जब सत्ता और व्यवस्था के डर से उस पर पाबंदियां लगा दी जाती हैं, तो यह सृजन की स्वतंत्रता की हत्या जैसा होता है। राइटर ने आज के दौर की राजनीतिक परिस्थितियों पर कटाक्ष करते हुए कहा कि आज भी 'डर की राजनीति' समाज के एक बड़े हिस्से को जकड़े हुए है, जहाँ असहमतियों की आवाज़ को दबाने के लिए हरसंभव हथकंडे अपनाए जाते हैं। उनका यह बयान फिल्म जगत में एक बार फिर से इस बात की बहस छेड़ रहा है कि क्या कलाकारों को अपनी बात कहने के लिए अभी भी वैचारिक गुलामी का सामना करना पड़ता है।
डिजिटल युग में सिनेमा का नया सफर और दर्शकों की प्रतिक्रिया
आज के ओटीटी युग में जब दर्शक पारंपरिक सिनेमाघरों की सीमाओं से बाहर निकलकर दुनिया भर की बेहतरीन और साहसिक कहानियों को अपने मोबाइल और लैपटॉप पर देख रहे हैं, तो ऐसी पुरानी और दबी हुई फिल्मों को एक नया जीवन मिल रहा है। राजकुमार राव की इस फिल्म को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर मिलने वाला रिस्पॉन्स इस बात का प्रमाण है कि आज का दर्शक लीक से हटकर बनाई गई गंभीर और वैचारिक कहानियों को बेहद पसंद कर रहा है। 13 साल की लंबी खामोशी और कानूनी-प्रशासनिक लड़ाइयां लड़ने के बाद जब यह फिल्म जनता के बीच आई है, तो यह न केवल उस फिल्म की जीत है, बल्कि हर उस लेखक की जीत है जो सच लिखने काौहौसला रखता है। यह घटना इस बात की याद दिलाती है कि कला का असली मकसद समाज के सोए हुए जमीर को जगाना है, चाहे उसके लिए कितना भी लंबा इंतजार क्यों न करना पड़े।