फिल्मी परिवार से होने के बाद भी शम्मी कपूर को करना पड़ा था संघर्ष

फिल्मी परिवार से होने के बाद भी शम्मी कपूर को करना पड़ा था संघर्ष

भारतीय सिनेमा के इतिहास में जब भी ऊर्जा, जिंदादिली और अनूठे डांसिंग स्टाइल का जिक्र होता है, तो सबसे पहला नाम शम्मी कपूर का आता है। कपूर खानदान की प्रसिद्ध और प्रतिष्ठित फिल्मी पृष्ठभूमि से ताल्लुक रखने वाले शम्मी कपूर ने अपनी अदाकारी से दर्शकों के दिलों पर दशकों तक राज किया। हालांकि, अक्सर लोगों को लगता है कि एक बड़े फिल्मी परिवार का हिस्सा होने के कारण उनका रास्ता बेहद आसान रहा होगा, लेकिन हकीकत इसके बिल्कुल उलट है। दिग्गज अभिनेता पृथ्वीराज कपूर के बेटे और राज कपूर के छोटे भाई होने के बावजूद शम्मी कपूर को इंडस्ट्री में अपनी जगह बनाने के लिए कई सालों तक कड़ा संघर्ष करना पड़ा था। उनके शुरुआती करियर में असफलताओं का एक ऐसा दौर आया जिसने उन्हें पूरी तरह से तोड़ने की कोशिश की, लेकिन अपनी लगन और कुछ अलग करने के जुनून के बल पर उन्होंने बॉलीवुड में अपना एक नया इतिहास लिख दिया।

शम्मी कपूर ने जब सिनेमा की दुनिया में कदम रखा, तो उन पर अपने पिता पृथ्वीराज कपूर की थिएटर शैली और बड़े भाई राज कपूर की चार्ली चैपलिन से प्रेरित गंभीर अदाकारी की गहरी छाप थी। शुरुआती दौर में उन्होंने जो भी फिल्में कीं, उनमें वे अपनी खुद की पहचान पेश करने के बजाय अपने परिवार की स्थापित अभिनय शैली की नकल करते नजर आए। नतीजतन, उनकी एक के बाद एक लगातार 18 से अधिक फिल्में बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह फ्लॉप साबित हुईं। एक दौर ऐसा आ गया था जब फिल्म मेकर्स उन्हें फ्लॉप अभिनेता मानने लगे थे और उन्हें मुख्य भूमिकाएं देने से कतराने लगे थे। इस असफलता के दौर ने उन्हें गहराई से निराश किया, लेकिन उन्होंने हार मानने के बजाय खुद को पूरी तरह से बदलने का फैसला किया।

लगातार फ्लॉप फिल्मों का दौर और खुद को री-इन्वेंट करने की ऐतिहासिक चुनौती

शमशेर राज कपूर यानी शम्मी कपूर ने महसूस किया कि जब तक वे अपने परिवार की छाया से बाहर नहीं निकलेंगे और अपनी एक अलग शैली नहीं विकसित करेंगे, तब तक दर्शक उन्हें स्वीकार नहीं करेंगे। उस दौर में हिंदी सिनेमा के मुख्य अभिनेताओं का अंदाज बेहद गंभीर, शांत और भावनात्मक हुआ करता था। दिलीप कुमार, देव आनंद और राज कपूर जैसे दिग्गज अपनी-अपनी विशिष्ट शैलियों के साथ इंडस्ट्री पर हावी थे। ऐसे माहौल में शम्मी कपूर ने एक बड़ा जोखिम लेने का मन बनाया और खुद के लुक, बॉडी लैंग्वेज और अभिनय के तरीके को पूरी तरह से बदलने की दिशा में काम शुरू किया।

उन्होंने सबसे पहले अपने मूंछों वाले पारंपरिक लुक को अलविदा कहा और अपनी हेयरस्टाइल से लेकर कपड़ों तक में एक आधुनिक और पश्चिमी स्पर्श शामिल किया। उन्होंने खुद को एक ऐसे युवा नायक के रूप में गढ़ा जो बेपरवाह है, मस्ती से भरा है और अपनी शर्तों पर जिंदगी जीता है। उनका यह नया अवतार केवल उनके कपड़ों या लुक तक सीमित नहीं था, बल्कि उन्होंने अपने हाव-भाव और बातचीत की शैली को भी पूरी तरह से बदल दिया। यह भारतीय सिनेमा के किसी स्थापित फिल्मी परिवार के चिराग द्वारा किया गया अपनी तरह का पहला और बहुत बड़ा प्रयोग था, जिसने आगे चलकर पूरी इंडस्ट्री की सोच को बदल कर रख दिया।

'तुमसा नहीं देखा' से बदली किस्मत और 'जंगली' के 'याहू' से मिला सुपरस्टार का दर्जा

वर्ष 1957 में आई फिल्म 'तुमसा नहीं देखा' शम्मी कपूर के करियर का सबसे बड़ा टर्निंग प्वाइंट साबित हुई। इस फिल्म में दर्शकों ने एक बिल्कुल नए, ऊर्जावान और आकर्षक शम्मी कपूर को देखा। फिल्म बॉक्स ऑफिस पर ब्लॉकबस्टर रही और इसके साथ ही शम्मी कपूर का फ्लॉप दौर हमेशा के लिए समाप्त हो गया। इसके बाद वर्ष 1961 में रिलीज हुई फिल्म 'जंगली' ने तो सफलता के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए। इस फिल्म के आइकॉनिक गाने "चाहे कोई मुझे जंगली कहे" में जब शम्मी कपूर ने बर्फ से ढकी पहाड़ियों पर कूदते हुए "याहू!" का नारा लगाया, तो पूरा देश उनका दीवाना हो गया।

'जंगली' की जबरदस्त सफलता के बाद शम्मी कपूर रातों-रात भारतीय सिनेमा के पहले 'रॉकस्टार' और 'रिबेल स्टार' बन गए। उनकी फिल्मों के गानों का दर्शक बेसब्री से इंतजार करने लगे। दिलचस्प बात यह है कि शम्मी कपूर अपनी फिल्मों के ज्यादातर गानों की कोरियोग्राफी खुद ही करते थे। उन्होंने कभी भी किसी औपचारिक डांस मास्टर या कोरियोग्राफर से नृत्य की शिक्षा नहीं ली थी। उनके डांस में जो बेफिक्री, उछल-कूद और लयबद्धता थी, वह पूरी तरह से उनकी अपनी उपज थी। जब वे गाने की धुन पर थिरकते थे, तो ऐसा लगता था जैसे संगीत खुद उनके शरीर के जरिए बाहर निकल रहा हो।

कपूर विरासत से अलग बनाई अपनी निजी पहचान और बने भारतीय सिनेमा के रॉकस्टार

शम्मी कपूर का करियर इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि भले ही आपको पारिवारिक पृष्ठभूमि के कारण इंडस्ट्री में शुरुआती ब्रेक मिल जाए, लेकिन लंबी रेस का घोड़ा बनने के लिए व्यक्तिगत प्रतिभा, कड़ी मेहनत और मौलिकता की ही आवश्यकता होती है। उन्होंने अपनी मेहनत से साबित किया कि वे किसी के नाम के मोहताज नहीं हैं, बल्कि उनकी अपनी एक मजबूत और अमिट पहचान है। 60 के दशक में उन्होंने 'प्रोफेसर', 'एन इवनिंग इन पेरिस', 'तीसरी मंजिल', 'ब्रह्मचारी' और 'प्रिंस' जैसी एक से बढ़कर एक सुपरहिट फिल्में दीं, जिन्होंने उन्हें बॉलीवुड के सबसे महंगे और सफल अभिनेताओं की कतार में ला खड़ा किया।

उनका यह अंदाज और बेफिक्र अभिनय शैली आने वाली कई पीढ़ियों के अभिनेताओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी। गोविंदा, सलमान खान और यहां तक कि उनके पोते रणबीर कपूर तक कई कलाकारों ने शम्मी कपूर की इस सहज और ऊर्जावान अभिनय शैली से प्रेरणा लेने की बात खुलकर स्वीकार की है। शम्मी कपूर ने न केवल अपनी किस्मत खुद लिखी, बल्कि उन्होंने हिंदी सिनेमा में नायक की परिभाषा को ही बदल कर रख दिया। एक ऐसा अभिनेता जिसने दर्जनों असफलताओं के बाद भी हिम्मत नहीं हारी और खुद को नए सिरे से तराशकर असफलता के पत्थरों को सफलता की सीढ़ी बना दिया, उनकी यह जीवन यात्रा आज भी हर संघर्षशील कलाकार के लिए मार्गदर्शक बनी हुई है।