कॉमनवेल्थ में छा गईं सीमा कलीरामना: मां की ममता और पीएचडी की किताबों के बीच ऐसे जीता देश के लिए ब्रॉन्ज

कॉमनवेल्थ में छा गईं सीमा कलीरामना: मां की ममता और पीएचडी की किताबों के बीच ऐसे जीता देश के लिए ब्रॉन्ज

भारतीय एथलेटिक्स जगत में स्कॉटलैंड के ग्लासगो में चल रहे कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 से एक बेहद प्रेरणादायक और गर्व से भर देने वाली खबर सामने आई है। देश की स्टार डिस्कस थ्रोअर (चक्का फेंक) एथलीट सीमा कलीरामना ने अपनी मेहनत, दृढ़ इच्छाशक्ति और अदम्य साहस के बल पर महिला वर्ग के फाइनल मुकाबले में ब्रॉन्ज मेडल (कांस्य पदक) अपने नाम कर लिया है। सीमा का यह सफर केवल एक खेल प्रतियोगिता का पदक भर नहीं है, बल्कि यह उन तमाम सीमाओं को तोड़ता है जो अक्सर महिला खिलाड़ियों के करियर के आड़े आती हैं। एक तरफ मां की घरेलू और आत्मीय जिम्मेदारियां, दूसरी तरफ उच्च शिक्षा यानी पीएचडी की कड़ी पढ़ाई का बोझ, और इन सबके बीच देश के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पोडियम फिनिश करना वाकई किसी चमत्कार से कम नहीं है।

ऐसे तय किया गया कांस्य पदक तक का रोमांचक सफर

ग्लासगो के मैदान पर खेले गए इस फाइनल मुकाबले में सीमा कलीरामना की शुरुआत वैसी नहीं हुई जैसी उम्मीद की जा रही थी। उनका पहला थ्रो फाउल हो गया था, जिससे शुरुआती दबाव जरूर बढ़ा लेकिन एक मंझे हुए खिलाड़ी की तरह उन्होंने जबरदस्त वापसी की। दूसरे प्रयास में उन्होंने 57.32 मीटर का थ्रो फेंका और तीसरे प्रयास में अपने प्रदर्शन में सुधार करते हुए 58.65 मीटर की शानदार दूरी तय की। हालांकि इसके बाद उनके अगले तीन प्रयास फाउल रहे, लेकिन उनका तीसरा प्रयास इतना मजबूत था कि वह तीसरे पायदान पर टिकी रहीं और कांस्य पदक अपने नाम करने में सफल रहीं। इस स्पर्धा में जमैका की सामंथा हॉल ने 61.66 मीटर के साथ गोल्ड मेडल जीता, जबकि कनाडा की जूलिया टंक्स ने 60.67 मीटर के थ्रो के साथ सिल्वर मेडल हासिल किया।

मातृत्व और अकादमिक संघर्ष के बीच असाधारण वापसी

हरियाणा के रोहतक-भिवानी क्षेत्र से ताल्लुक रखने वाली 27 वर्षीय सीमा कलीरामना की यह कहानी हर उस इंसान के लिए एक मिसाल है जो विपरीत परिस्थितियों में हार मान लेता है। सीमा चौधरी बंसीलाल यूनिवर्सिटी से शारीरिक शिक्षा (फिजिकल एजुकेशन) में पीएचडी की पढ़ाई कर रही हैं। इसी बीच उनके जीवन में एक नए मेहमान यानी बेटे रुद्र का आगमन हुआ। मां बनने के बाद अमूमन खिलाड़ियों के लिए खेल के मैदान पर उसी तेजी से लौटना बेहद मुश्किल होता है, लेकिन सीमा ने मातृत्व और अपने सपनों के बीच बेहतरीन तालमेल बिठाया। बच्चे के जन्म के महज 11 महीने बाद ही उन्होंने कड़े अभ्यास की शुरुआत कर दी थी। गर्भावस्था के बाद शरीर की फिटनेस, स्टैमिना और पुरानी तकनीक को वापस पाना उनके लिए एक बड़ी चुनौती था, जिसे उन्होंने अपने परिवार और पति के सहयोग से पार किया।

पति का साथ और आगे का लक्ष्य

सीमा की इस सफलता के पीछे उनके परिवार और खासकर उनके पति रविंद्र (मोनू कलीरामना) का बहुत बड़ा योगदान रहा है। खुद राष्ट्रीय स्तर के पूर्व डिस्कस थ्रोअर रह चुके रविंद्र ही आज सीमा के कोच की भूमिका भी निभा रहे हैं। पति के रूप में उनका साथ और एक कोच के रूप में उनका मार्गदर्शन सीमा को हर दिन मजबूत बनाता है। इससे पहले उन्होंने 2025 के नेशनल गेम्स में स्वर्ण पदक जीतकर अपनी बेहतरीन फॉर्म का अहसास करा दिया था। अब कॉमनवेल्थ गेम्स के इस पहले बड़े अंतरराष्ट्रीय मेडल ने साबित कर दिया है कि लगन सच्ची हो तो मां की ममता और रिसर्च की किताबों का बोझ भी खिलाड़ी के कदम नहीं रोक सकता।

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