मक्का पैक्ट लागू होने के करीब पहुंचा': पाकिस्तानी रक्षा मंत्री के बड़े ऐलान से मचा हड़कंप
अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और मध्य पूर्व (Middle East) के बेहद संवेदनशील राजनीतिक समीकरणों के बीच पाकिस्तान से एक ऐसा बड़ा और चौंकाने वाला बयान सामने आया है जिसने दुनिया भर के रक्षा विशेषज्ञों और कूटनीतिक विश्लेषकों को गहरी सोच में डाल दिया है। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ने हाल ही में एक सार्वजनिक मंच से यह बड़ा ऐलान किया है कि बहुचर्चित 'मक्का पैक्ट' (Makkah Pact) अब अपने क्रियान्वयन यानी लागू होने के अंतिम और निर्णायक चरण में पहुंच चुका है। इस्लामिक देशों के बीच सैन्य सहयोग, रक्षा संधियों और रणनीतिक सुरक्षा गठबंधनों के संदर्भ में इस समझौते को बहुत ही संवेदनशील माना जाता है। जैसे ही पाकिस्तानी रक्षा मंत्री के मुंह से यह बात निकली कि यह समझौता अब धरातल पर उतरने वाला है, वैसे ही अंतरराष्ट्रीय मीडिया में इस बात पर बहस छिड़ गई कि क्या पाकिस्तान अब आधिकारिक रूप से खाड़ी के देशों की आंतरिक या क्षेत्रीय लड़ाइयों में सीधे तौर पर शामिल होने जा रहा है। विशेष रूप से यमन और लाल सागर के इलाके में आतंक का पर्याय बन चुके ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों (Houthi Rebels) के खिलाफ चल रहे संघर्ष को लेकर यह सवाल सबसे बड़ा बन गया है कि क्या पाकिस्तानी सेना अब हूती विद्रोहियों के खिलाफ किसी सीधी जंग का हिस्सा बनने वाली है। पाकिस्तान के इस कदम से देश के भीतर और बाहर दोनों जगह राजनीतिक सरगर्मी तेज हो गई है।
क्या है मक्का पैक्ट और क्यों अचानक पाकिस्तान के लिए यह रणनीतिक समझौता इतना अहम बन गया है?
मध्य पूर्व और खाड़ी क्षेत्र के देशों की सुरक्षा वास्तुकला में 'मक्का पैक्ट' एक ऐसा बहुपक्षीय समझौता रहा है जिसका उद्देश्य इस्लामिक दुनिया के प्रमुख देशों के बीच सैन्य और सामरिक सहयोग को मजबूत करना है। इतिहास गवाह है कि जब भी खाड़ी के देशों पर किसी बाहरी या आंतरिक आतंकवादी संगठन (जैसे यमन के हूती विद्रोही जो सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के तेल अड्डों पर मिसाइल और ड्रोन हमले करते रहे हैं) की तरफ से खतरा मंडराया है, तब-तब उन्होंने इस्लामिक सैन्य गठबंधनों का सहारा लिया है। पाकिस्तान, जिसके पास परमाणु हथियार और एक विशाल नियमित सेना है, वह लंबे समय से आर्थिक तंगी से जूझ रहा है और उसे अपनी अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए खाड़ी के अमीर देशों (विशेषकर सऊदी अरब और यूएई) से मिलने वाले वित्तीय पैकेजेस और निवेश की सख्त जरूरत रहती है। ऐसे में, मक्का पैक्ट को लागू करने के इस ऐलान के पीछे पाकिस्तान की यह सोची-समझी कूटनीति मानी जा रही है कि वह अपनी सैन्य ताकत को किराए पर देकर या रक्षा सहायता के जरिए खाड़ी देशों से भारी-भरकम आर्थिक मदद और तेल रियायतें हासिल कर सके। हालांकि, इस समझौते के तहत अपने सैनिकों को युद्ध के मोर्चे पर भेजना पाकिस्तान के लिए अंदरूनी तौर पर कितना खतरनाक साबित हो सकता है, इस पर अभी भी बड़े सवालिया निशान लगे हुए हैं।
हूती विद्रोहियों से जंग का खतरा और पाकिस्तानी सेना के सामने खड़ी अंदरूनी व बाहरी चुनौतियां
यदि मक्का पैक्ट के प्रावधानों के तहत पाकिस्तान को यमन के हूती विद्रोहियों या उनके समर्थकों के खिलाफ किसी भी सैन्य कार्रवाई में सीधे तौर पर खींचा जाता है, तो इसके परिणाम पाकिस्तान के लिए बेहद घातक साबित हो सकते हैं। मध्य पूर्व के युद्ध में कूदने का मतलब है कि पाकिस्तान अपनी उस संतुलित विदेश नीति से पूरी तरह भटक जाएगा जिसके तहत वह शिया और सुन्नी बहुल देशों के बीच हमेशा एक न्यूट्रल या मध्यस्थ की भूमिका निभाने का दावा करता रहा है। पाकिस्तान की अपनी घरेलू आबादी के भीतर एक बड़ा शिया समुदाय रहता है, और ईरान के साथ उसकी लंबी सीमा तथा धार्मिक-सांस्कृतिक जुड़ाव है। यदि पाकिस्तानी सेना हूती विद्रोहियों के खिलाफ किसी जंग का हिस्सा बनती है, तो देश के भीतर सांप्रदायिक तनाव भड़कने का खतरा कई गुना बढ़ जाएगा, जिसे संभालना पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी और सरकार के बस की बात नहीं होगी। इसके अलावा, पहले से ही बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा में आतंकवाद से जूझ रही पाकिस्तानी सेना के पास इतनी क्षमता नहीं है कि वह विदेशी जमीन पर जाकर किसी आधुनिक और गुरिल्ला युद्ध में उलझ सके। रक्षा जानकारों का यह मानना है कि यह ऐलान केवल कागजी या राजनीतिक बयानबाजी भी हो सकती है, जिसका उद्देश्य केवल खाड़ी के देशों को खुश करके आर्थिक मदद हासिल करना है।
आर्थिक तंगी से जूझते पाकिस्तान का नया रक्षा सौदा या देश की संप्रभुता का सौदा?
पाकिस्तान की मौजूदा आर्थिक हालत किसी से छिपी नहीं है; विदेशी मुद्रा भंडार तलहटी में है, महंगाई आसमान छू रही है, और देश चलाने के लिए उसे आए दिन अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) या मित्र देशों के सामने कटोरा लेकर खड़ा होना पड़ता है। ऐसे में, रक्षा मंत्री द्वारा मक्का पैक्ट को लागू करने का यह बयान इस बात का साफ संकेत देता है कि पाकिस्तान अपनी सेना और उसके जवानों की जान को भी आर्थिक मदद के एवज में दांव पर लगाने से पीछे नहीं हट रहा है। पाकिस्तान के विपक्षी दलों और स्वतंत्र राजनीतिक विश्लेषकों ने इस बात पर कड़ी आपत्ति जताई है कि क्या देश की सेना को इस तरह से विदेशी क्षेत्रीय युद्धों में झोंकना राष्ट्रीय हितों के अनुकूल है। जनता यह सवाल पूछ रही है कि जिस देश की अपनी अवाम आटे और बिजली के लिए तरस रही है, उस देश के हुक्मरान मध्य पूर्व की जंग में कूदकर खुद को कौन सा बड़ा वैश्विक महाशक्ति साबित करना चाहते हैं। पाकिस्तान की इस अदूरदर्शी नीति से न केवल क्षेत्रीय स्थिरता को खतरा पैदा हो रहा है, बल्कि खुद पाकिस्तानी राष्ट्र की आंतरिक सुरक्षा भी गंभीर खतरे में पड़ रही है।