'सैनिक दो और सुरक्षा लो'... कुवैत के इस ऑफर से क्यों पसीने-पसीने हुआ पाकिस्तान? ईरानी मिसाइलों का खौफ और सामरिक मजबूरी का पूरा सच

'सैनिक दो और सुरक्षा लो'... कुवैत के इस ऑफर से क्यों पसीने-पसीने हुआ पाकिस्तान? ईरानी मिसाइलों का खौफ और सामरिक मजबूरी का पूरा सच

मध्य-पूर्व (Middle East) में बदलते भू-राजनीतिक समीकरणों के बीच इन दिनों एक ऐसा कूटनीतिक प्रस्ताव चर्चा का विषय बना हुआ है, जिसने पाकिस्तान की नींद उड़ा दी है। खाड़ी देश कुवैत की ओर से सामने आए एक कथित रक्षा प्रस्ताव—जिसमें सुरक्षा के बदले सैनिकों की तैनाती की बात है—ने पाकिस्तान के रणनीतिकारों को पशोपेश में डाल दिया है। इस ऑफर के बाद से पाकिस्तान के भीतर आंतरिक विरोध के स्वर तेज हो गए हैं और वहां के नीति-निर्धारक पसीना-पसीना नजर आ रहे हैं।

क्या है कुवैत का 'सैनिक दो और सुरक्षा लो' ऑफर?

पश्चिम एशिया में लगातार बिगड़ते सुरक्षा हालातों और ईरान के साथ बढ़ते तनाव के मद्देनजर कुवैत अपनी सैन्य ताकत को मजबूत करने के लिए विदेशी सैनिकों की मदद ले रहा है। इसी कड़ी में, खाड़ी देशों की सुरक्षा व्यवस्था को चाक-चौबंद करने के लिए पाकिस्तान से सैन्य सहयोग और सैनिकों की तैनाती को लेकर चर्चाएं गर्म हैं।

कुवैत की इस रणनीति का मुख्य उद्देश्य अपनी सीमाओं और सामरिक तेल प्रतिष्ठानों को बाहरी खतरों से सुरक्षित रखना है। लेकिन जैसे ही यह खबर सार्वजनिक हुई, पाकिस्तान के भीतर और अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक गलियारों में इस पर तीखी प्रतिक्रियाएं शुरू हो गईं।

क्यों पसीने-पसीने हुआ पाकिस्तान? ईरानी मिसाइलों का खौफ

पाकिस्तान के रणनीतिक हलकों में इस बात का भारी खौफ है कि यदि पाकिस्तानी सैनिकों को कुवैत की धरती पर तैनात किया जाता है, तो वे सीधे तौर पर क्षेत्रीय संघर्ष की चपेट में आ सकते हैं।

  • ईरान का सीधा निशाना बनने का खतरा: मध्य-पूर्व में ईरान की सैन्य क्षमता और उसकी मिसाइलें इस समय अत्यधिक आक्रामक मुद्रा में हैं। यदि खाड़ी देशों में किसी भी प्रकार का सैन्य टकराव बढ़ता है, तो कुवैत में तैनात होने वाले पाकिस्तानी सैनिक सीधे तौर पर ईरानी मिसाइलों और ड्रोनों के निशाने पर आ सकते हैं।

  • द्विपक्षीय संबंधों पर संकट: पाकिस्तान के लिए ईरान एक पड़ोसी देश है, जिसके साथ उसकी लंबी सीमा साझा होती है। ऐसे में किसी खाड़ी देश की तरफ से ईरान के खिलाफ परोक्ष या प्रत्यक्ष मोर्चेबंदी में शामिल होने से तेहरान के साथ उसके पारंपरिक संबंधों में भारी खटास आ सकती है।

घरेलू मोर्चे पर भी घिरी शहबाज सरकार और सेना

पाकिस्तान की मौजूदा सरकार और सैन्य नेतृत्व के लिए यह प्रस्ताव दोधारी तलवार साबित हो रहा है। एक तरफ आर्थिक बदहाली से जूझ रहे पाकिस्तान को खाड़ी देशों से मिलने वाले वित्तीय निवेश और सहायता की दरकार है, जिसके चलते वह सीधे तौर पर कुवैत या सऊदी अरब के प्रस्तावों को ठुकरा नहीं सकता। वहीं दूसरी तरफ, देश के भीतर जनता और विपक्षी दल इस बात का विरोध कर रहे हैं कि पाकिस्तानी जवानों को दूसरे देशों की लड़ाइयों में 'किराए के सैनिकों' की तरह क्यों झोंका जाए।

यही वजह है कि कुवैत के इस सुरक्षा प्रस्ताव पर पाकिस्तान की ओर से अब तक कोई स्पष्ट और खुलकर आधिकारिक रुख सामने नहीं आया है। ईरानी मिसाइलों के साए और मध्य-पूर्व की सुलगती आग के बीच पाकिस्तान इस कूटनीतिक पहेली में बुरी तरह उलझ चुका है।

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