सतलुज के पानी से लेकर सिल्वर स्क्रीन तक: पंजाब की सियासत और सिनेमा का वो 'कनेक्शन', जिसने हमेशा बदली सूबे की हवा
पंजाब की धरती का मिजाज हमेशा से ही गर्म रहा है—चाहे बात खेतों को सींचने वाले सतलुज-यमुना लिंक (SYL) के पानी की हो, या फिर सिनेमा के पर्दे पर दिखने वाली पंजाबियत की। जब भी पंजाब में कैमरे और 'कुर्सी' का टकराव हुआ है, तब-तब एक नया इतिहास लिखा गया है। हालिया दिनों में मशहूर पंजाबी रॉकस्टार और ग्लोबल आइकॉन दिलजीत दोसांझ (Diljit Dosanjh) को लेकर राजनीतिक गलियारों में एक नई सुगबुगाहट शुरू हो गई है। लोग पूछ रहे हैं कि क्या पंजाब को अपना 'थलपति' (Thalapathy) मिलने वाला है? जैसे तमिलनाडु में जोसेफ विजय (Thalapathy Vijay) ने सिनेमा के शिखर से उतरकर अपनी राजनीतिक पार्टी 'तमिलगा वेत्री कड़गम' (TVK) बनाकर सियासत में भूचाल ला दिया, क्या दिलजीत दोसांझ भी पंजाब की राजनीति का वो नया 'चेहरा' बनेंगे जो आने वाले समय में सूबे की तकदीर तय करेगा?
चमकीला से लेकर उड़ता पंजाब तक: जब-जब फिल्मों पर भड़की पंजाब की सियासत
पंजाब में फिल्मों, गानों और राजनीति का विवादों से चोली-दामन का साथ रहा है। यह कोई नया ट्रेंड नहीं है, बल्कि इसका इतिहास बेहद गहरा और खूनी रहा है:
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अमर सिंह चमकीला का दौर: 80 के दशक में पंजाब के सबसे बड़े लोक गायक अमर सिंह चमकीला की उनके बेबाक और बोल्ड गानों के चलते सरेआम हत्या कर दी गई थी। हाल ही में इम्तियाज अली की फिल्म 'चमकीला' (जिसमें दिलजीत दोसांझ ने मुख्य भूमिका निभाई) ने इस सियासी और सामाजिक काले दौर को एक बार फिर देश के सामने ला दिया।
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उड़ता पंजाब पर सियासी घमासान: साल 2016 में आई फिल्म 'उड़ता पंजाब' ने जब राज्य में पैर पसार चुके ड्रग्स (चिट्टे) के जाल को दिखाया, तो तत्कालीन सत्ताधारी दल और सेंसर बोर्ड के बीच ऐसी सियासी जंग छिड़ी कि मामला सीधे बॉम्बे हाईकोर्ट पहुंच गया था। इस फिल्म ने उस वक्त के पंजाब चुनाव के नैरेटिव को पूरी तरह बदल दिया था।
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सिद्दू मूसेवाला और गन कल्चर: दिवंगत सिंगर सिद्दू मूसेवाला के गानों और उनकी हत्या ने यह साफ कर दिया कि पंजाब के संगीत और फिल्मों का राजनीति और गैंगवार से कितना सीधा और खतरनाक कनेक्शन बन चुका है।
तो क्या सच में 'थलपति' विजय की राह पर हैं दिलजीत दोसांझ?
दक्षिण भारत (खासकर तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश) में सिनेमाई सुपरस्टार्स का मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचना (जैसे एमजीआर, जयललिता, एनटीआर और अब थलपति विजय की एंट्री) बेहद सामान्य माना जाता है। लेकिन पंजाब की राजनीति ने कभी किसी विशुद्ध 'अभिनेता' या 'गायक' को राज्य की कमान नहीं सौंपी। हालांकि, इस बार दिलजीत दोसांझ को लेकर कयास बिल्कुल अलग हैं:
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ग्लोबल रीच और यूथ आइकॉन: कोचेला (Coachella) के मंच पर पंजाबी में परफॉर्म करने से लेकर एड शीरन (Ed Sheeran) को पंजाबी गानों पर नचाने वाले दिलजीत आज सिर्फ एक कलाकार नहीं हैं। वे दुनिया भर में फैले पंजाबी डायस्पोरा और राज्य के युवाओं की सबसे मजबूत आवाज बन चुके हैं।
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किसान आंदोलन में खुलकर स्टैंड लेना: दिल्ली की सीमाओं पर हुए ऐतिहासिक किसान आंदोलन के दौरान जब कई बड़े बॉलीवुड सितारे खामोश थे, तब दिलजीत दोसांझ ने न सिर्फ सोशल मीडिया पर मुखर होकर किसानों का समर्थन किया, बल्कि खुद गाजीपुर/सिंघू बॉर्डर पहुंचकर किसानों के बीच खड़े हुए। उनके इस कदम ने उन्हें पंजाबियों के बीच एक 'फोक हीरो' का दर्जा दे दिया।
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बदलाव की तलाश में पंजाब: पंजाब की जनता पारंपरिक पार्टियों (अकाली दल और कांग्रेस) के बाद आम आदमी पार्टी (AAP) को आजमा चुकी है। सूबे में चल रही एक राजनीतिक शून्यता (Political Vacuum) के बीच जनता हमेशा एक ऐसे मजबूत और बेदाग चेहरे की तलाश में रहती है, जो पंजाब की सांस्कृतिक और आर्थिक पहचान को वापस दिला सके।
क्या पंजाब का मिजाज स्वीकार करेगा किसी 'फिल्मी' मुख्यमंत्री को?
इतिहास गवाह है कि पंजाब ने सनी देओल (गुरदासपुर), हंस राज हंस, मोहम्मद सदीक या भगवंत मान (जो मूल रूप से एक कॉमेडियन और कलाकार थे) को संसद और विधानसभा तो जरूर भेजा है, लेकिन पंजाब की मूल सियासत हमेशा गंभीर मुद्दों—जैसे किसानी, कर्ज, पानी (SYL) और पंथिक मामलों (Panthic Issues)—के इर्द-गिर्द ही घूमती है। भगवंत मान का मुख्यमंत्री बनना इस बात का सबूत है कि कलाकार पंजाब की सत्ता के शीर्ष पर पहुंच सकते हैं, लेकिन उसके लिए उन्हें जमीन पर बरसों तक शुद्ध राजनीतिक संघर्ष करना पड़ा।
क्या दिलजीत दोसांझ अपनी चमचमाती इंटरनेशनल म्यूजिक और फिल्मी करियर को छोड़कर थलपति विजय की तरह सीधे 'पॉलिटिकल अखाड़े' में उतरने का रिस्क लेंगे? यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा, लेकिन इतना तय है कि अगर दिलजीत ने सियासत की तरफ एक भी कदम बढ़ाया, तो पंजाब के बड़े-बड़े राजनीतिक सूरमाओं के समीकरण पलक झपकते ही ध्वस्त हो जाएंगे।