तीस्ता विवाद में चीन की एंट्री क्यों है बेहद अहम? बांग्लादेश का ड्रैगन की ओर झुकाव भारत के लिए क्यों बनता जा रहा है बड़ा खतरा
दक्षिण एशिया के कूटनीतिक गलियारों में इन दिनों भारत और बांग्लादेश के बीच का 'तीस्ता नदी विवाद' (Teesta River Dispute) सबसे बड़ा और संवेदनशील मुद्दा बन गया है। सिक्किम से निकलकर पश्चिम बंगाल होते हुए बांग्लादेश में बहने वाली तीस्ता नदी दोनों देशों के बीच लंबे समय से जल-बंटवारे के समझौते की उलझन में फंसी है। इस पानी के खेल में जब से चीन की एंट्री हुई है, तब से भू-राजनीतिक समीकरण पूरी तरह से बदल चुके हैं। भारत की सुरक्षा और कूटनीति के लिहाज से बांग्लादेश का ड्रैगन की तरफ यह बढ़ता झुकाव केवल एक आर्थिक समझौता नहीं, बल्कि रणनीतिक मोर्चे पर एक गंभीर चुनौती के रूप में देखा जा रहा है। आइए विस्तार से समझते हैं कि तीस्ता परियोजना में चीन की दखलअंदाजी भारत के लिए चिंता का विषय क्यों बन गई है।
तीस्ता नदी विवाद और कूटनीतिक पेच का इतिहास
भारत और बांग्लादेश के बीच कुल 54 साझा नदियां हैं, लेकिन तीस्ता का विवाद सबसे ज्यादा राजनीतिक रूप से संवेदनशील रहा है। सर्दियों के महीनों (दिसंबर से मार्च) के दौरान इस नदी का जलस्तर काफी कम हो जाता है, जिसके कारण उत्तरी बांग्लादेश के किसानों को सूखे और सिंचाई की भारी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। बांग्लादेश लंबे समय से यह मांग करता रहा है कि उसे तीस्ता के पानी का एक न्यायसंगत हिस्सा मिलना चाहिए, जैसा कि 1996 की गंगा जल संधि के तहत तय हुआ था। हालांकि, भारत के स्तर पर पश्चिम बंगाल की राज्य सरकार के विरोध और घरेलू राजनीतिक कारणों से यह समझौता लंबे समय से लटका हुआ है। इसी अनिश्चितता और राजनीतिक अंतराल का फायदा उठाने के लिए चीन ने कूटनीतिक चाल चली और बांग्लादेश के सामने एक अरब डॉलर के भारी-भरकम 'तीस्ता नदी प्रबंधन और जीर्णोद्धार परियोजना' (Teesta River Project) का प्रस्ताव रख दिया।
चीन की एंट्री: ड्रैगन का खर्चीला जाल और भू-राजनीतिक चाल
चीन की मंशा कभी भी केवल नदियों के संरक्षण या बाढ़ नियंत्रण से जुड़ी परोपकारी नहीं होती, बल्कि इसके पीछे उसका 'डेट ट्रैप' (Debt Trap) और सामरिक विस्तारवाद छिपा होता है। जब बांग्लादेश ने तीस्ता प्रोजेक्ट के लिए चीन की तरफ हाथ बढ़ाया, तो बीजिंग ने तुरंत इसमें अपनी गहरी दिलचस्पी दिखाई। अरबों डॉलर की इस परियोजना के जरिए चीन भारत के बेहद करीब, यानी सिलीगुड़ी कॉरिडोर (चिकन नेक) के मुहाने तक अपनी सीधी पैठ बनाने की फिराक में है। रणनीतिक रूप से यह क्षेत्र भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ता है। यदि चीनी इंजीनियर और तकनीकी विशेषज्ञ तीस्ता बेसिन में डेरा डालते हैं, तो यह भारतीय सुरक्षा एजेंसियों के लिए सिरदर्द बन सकता है। चीन इस प्रोजेक्ट के बहाने भारत के सामरिक पिछवाड़े में अपनी खुफिया और रणनीतिक पकड़ मजबूत करने का नापाक खेल खेल रहा है।
भारत के लिए सुरक्षा और कूटनीति का बड़ा खतरा
बांग्लादेश का चीन की ओर यह झुकाव भारत की 'नेबरहुड फर्स्ट' (Neighbourhood First) नीति के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है। भारत के सामरिक हितों के लिए यह स्थिति क्यों खतरनाक है, इसके कई पहलू हैं:
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रणनीतिक घेराबंदी (Strategic Encirclement): चीन पहले ही म्यांमार, श्रीलंका और पाकिस्तान के जरिए भारत को घेरने की कोशिश करता रहा है, और अब बांग्लादेश में उसकी एंट्री 'मोती की माला' (String of Pearls) रणनीति को और मजबूत कर देगी।
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चिकन नेक की सुरक्षा: तीस्ता बेसिन सिलीगुड़ी कॉरिडोर के बेहद करीब है, जो भारत की सुरक्षा का सबसे संवेदनशील हिस्सा है। वहां चीनी उपस्थिति सीधे तौर पर राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जोखिम है।
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आर्थिक और कूटनीतिक प्रभाव: चीन अरबों के कर्ज के जाल में फंसाकर बांग्लादेश की नीतियों को भारत के खिलाफ मोड़ने की कोशिश कर सकता है, जिससे द्विपक्षीय संबंधों में खटास आ सकती है।
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जल कूटनीति पर नियंत्रण: यदि चीन तीस्ता परियोजना पर काम शुरू करता है, तो वह ऊपरी या निचले बहाव के जरिए कूटनीतिक दबाव बनाने का नया हथियार पा जाएगा।
भारत के पास क्या हैं विकल्प और आगे की राह?
इस गंभीर स्थिति से निपटने के लिए भारत को कूटनीतिक और आर्थिक मोर्चे पर बेहद सतर्कता से कदम उठाने होंगे। एक तरफ जहां भारत को बांग्लादेश के नए नेतृत्व के साथ संवाद स्थापित कर तीस्ता जल-बंटवारे के मसले का कोई व्यावहारिक और स्वीकार्य समाधान निकालना होगा, वहीं दूसरी तरफ बांग्लादेश को यह समझाना होगा कि बीजिंग का कर्ज विकास कम और बर्बादी का रास्ता ज्यादा है। भारत अपने पड़ोसी देशों के साथ विकास परियोजनाओं में सहयोग देने के लिए हमेशा तैयार रहा है, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा से समझौता नहीं किया जा सकता। तीस्ता नदी में चीन की मौजूदगी यह चेतावनी है कि भारत को अपने रणनीतिक घेरे में चौकसी और अधिक बढ़ानी होगी, अन्यथा दक्षिण एशिया का यह कूटनीतिक संतुलन पूरी तरह से भारत के खिलाफ जा सकता है।