मात्र 33 किलोमीटर का समुद्री गलियारा जिस पर टिकी है दुनिया की अर्थव्यवस्था: क्या इसी वजह से ट्रंप ने दांव पर लगा दिया है सब कुछ?
विश्व की अर्थव्यवस्था की धड़कनें जिस स्थान पर सबसे तेज चलती हैं, वह है मात्र 33 किलोमीटर का एक संकरा समुद्री गलियारा। इसे हम 'होर्मुज जलडमरूमध्य' (Strait of Hormuz) के नाम से जानते हैं। यह गलियारा ईरान और ओमान के बीच स्थित है और वैश्विक तेल व्यापार के लिए इसकी भूमिका किसी 'जीवन रेखा' से कम नहीं है। दुनिया का लगभग 20 से 25 प्रतिशत कच्चा तेल इसी संकरे रास्ते से होकर गुजरता है। हाल ही में अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस गलियारे को लेकर जिस तरह की सख्त नीति अपनाई है, उसने पूरी दुनिया की चिंताएं बढ़ा दी हैं। आखिर 33 किलोमीटर का यह छोटा सा समुद्री रास्ता इतना महत्वपूर्ण क्यों है और क्यों ट्रंप इसके नियंत्रण को लेकर इतने आक्रामक हैं कि उन्होंने सैन्य कार्रवाई तक की धमकी दे दी है?
रणनीतिक महत्व और ईरान-ओमान का समझौता
होर्मुज जलडमरूमध्य फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और अरब सागर से जोड़ता है। यह वह एकमात्र रास्ता है जिसके जरिए सऊदी अरब, इराक, कुवैत, कतर और संयुक्त अरब अमीरात जैसे खाड़ी देश अपना तेल पूरी दुनिया को निर्यात करते हैं। हाल ही में ईरान और ओमान ने इस समुद्री मार्ग पर जहाजों की आवाजाही को सुरक्षित बनाने के लिए एक 'शिपिंग रूट मैप' पर सहमति जताई थी। यह समझौता ईरान की उस कोशिश का हिस्सा है, जिसमें वह खुद को इस समुद्री मार्ग का 'पहरेदार' दिखाना चाहता है। ईरान का तर्क है कि चूंकि यह गलियारा उसकी समुद्री सीमा के बेहद करीब है, इसलिए उसे यहां के नियमों को तय करने का अधिकार है। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय कानून इसे 'अंतरराष्ट्रीय जलमार्ग' मानते हैं, जहां सभी देशों के जहाजों को अबाध रूप से गुजरने का अधिकार है। ईरान और ओमान के बीच की यह बढ़ती नजदीकियां वाशिंगटन के लिए चिंता का विषय बन गई हैं।
डोनाल्ड ट्रंप की 'आयरन फिस्ट' नीति और अमेरिका का रुख
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस गलियारे को लेकर अपनी नीति बिल्कुल स्पष्ट कर दी है। ट्रंप प्रशासन ने इसे 'अमेरिकी हितों का केंद्र' घोषित कर दिया है। ओमान को दी गई ट्रंप की चेतावनी साफ है कि यदि वे ईरान के साथ मिलकर अमेरिका के खिलाफ किसी भी प्रकार की नाकेबंदी या व्यापारिक अवरोध पैदा करने की कोशिश करते हैं, तो अमेरिका इसे अपनी संप्रभुता पर हमला मानेगा। ट्रंप ने इस क्षेत्र में अमेरिकी नौसेना की उपस्थिति को 'स्टील की दीवार' (Wall of Steel) करार दिया है। अमेरिका का स्पष्ट मानना है कि यदि ईरान ने इस रास्ते को बंद किया या यहां से गुजरने वाले जहाजों से अवैध वसूली की, तो वह भीषण सैन्य कार्रवाई करने से नहीं चूकेगा। ट्रंप के लिए यह केवल एक समुद्री रास्ता नहीं, बल्कि अपनी भू-राजनीतिक शक्ति प्रदर्शित करने का एक मुख्य माध्यम है। वे किसी भी कीमत पर यह नहीं चाहते कि मध्य-पूर्व के तेल व्यापार पर ईरान का कोई भी प्रभाव हो।
क्यों दांव पर लगा है वैश्विक ऊर्जा बाजार?
यदि ईरान और अमेरिका के बीच यह तनाव बढ़ता है और होर्मुज जलडमरूमध्य पर कोई भी सैन्य संघर्ष छिड़ता है, तो इसके परिणाम पूरी दुनिया के लिए भयानक होंगे। सबसे पहले, वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें आसमान छूने लगेंगी। चूंकि अधिकांश तेल इसी रास्ते से जाता है, इसलिए एक छोटा सा अवरोध भी भारत समेत पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को मंदी की ओर धकेल सकता है। भारत जैसे देशों के लिए, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए भारी मात्रा में खाड़ी के तेल पर निर्भर हैं, यह स्थिति और भी गंभीर है। सैन्य विशेषज्ञों का कहना है कि ट्रंप का आक्रामक रुख एक 'बार्गेनिंग चिप' भी हो सकता है, जिससे वे ईरान को झुकने के लिए मजबूर करना चाहते हैं। लेकिन, युद्ध की संभावनाओं ने तेल कंपनियों और निवेशकों को पशोपेश में डाल दिया है। क्या ट्रंप सच में युद्ध चाहते हैं या यह केवल एक कूटनीतिक दबाव है? यह आने वाले समय में स्पष्ट होगा, लेकिन फिलहाल 33 किलोमीटर के इस गलियारे पर दुनिया की निगाहें टिकी हुई हैं।