इजरायल : भारत की मास्टरस्ट्रोक कूटनीति ने पूरी दुनिया को चौंकाया, सदमे में डूबे पड़ोसी देश
अंतरराष्ट्रीय राजनीति और कूटनीति के पन्नों पर आज यदि किसी देश के सबसे बड़े और साहसिक फैसलों की चर्चा होती है, तो उसमें भारत का नाम सबसे शीर्ष पर लिया जाता है, जिसने दुनिया के तमाम विश्लेषकों को अपने फैसलों से हैरान कर दिया है। एक तरफ जहां पारंपरिक राजनीति के समीकरणों में यह माना जाता रहा है कि आप या तो किसी एक महाशक्ति के खेमे में खड़े हो सकते हैं या फिर तटस्थ रहकर अपनी नीति बचा सकते हैं, वहीं भारत ने एक ऐसा अनूठा और शानदार मार्ग चुना है जिसने सबको आश्चर्यचकित कर दिया है। भारत आज एक ऐसा अनोखा वैश्विक खिलाड़ी बनकर उभरा है जो एक तरफ अमेरिका और तकनीकी व सामरिक रूप से इजरायल का सबसे पक्का और भरोसेमंद यार माना जाता है, तो वहीं दूसरी तरफ पश्चिम एशिया के कट्टर प्रतिद्वंद्वी और अमेरिका के धुर विरोधी ईरान के साथ भी अपने गहरे और ऐतिहासिक तथा मित्रवत संबंधों को पूरी मजबूती से निभा रहा है। भारत की इस बहुआयामी और स्वतंत्र विदेश नीति ने पूरी दुनिया के शक्ति समीकरणों को हिला कर रख दिया है, और हमारे वे पड़ोसी देश जो हमेशा अपनी संकीर्ण कूटनीति के चलते दुनिया भर में मुंह की खाते रहते हैं, इस समय गहरी हैरानी और सदमे की स्थिति में हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में जिस प्रकार भारत ने राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखते हुए सभी देशों के साथ अपने रणनीतिक रिश्तों को साधा है, उसने यह साबित कर दिया है कि इक्कीसवीं सदी का भारत किसी के दबाव में काम करने वाला देश नहीं है, बल्कि वह खुद वैश्विक राजनीति की दिशा तय करने की कूवत रखता है।
पारंपरिक गठबंधनों से परे जाकर भारत ने कैसे गढ़ी अपनी स्वतंत्र विदेश नीति
आजादी के शुरुआती दशकों से लेकर अब तक भारत की विदेश नीति के सफर पर अगर गहरी नजर डाली जाए, तो यह साफ दिखाई देता है कि देश ने हमेशा गुटनिरपेक्षता के सिद्धांतों पर चलते हुए अपने आंतरिक और बाहरी हितों की रक्षा को प्राथमिकता दी है। शीत युद्ध के दौर से लेकर आज के इस बहुध्रुवीय (Multiplex) विश्व तक, भारत ने कभी भी किसी एक देश के पिछलग्गू बनकर रहने के बजाय अपने स्वतंत्र अस्तित्व को पूरी दुनिया के सामने लोहा मनवाया है। आज के समय में जब दुनिया के तमाम देश रूस-यूक्रेन युद्ध या मध्य एशिया के संघर्षों के कारण दो स्पष्ट गुटों में बंटते हुए नजर आ रहे हैं, भारत ने एक बेहद संतुलित और परिपक्व रुख अपनाते हुए दोनों पक्षों के साथ अपने व्यापारिक, ऊर्जा और सामरिक संबंधों को सुचारू रूप से बनाए रखा है। एक तरफ अमेरिका के साथ क्वाड (Quad) और रक्षा समझौतों के जरिए हिंद महासागर में अपनी पकड़ मजबूत करना, और दूसरी तरफ ब्रिक्स (BRICS) और शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के मंचों पर रूस और चीन जैसे देशों के साथ मिलकर काम करना भारत की उसी परिपक्व कूटनीतिक सोच का जीवंत प्रमाण है। इस प्रकार की लचीली और दूरदर्शी विदेश नीति के कारण ही आज दुनिया का हर बड़ा देश भारत को अपने सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार के रूप में देखता है, क्योंकि वे जानते हैं कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की निष्पक्ष और मजबूत आवाज को नजरअंदाज करना किसी के लिए भी संभव नहीं है।
इजरायल के साथ अटूट सामरिक साझेदारी और रक्षा सहयोग की नई इबारत
भारत और इजरायल के रिश्तों का यह दौर दोनों देशों के इतिहास में सबसे स्वर्णिम और मजबूत कालखंड माना जाता है, जहां कूटनीति से लेकर रक्षा, कृषि और अंतरिक्ष विज्ञान तक हर क्षेत्र में गाढ़ी दोस्ती देखने को मिलती है। जब भी भारत को आतंकवाद के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति पर काम करना होता है या अपनी सेनाओं के आधुनिकीकरण के लिए अत्याधुनिक हथियारों, ड्रोन और सर्विलांस सिस्टम्स की जरूरत पड़ती है, तो इजरायल हमेशा एक सच्चे और भरोसेमंद दोस्त की तरह सबसे पहले आगे आता है। भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी इजरायल के साथ अपने इन संबंधों को कभी छिपाया नहीं है, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ऐतिहासिक यात्राओं ने दोनों देशों के बीच आपसी विश्वास को एक नई ऊंचाई पर पहुंचा दिया है। इसके बावजूद, सबसे बड़ी कूटनीतिक खूबी यह है कि इजरायल के साथ इतने प्रगाढ़ और गहरे सामरिक रिश्ते होने के बावजूद भारत ने पश्चिम एशिया के अन्य देशों के साथ अपने पारंपरिक संबंधों को कभी कमजोर नहीं होने दिया। यह भारत की अद्भुत कूटनीतिक कला ही है कि वह एक तरफ यहूदी राष्ट्र इजरायल के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा है, तो दूसरी तरफ अरब जगत और खाड़ी के अन्य महत्वपूर्ण देशों के साथ भी अपने व्यापारिक और सांस्कृतिक सेतु को पूरी मजबूती से कायम रखे हुए है।
ईरान के साथ ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रिश्ते, चाबहार बंदरगाह से लेकर ऊर्जा सुरक्षा तक दोस्ती
इजरायल के साथ मजबूत होते रिश्तों के ठीक विपरीत, भारत के संबंध पश्चिम एशिया के एक अन्य प्रमुख और प्रभावशाली देश ईरान के साथ भी उतने ही गहरे और ऐतिहासिक रूप से प्रगाढ़ रहे हैं, जिसे लेकर अक्सर पश्चिमी देशों की भौंहें तन जाती हैं। ईरान भारत के लिए केवल एक देश नहीं है, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा, मध्य एशिया तक पहुंच और व्यापारिक मार्गों के लिहाज से एक बेहद रणनीतिक साझेदार है, जहां से भारत को अपनी तेल जरूरतों को पूरा करने में लंबे समय तक मदद मिलती रही है। भारत ने अमेरिकी प्रतिबंधों और तमाम अंतरराष्ट्रीय दबावों के बावजूद चाबहार बंदरगाह (Chabahar Port) के विकास को लेकर ईरान के साथ अपने संपर्कों को टूटने नहीं दिया, क्योंकि भारत अच्छी तरह जानता है कि अफगानिस्तान और मध्य एशियाई देशों तक व्यापारिक पहुंच बनाने के लिए यह मार्ग कितना आवश्यक है। भारत की यह नीति स्पष्ट संदेश देती है कि वह अपने क्षेत्रीय हितों और ऊर्जा सुरक्षा के मामलों में किसी भी तीसरे देश के दबाव में आकर अपने पुराने और भरोसेमंद दोस्तों से मुंह नहीं मोड़ेगा। ईरान के नीति निर्माताओं और वहां की जनता के मन में भी भारत के प्रति हमेशा एक गहरा सम्मान और विश्वास रहा है, क्योंकि वे यह समझते हैं कि भारत ने हर मुश्किल वक्त में एक संतुलित और निष्पक्ष दोस्त की भूमिका निभाई है।
भारत की इस मायावी कूटनीति को देखकर क्यों सदमे में डूबे हैं पड़ोसी देश
भारत की इस सफल, बहुआयामी और स्वतंत्र विदेश नीति को जब हमारे चिर-परिचित और संकीर्ण सोच वाले पड़ोसी देश देखते हैं, तो वे गहरी हैरानी और एक प्रकार के कूटनीतिक सदमे में डूब जाते हैं। वे पड़ोसी देश जो हमेशा से भारत को अस्थिर करने या अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अकेला दिखाने की साजिशें रचते रहे हैं, वे यह देखकर हैरान हैं कि आज भारत दुनिया के हर विरोधी समझे जाने वाले धड़े के साथ एक समान रूप से कैसे मजबूत संबंध बनाए हुए है। पाकिस्तान और कुछ अन्य विरोधी ताकतों के लिए यह बात पचा पाना बेहद मुश्किल हो रहा है कि कैसे एक ही समय में भारत पश्चिमी देशों का भी चहेता बना हुआ है और ग्लोबल साउथ (Global South) का निर्विवाद नेता बनकर भी उभर रहा है। भारत की आर्थिक प्रगति, डिजिटल क्रांति, विशाल बाजार और स्थिर राजनीतिक नेतृत्व ने दुनिया के हर देश को यह मजबूर कर दिया है कि वे भारत के साथ अपने रिश्तों को बिगाड़ने का जोखिम उठाने के बजाय दोस्ती का हाथ बढ़ाएं। पड़ोसी देशों की तमाम नकारात्मक चालें और दुष्प्रचार भारत के इस बुलंद कूटनीतिक रथ के सामने पूरी तरह से बौने साबित हो चुके हैं, जिससे वे केवल दूर बैठकर अपनी लाचारी पर पछताने के अलावा कुछ नहीं कर पा रहे हैं।
वैश्विक मंच पर भारत का बढ़ता कद और भविष्य की एक नई दिशा
आज जब हम इक्कीसवीं सदी के इस बदलते हुए भू-राजनीतिक परिदृश्य का सूक्ष्म विश्लेषण करते हैं, तो यह बात पूरी तरह से स्पष्ट हो जाती है कि भारत अब केवल एक क्षेत्रीय शक्ति नहीं, बल्कि दुनिया की तकदीर तय करने वाला एक वैश्विक महाशक्ति बन चुका है। भारत की यह अनोखी कूटनीति कि वह इजरायल का सबसे पक्का यार भी है और ईरान का प्रिय मित्र भी, इस बात का सबसे बड़ा सबूत है कि देश ने अपनी विदेश नीति में परिपक्वता के उस शिखर को छू लिया है जहां वैचारिक दूरियों को दरकिनार करके राष्ट्रीय हितों को साधने का हुनर आ चुका है। दुनिया के तमाम बड़े देश आज इस बात का अध्ययन कर रहे हैं कि कैसे भारत ने बिना किसी युद्ध या संघर्ष के कूटनीति के बल पर अपनी इस अनूठी जगह को हासिल किया है। आने वाले समय में जब भी विश्व शांति, आर्थिक स्थिरता और अंतरराष्ट्रीय सहयोग की बात होगी, तब भारत की यह संतुलित और स्वतंत्र नीति पूरी दुनिया के लिए एक आदर्श पाठ के रूप में याद रखी जाएगी। हर भारतवासी के लिए यह गर्व का विषय है कि हमारा देश आज अंतरराष्ट्रीय पटल पर उस मुकाम पर खड़ा है जहाँ हमारे फैसले पूरी दुनिया की दिशा तय करते हैं, और यह सफलता हमारी मजबूत इच्छाशक्ति तथा दूरदर्शी नेतृत्व का सबसे बड़ा परिणाम है।