हर कदम पर टूटे पैर की बाधा, पर हौसले से निशाना साधती है 13 साल की सुकर्मणी

हर कदम पर टूटे पैर की बाधा, पर हौसले से निशाना साधती है 13 साल की सुकर्मणी

जिंदगी जब राहों में मुश्किलें और दर्द के पत्थर बिछाती है, तो कई लोग हिम्मत हारकर बैठ जाते हैं। लेकिन कुछ ऐसे भी सितारे होते हैं जो इन रुकावटों को अपनी सबसे बड़ी ताकत बना लेते हैं। ऐसी ही एक मिसाल कायम की है 13 साल की नन्हीं खिलाड़ी सुकर्मणी ने, जिनकी राहों में शारीरिक अक्षमता और टूटे पैर की तकलीफ ने बार-बार बाधा डालने की कोशिश की, मगर उनके फौलादी हौसलों के आगे हर चुनौती घुटने टेकने पर मजबूर हो गई। सिर्फ 13 साल की उम्र में अपनी शारीरिक सीमाओं को लांघकर खेल के मैदान में सटीक निशाना साधने वाली सुकर्मणी की यह प्रेरक कहानी आज देश के लाखों युवाओं और बच्चों के लिए प्रेरणा का एक महान स्रोत बन चुकी है।

शारीरिक अक्षमता और टूटे पैर की असहनीय पीड़ा को भी मात दे गई सुकर्मणी

सुकर्मणी का जन्म और शुरुआती बचपन आम बच्चों जैसा बिल्कुल नहीं रहा। बहुत ही छोटी उम्र में एक गंभीर शारीरिक विकार और बार-बार हड्डियों के टूटने की गंभीर बीमारी (फ्रैक्चर) ने उनकी जिंदगी को कठिनाइयों से भर दिया। डॉक्टरों और परिजनों के लिए सुकर्मणी का हर कदम संभालना एक बड़ी चुनौती थी, क्योंकि हल्की सी चूक या चोट भी उनके पैरों की हड्डियों को तोड़ देती थी। जिस उम्र में बच्चे पार्कों में दौड़ते-भागते और खेलकूद में मस्त रहते हैं, उस उम्र में सुकर्मणी को हफ्तों और महीनों तक बिस्तर पर रहकर दर्द सहन करना पड़ता था। लेकिन इस असहनीय दर्द और शारीरिक बाधाओं के बावजूद, सुकर्मणी की आंखों में अपने सपनों को पूरा करने का एक ऐसा अंगार जल रहा था जिसे कोई भी बीमारी बुझा नहीं सकी।

कैसे मिला निशानेबाजी का जुनून और शूटिंग रेंज तक का प्रेरणादायक सफर

जब पैरों ने चलने से इनकार कर दिया, तो सुकर्मणी ने अपने हाथों की एकाग्रता और मानसिक मजबूती को निखारने का फैसला किया। परिजनों की सहायता और कोच के मार्गदर्शन में उन्होंने निशानेबाजी यानी स्पोर्ट्स शूटिंग को अपने जीवन का लक्ष्य चुना। शुरुआती दिनों में शूटिंग राइफल या पिस्टल को थामना और स्थिर खड़े होकर निशाना साधना उनके लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं था, क्योंकि टूटे पैरों और शारीरिक कमजोरी के कारण शरीर का संतुलन बनाना बेहद कठिन था। लेकिन सुकर्मणी ने कभी हार नहीं मानी। उन्होंने व्हीलचेयर और विशेष सपोर्ट के सहारे घंटों शूटिंग रेंज में अभ्यास किया। पसीने से तर-बतर और दर्द से कसमसाती सुकर्मणी का ध्यान केवल और केवल उस 10-मीटर एयर राइफल के ब्लैक बुलआई (लक्ष्य) पर टिका रहता था।

राष्ट्रीय और क्षेत्रीय प्रतियोगिताओं में सटीक निशाने से सबको किया हैरान

कड़ी मेहनत और अटूट लगन का नतीजा बहुत जल्द सामने आने लगा। जब सुकर्मणी ने पहली बार क्षेत्रीय निशानेबाजी प्रतियोगिता में हिस्सा लिया, तो वहां मौजूद हर कोई उनके शारीरिक जज्बे को देखकर दंग रह गया। जैसे ही उन्होंने अपनी पहली रेंज से सटीक निशाना साधा और बुलआई को भेदा, पूरा स्टेडियम तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। एक के बाद एक कई पदक और ट्राफियां अपने नाम करके सुकर्मणी ने यह साबित कर दिया कि असली ताकत इंसान के शरीर में नहीं, बल्कि उसके विचारों और आत्मबल में होती है। उन्होंने न केवल सामान्य वर्ग के खिलाड़ियों को कड़ी टक्कर दी, बल्कि अपनी उम्र से बड़े निशानेबाजों को भी पछाड़कर सबका ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया।

परिवार और कोच का अटूट समर्पण और संघर्ष में दिया साथ

सुकर्मणी की इस अभूतपूर्व सफलता के पीछे उनके माता-पिता और खेल प्रशिक्षकों (कोच) का भी उतना ही बड़ा योगदान रहा है। हर मुश्किल वक्त में जब सुकर्मणी दर्द से रो पड़ती थीं, तब उनके माता-पिता ने उनका ढांढस बंधाया और एक पल के लिए भी उनके कदम रुकने नहीं दिए। कोच ने भी उनकी शारीरिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए विशेष प्रशिक्षण तकनीकें विकसित कीं ताकि वे बिना अपने पैरों पर अधिक दबाव डाले अपने निशाने को सटीक बना सकें। परिवार के इस अटूट विश्वास और समर्थन ने सुकर्मणी को वह पंख दिए, जिसकी बदौलत वह आज आसमान छू रही हैं।

भारत की भावी ओलंपिक उम्मीद: देश का नाम रोशन करने का बड़ा सपना

13 वर्षीय सुकर्मणी का लक्ष्य यहीं रुकने का नहीं है। उनकी निगाहें अब राष्ट्रीय चैंपियनशिप से आगे बढ़कर पेरिस, लॉस एंजिल्स और भविष्य के पैरालिंपिक तथा ओलंपिक खेलों पर टिकी हुई हैं। वह दिन-रात अभ्यास कर रही हैं ताकि एक दिन भारतीय तिरंगे को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सबसे ऊंचा लहरा सकें। खेल विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सुकर्मणी को इसी तरह उचित मार्गदर्शन, आधुनिक खेल उपकरण और प्रायोजक मिलते रहे, तो वह आने वाले समय में देश के लिए स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रच सकती हैं। उनकी यह कहानी हम सभी को सिखाती है कि अगर मन में कुछ कर गुजरने का संकल्प हो, तो दुनिया की कोई भी शारीरिक बाधा आपको आपकी मंजिल तक पहुंचने से नहीं रोक सकती।