पाकिस्तानी अदालत का अजीबोगरीब फैसला: अपहरण करने वाले को ही सौंप दी नाबालिग बच्ची, जबरन धर्म परिवर्तन का सनसनीखेज मामला
पाकिस्तान की न्याय व्यवस्था और मानवाधिकारों की स्थिति पर एक बार फिर दुनिया भर में गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। पड़ोसी देश की एक अदालत ने न्याय के सारे सिद्धांतों को दरकिनार करते हुए एक ऐसा अनोखा और विवादित फरमान सुनाया है, जिसने हर किसी को हैरान कर दिया है। अदालत ने एक नाबालिग ईसाई लड़की के अपहरण के आरोपी व्यक्ति को ही उसी बच्ची की कस्टडी सौंप दी है। इस पूरे मामले में सबसे बड़ा और डरावना पहलू यह है कि आरोपी ने कथित तौर पर अपहरण के बाद बच्ची का जबरन धर्म परिवर्तन करवाकर उसे मुसलमान बना दिया, और इसी आधार पर पाकिस्तानी अदालत ने ऐसा फैसला सुना दिया।
क्या है पूरा मामला और कैसे हुआ अपहरण का यह सनसनीखेज खेल
यह दिल दहला देने वाला मामला पाकिस्तान के अल्पसंख्यक समुदायों की सुरक्षा पर बड़ा सवालिया निशान लगाता है। रिपोर्ट्स के अनुसार, एक नाबालिग ईसाई परिवार की बेटी को निशाना बनाते हुए उसका अपहरण कर लिया गया था। पीड़ित परिवार ने जब अपनी बेटी की तलाश शुरू की और पुलिस तथा अदालत का दरवाजा खटखटाया, तो उन्हें न्याय मिलने के बजाय भारी निराशा हाथ लगी। अपहरणकर्ता ने न केवल कानून की आंखों में धूल झोंकी, बल्कि जबरन निकाह और धर्म परिवर्तन का खेल खेलते हुए बच्ची को अपने अवैध कब्जे में बनाए रखा। पीड़ित परिवार का आरोप है कि पुलिस ने भी इस मामले में मुख्य आरोपी के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने के बजाय उसका साथ दिया।
जबरन धर्म परिवर्तन और निकाह को अदालत का संरक्षण
जब यह मामला अदालत में पहुंचा, तो न्याय की उम्मीद लगाए बैठे परिजनों को तब तगड़ा झटका लगा जब जज ने आरोपी के पक्ष में फैसला सुना दिया। अदालत ने इस बात को नजरअंदाज कर दिया कि लड़की नाबालिग है और उसका अपहरण किया गया था। इसके विपरीत, आरोपी पक्ष द्वारा पेश किए गए दस्तावेजों और तथाकथित धर्म परिवर्तन व निकाह के कागजातों को आधार बनाते हुए अदालत ने बच्ची को अपहरणकर्ता के सुपुर्द कर दिया। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और वकीलों का कहना है कि पाकिस्तान में अल्पसंख्यक हिंदू और ईसाई युवतियों के साथ अक्सर इस तरह की घटनाएं होती हैं, जहां जबरन धर्म परिवर्तन करवाकर कानूनी पचड़ों के जरिए आरोपियों को बचा लिया जाता है।
मानवाधिकार संगठनों में भारी रोष, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हो रही है निंदा
इस सनसनीखेज फैसले के सामने आने के बाद पाकिस्तान के भीतर और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मंचों पर भारी आक्रोश देखने को मिल रहा है। विभिन्न अल्पसंख्यक संगठनों और चर्च के प्रतिनिधियों ने पाकिस्तानी न्यायपालिका की तीखी आलोचना की है। उनका कहना है कि इस तरह के फैसलों से देश में धार्मिक अल्पसंख्यकों का जीना और भी दूभर हो गया है और अपराधियों के हौसले बुलंद हो रहे हैं। सोशल मीडिया से लेकर मानवाधिकार रिपोर्टों तक, इस मामले में पाकिस्तान सरकार और अदालतों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए जा रहे हैं, लेकिन पीड़ित परिवार अभी भी अपनी बेटी को वापस पाने के लिए दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर है।