54 साल बाद कहां खड़ा है शिमला समझौता? पाकिस्तानी प्रोपेगेंडा और आतंकवाद ने कैसे तोड़ी इस ऐतिहासिक समझौते की कमर
भारत और पाकिस्तान के कूटनीतिक इतिहास में 'शिमला समझौता' एक ऐसा मील का पत्थर माना जाता है, जिससे दोनों देशों के बीच शांति की एक नई उम्मीद जगी थी। आज इस ऐतिहासिक समझौते को पूरे 54 साल हो चुके हैं। साल 1971 के युद्ध में भारत के हाथों करारी शिकस्त झेलने और अपने 90,000 से अधिक सैनिकों के सरेंडर के बाद तत्कालीन पाकिस्तानी प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो घुटनों पर आकर भारत से शांति की भीख मांग रहे थे। इसी पृष्ठभूमि में तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और भुट्टो के बीच शिमला में यह समझौता हुआ था। लेकिन आज 54 साल बाद इतिहास के पन्नों को पलटकर देखें तो साफ हो जाता है कि पाकिस्तान ने कभी भी इसकी रूह का सम्मान नहीं किया।
क्या था शिमला समझौता और पाकिस्तान का पहला धोखा?
2 जुलाई 1972 को हस्ताक्षरित इस समझौते की मुख्य शर्त यह थी कि भारत और पाकिस्तान अपने सभी विवादों, विशेषकर कश्मीर मुद्दे को, द्विपक्षीय बातचीत (आपेस में मिलकर) के जरिए सुलझाएंगे। इसमें किसी भी तीसरे देश या अंतरराष्ट्रीय मंच के दखल की गुंजाइश को पूरी तरह खत्म कर दिया गया था। लेकिन समझौते की स्याही सूखने भी नहीं पाई थी कि पाकिस्तान ने वैश्विक मंचों पर कश्मीर का रोना रोना शुरू कर दिया। संयुक्त राष्ट्र (UN) से लेकर इस्लामिक सहयोग संगठन (OIC) तक, पाकिस्तान ने हर जगह शिमला समझौते की धज्जियां उड़ाते हुए अपना झूठा कश्मीर प्रोपेगेंडा जारी रखा, जो आज भी बदस्तूर जारी है।
सीमा पार आतंकवाद और कारगिल से लगी समझौते को सबसे बड़ी चोंट
शिमला समझौते को सबसे गहरा और जानलेवा जख्म पाकिस्तान की सेना और उसकी खुफिया एजेंसी आईएसआई (ISI) की तरफ से मिला। द्विपक्षीय शांति की आड़ में पाकिस्तान ने भारत के खिलाफ ' प्रॉक्सी वॉर' (छद्म युद्ध) की शुरुआत कर दी। 1980 के दशक के उत्तरार्ध से कश्मीर में फैलाया गया सीमा पार आतंकवाद इसी कूटनीतिक धोखे का नतीजा था। हद तो तब हो गई जब साल 1999 में तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी शांति का पैगाम लेकर बस से लाहौर गए थे, और पीछे से पाकिस्तानी फौज कारगिल की पहाड़ियों में घुसपैठ कर रही थी। कारगिल युद्ध ने आधिकारिक तौर पर यह साबित कर दिया कि पाकिस्तान के लिए शिमला समझौते की हैसियत महज एक कागज के टुकड़े से ज्यादा कुछ नहीं है।
लोकल सुरक्षा ग्रिड और भारत के कड़े रुख का नया दौर
आज जब भारत अपनी सुरक्षा और विदेश नीति को लेकर बेहद आक्रामक है, तो शिमला समझौते की प्रासंगिकता पर नए सिरे से बहस छिड़ गई है। दिल्ली-एनसीआर के रक्षा गलियारों से लेकर जम्मू-कश्मीर के ग्राउंड जीरो तक, भारत सरकार ने अब साफ कर दिया है कि 'आतंकवाद और बातचीत' एक साथ नहीं चल सकते। भारत अब पाकिस्तान के किसी भी अंतरराष्ट्रीय प्रोपेगेंडा का मुंहतोड़ जवाब देता है। एआई-संचालित आधुनिक रक्षा प्रणालियों और मजबूत लोकल इंटेलिजेंस ग्रिड के जरिए भारत ने सीमा पर घुसपैठ को लगभग नामुमकिन बना दिया है, जिससे पाकिस्तान की बौखलाहट और बढ़ गई है। विशेषज्ञ मानते हैं कि पाकिस्तान की हरकतों ने इस ऐतिहासिक शांति समझौते को इतिहास के मलबे में तब्दील कर दिया है।