इजरायल से दुश्मनी भुलाकर IDF चीफ से मिले सऊदी अरब, कतर, मिस्र और बहरीन के सैन्य प्रमुख

इजरायल से दुश्मनी भुलाकर IDF चीफ से मिले सऊदी अरब, कतर, मिस्र और बहरीन के सैन्य प्रमुख

मध्य पूर्व (Middle East) के भू-राजनीतिक समीकरणों में इन दिनों एक ऐसा चौंकाने वाला और ऐतिहासिक मोड़ आया है, जिसने पूरी दुनिया की खुफिया एजेंसियों और कूटनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है। दशकों से एक-दूसरे के कट्टर विरोधी रहे देश और पारंपरिक रूप से इजरायल के साथ शत्रुता रखने वाले खाड़ी देश अब एक साझा और बहुत बड़े खतरे के सामने एकजुट होते नजर आ रहे हैं। हाल ही में एक बेहद गोपनीय और उच्च-स्तरीय बैठक के दौरान सऊदी अरब, कतर, मिस्र और बहरीन के शीर्ष सैन्य प्रमुखों ने इजरायली डिफेंस फोर्सेज (IDF) के चीफ के साथ एक गुप्त मंच पर मुलाकात की है। क्षेत्रीय सुरक्षा और भू-राजनीतिक स्थिरता को दांव पर लगाने वाली इस गुप्त बैठक का मुख्य केंद्रबिंदु मध्य पूर्व में तेजी से पैर पसार रहे ईरान के आक्रामक रवैये और उसके बढ़ते परमाणु तथा मिसाइल खतरे से निपटना था। इस अभूतपूर्व सैन्य संवाद के बाद से यह साफ हो गया है कि मध्य पूर्व की सियासत में दुश्मनी और दोस्ती की पुरानी परिभाषाएं तेजी से बदल रही हैं, जिसका असर आने वाले समय में पूरी वैश्विक व्यवस्था पर पड़ना तय है।

क्या है इस ऐतिहासिक सैन्य बैठक के पीछे की असली वजह और क्यों अचानक मिले विरोधी देश?

मध्य पूर्व का इतिहास दशकों से युद्ध, अविश्वास और वैचारिक मतभेदों की कहानियों से भरा पड़ा है, जहां इजरायल और अरब देशों के बीच सीधे तौर पर बातचीत होना भी एक असंभव सी कल्पना मानी जाती थी। लेकिन पिछले कुछ वर्षों से क्षेत्र में जिस तरह से ईरान और उसके द्वारा समर्थित प्रॉक्सी नेटवर्क (जैसे हूती, हिजबुल्लाह और अन्य मिलिशिया समूह) ने सभी पड़ोसी देशों की संप्रभुता के लिए खतरा पैदा किया है, उसने समीकरणों को पूरी तरह से उलट दिया है। सऊदी अरब, कतर, मिस्र और बहरीन जैसे प्रमुख देशों को यह अहसास होने लगा है कि तेहरान की विस्तारवादी नीतियां और उसकी बैलिस्टिक मिसाइल क्षमताएं अकेले किसी एक देश के लिए संभाल पाना मुमकिन नहीं है। यही कारण है कि अपनी पुरानी ऐतिहासिक दुश्मनी और फिलिस्तीन जैसे मुद्दों पर वैचारिक मतभेदों को दरकिनार करते हुए इन देशों के सैन्य प्रमुखों ने इजरायल के शीर्ष रक्षा नेतृत्व के साथ बैठकर एक साझा सुरक्षा कवच (Joint Security Architecture) तैयार करने के लिए गंभीर चर्चा की है।

ईरान का बढ़ता खतरा और खाड़ी देशों की सुरक्षा चिंताएं, कैसे बदल रहा है मध्य पूर्व का नक्शा?

ईरान की लगातार बढ़ती सैन्य ताकत और उसके परमाणु कार्यक्रमों ने खाड़ी के इन इस्लामिक देशों की नींद उड़ा रखी है। पिछले दिनों जिस तरह से विभिन्न देशों के तेल अड्डों, हवाई अड्डों और रणनीतिक ठिकानों पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए गए हैं, उससे यह साबित हो गया है कि ईरान की परोक्ष युद्धनीति पूरे क्षेत्र के लिए एक लाइलाज नासूर बन चुकी है। ऐसे में, अत्याधुनिक सैन्य तकनीक, मिसाइल डिफेंस सिस्टम और खुफिया जानकारी साझा करने के मामले में दुनिया भर में अपनी पकड़ रखने वाले इजरायल (IDF) के साथ हाथ मिलाना इन अरब देशों के लिए एक मजबूरी भी बन गया है और एक बड़ी कूटनीतिक जरूरत भी। इस बैठक में मुख्य रूप से एक ऐसा एकीकृत वायु रक्षा नेटवर्क (Integrated Air Defense System) बनाने पर जोर दिया गया है, जो ईरान या उसके सहयोगियों द्वारा दागे जाने वाले किसी भी ड्रोन या मिसाइल को आसमान में ही नेस्तनाबूद करने की क्षमता रखता हो।

अमेरिका की मध्यस्थता और खुफिया कूटनीति: पर्दे के पीछे कैसे रची गई इस महाबैठक की पटकथा?

इस तरह के जटिल और संवेदनशील सामरिक गठजोड़ कभी भी रातों-रात नहीं बनते, बल्कि इसके पीछे महीनों की लंबी गुप्त कूटनीति और वैश्विक महाशक्तियों की मध्यस्थता का बड़ा हाथ होता है। अमेरिका और पश्चिमी देशों की खुफिया एजेंसियों ने पर्दे के पीछे रहकर इन सभी देशों के बीच की दूरियों को पाटने और एक साझा मंच पर लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। वाशिंगटन लंबे समय से यह चाहता था कि मध्य पूर्व के देश अब्राहम अकॉर्ड (Abraham Accords) की तर्ज पर आपस में सुरक्षा और तकनीकी सहयोग बढ़ाएं ताकि क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य दखल पर निर्भरता थोड़ी कम हो सके। जब सऊदी अरब और कतर जैसे देश जो पारंपरिक रूप से इजरायल के आलोचक माने जाते थे, वे अब आईडीएफ चीफ के साथ सीधे सैन्य टेबल पर बैठकर रणनीति बना रहे हैं, तो यह अमेरिका के लिए भी एक बहुत बड़ी कूटनीतिक जीत मानी जा रही है।

वैश्विक राजनीति और अंतरराष्ट्रीय शांति पर इस नए सैन्य गठबंधन का क्या होगा दूरगामी असर?

इजरायल और प्रमुख अरब देशों के बीच इस प्रकार की सैन्य नजदीकी आने वाले समय में दुनिया भर के शक्ति समीकरणों को पूरी तरह से बदलकर रख देगी। एक तरफ जहां इस गठबंधन से ईरान और उसके सहयोगियों पर कड़ा मनोवैज्ञानिक दबाव बनेगा, वहीं दूसरी तरफ इस बात की भी आशंका जताई जा रही है कि इससे मध्य पूर्व में तनाव का एक नया और खतरनाक दौर शुरू हो सकता है। रूस, चीन और अन्य वैश्विक शक्तियां भी इस पूरी घटना पर अपनी पैनी नजर बनाए हुए हैं क्योंकि खाड़ी क्षेत्र की स्थिरता सीधे तौर पर दुनिया भर में कच्चे तेल की कीमतों और आर्थिक बाजारों को प्रभावित करती है। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि क्या यह गुप्त सैन्य सहयोग खुलकर सामने आता है या फिर यह कूटनीति के पर्दे के पीछे ही ईरान के खिलाफ एक अजेय सुरक्षा कवच बनकर काम करता रहता है।

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