करोड़ों की मशीनें खरीदीं, इस्तेमाल करने वाले ही नहीं! दिल्ली के अस्पतालों की बदहाल व्यवस्था का हैरान करने वाला सच
दिल्ली के सरकारी अस्पतालों की स्वास्थ्य सेवाओं की पोल खोलने वाली एक चौंकाने वाली तस्वीर सामने आई है। राजधानी के कई बड़े सरकारी अस्पतालों में मरीजों की गंभीर बीमारियों की जांच और इलाज के लिए करोड़ों रुपये की लागत से अत्याधुनिक और हाई-टेक मशीनें तो खरीद ली गई हैं, लेकिन विडंबना यह है कि उन मशीनों को चलाने वाले प्रशिक्षित विशेषज्ञ और तकनीशियन ही मौजूद नहीं हैं। इस वजह से ये कीमती उपकरण धूल फांक रहे हैं और सरकारी खजाने का पैसा बर्बाद हो रहा है। दूसरी ओर, सामान्य जनता को छोटी-छोटी जांच के लिए भी महीनों इंतजार करना पड़ रहा है या फिर महंगे निजी अस्पतालों का रुख करना पड़ रहा है। अस्पताल प्रशासन की इस भारी लापरवाही और कुव्यवस्था के कारण मरीजों को समय पर सही उपचार नहीं मिल पा रहा है।
करोड़ों के उपकरण बंद कमरे में कैद, जनता परेशान
अस्पतालों में एमआरआई, सीटी स्कैन, अल्ट्रासाउंड और अन्य आधुनिक सर्जिकल व डायग्नोस्टिक मशीनें स्थापित तो कर दी गईं, लेकिन विशेषज्ञ डॉक्टरों और स्टाफ की कमी के चलते इनके ताले तक नहीं खुल पा रहे हैं। कई अस्पतालों में तो स्थिति यह है कि मशीनें मंगवाकर गोदामों या कमरों में पैक पड़ी हैं या फिर इंस्टॉलेशन के बाद बिना इस्तेमाल के पड़ी-पड़ी खराब हो रही हैं। मरीजों का कहना है कि जब वे डॉक्टर के पास जाते हैं, तो उन्हें अस्पताल में मशीन होने के बावजूद बाहर से महंगे दामों पर जांच करवाने की सलाह दी जाती है। दिल्ली के अस्पतालों की इस बदहाल व्यवस्था ने स्वास्थ्य तंत्र के दावों की पोल खोलकर रख दी है और यह एक गंभीर जांच का विषय बन गया है।
मैनपावर की भारी कमी और प्रशासनिक उदासीनता
इस पूरे मामले के पीछे सबसे बड़ी वजह मेडिकल स्टाफ और तकनीशियनों की भारी किल्लत है। जानकारों का मानना है कि मशीनें खरीदने से पहले उनके संचालन और रखरखाव के लिए जरूरी मानव संसाधन (Manpower) की योजना तैयार नहीं की जाती है। टेंडर पास होने और खरीद प्रक्रिया पूरी होने के बाद जब मशीनें अस्पताल पहुंचती हैं, तब जाकर रिक्रूटमेंट या ट्रांसफर की प्रक्रिया शुरू होती है, जो कागजी कार्रवाई में महीनों या सालों तक लटकी रहती है। इसके अलावा, प्रशासनिक अधिकारियों और स्वास्थ्य विभाग के बीच तालमेल की कमी के कारण भी यह संकट और गहराता जा रहा है। समय पर मेंटेनेंस और स्टाफ की नियुक्ति न होने से जनता का पैसा बेकार जा रहा है।
मरीजों की जेब पर पड़ रहा भारी असर
सरकारी अस्पतालों में मुफ्त या बेहद कम खर्च पर इलाज की उम्मीद लेकर आने वाले गरीबों और जरूरतमंदों के लिए यह स्थिति किसी बड़े झटके से कम नहीं है। समय पर जांच न मिलने के कारण कई बार मरीजों की बीमारी गंभीर रूप ले लेती है, जिससे उनका जीवन खतरे में पड़ जाता है। मजबूरी में लोगों को कर्ज लेकर या अपनी जमा पूंजी खर्च करके प्राइवेट लैब्स और अस्पतालों में महंगे टेस्ट करवाने पड़ते हैं। दिल्ली की इस स्वास्थ्य व्यवस्था पर उठ रहे सवालों के बाद अब देखना यह होगा कि संबंधित विभाग और सरकार इस कुव्यवस्था को सुधारने के लिए क्या ठोस कदम उठाते हैं।