झारखंड के मांदर को मिला GI टैग: वैश्विक पटल पर दर्ज हुई अनूठी पहचान

झारखंड के मांदर को मिला GI टैग: वैश्विक पटल पर दर्ज हुई अनूठी पहचान

भारत के समृद्ध सांस्कृतिक और पारंपरिक इतिहास में जब भी आदिवासी लोक नृत्यों और संगीत की बात आती है, तो 'मांदर' (Mandar) की थाप के बिना हर धड़कन अधूरी सी लगती है। झारखंड की माटी, जंगलों और पहाड़ों की गूंज को अपने भीतर समेटने वाले इस पारंपरिक वाद्य यंत्र को अब एक बहुत बड़ी और ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल हुई है। झारखंड के इस पारंपरिक वाद्य यंत्र मांदर को आधिकारिक तौर पर 'GI टैग' (Geographical Indication Tag) प्रदान कर दिया गया है। इस प्रतिष्ठित टैग के मिलने से न केवल अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर मांदर की कानूनी और भौगोलिक पहचान सुरक्षित हो गई है, बल्कि झारखंड के जनजातीय समाज की कला, शिल्प और संस्कृति को एक नया वैश्विक सम्मान भी मिला है। इस खबर के सामने आते ही राज्य के लोक कलाकारों, शिल्पकारों और सांस्कृतिक प्रेमियों के बीच खुशी की लहर दौड़ गई है।

1915 से 1940 के ऐतिहासिक दस्तावेज बने GI टैग का मजबूत आधार

किसी भी वस्तु या उत्पाद को जियोग्राफिकल इंडिकेशन (GI) टैग मिलना कोई आसान प्रक्रिया नहीं होती है, इसके लिए उसकी ऐतिहासिक प्रमाणिकता, उसकी निर्माण शैली और स्थानीयता के ठोस सबूत देने पड़ते हैं। मांदर को यह गौरव दिलाने की लंबी कानूनी और दस्तावेजी प्रक्रिया में ब्रिटिश काल के उन पुराने दस्तावेजों ने सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जो वर्ष 1915 से 1940 के बीच के कालखंड से जुड़े हुए थे। शोधकर्ताओं, इतिहासकारों और स्थानीय संस्कृति के जानकारों ने ब्रिटिशकालीन गजट, पुरातात्विक साक्ष्यों और पुराने लोक साहित्य को खंगालकर यह साबित किया कि झारखंड के छोटा नागपुर क्षेत्र में मांदर का निर्माण और इसका उपयोग सदियों से आदिवासी संस्कृति का एक अनिवार्य हिस्सा रहा है। इन ऐतिहासिक दस्तावेजों की प्रामाणिकता को जांचने के बाद ही चेन्नई स्थित जीआई रजिस्ट्री ने इस पारंपरिक वाद्य यंत्र पर झारखंड की मुहर लगाते हुए इसे कानूनी अधिकार प्रदान किया है।

पारंपरिक कारीगरी और ढोल-मांदर बनाने वाले शिल्पकारों की मेहनत

मांदर केवल एक संगीत का साधन नहीं है, बल्कि इसे तैयार करने की पूरी प्रक्रिया अपने आप में एक विलुप्त होती हुई कला है। झारखंड के ग्रामीण इलाकों और विशेष रूप से आदिवासी समुदायों के कुशल शिल्पकार पीढ़ी-दर-पीढ़ी इस हुनर को जीवित रखे हुए हैं। मांदर को बनाने के लिए विशेष प्रकार की मिट्टी, लकड़ी, चमड़े और रस्सियों का उपयोग किया जाता है, जिसे बहुत ही बारीकी और धैर्य के साथ तराशा जाता है। एक अच्छे मांदर की गूंज और थाप उसके निर्माण की गुणवत्ता पर निर्भर करती है। जीआई टैग मिलने से अब इन पारंपरिक शिल्पकारों और कारीगरों के अधिकारों की रक्षा होगी और कोई अन्य क्षेत्र या देश इस कला की नकल नहीं कर पाएगा। इसके साथ ही, बाजार में इस वाद्य यंत्र की मांग बढ़ने से स्थानीय कारीगरों की आर्थिक स्थिति में भी सुधार होगा और उन्हें अपनी इस पारंपरिक कला को आगे बढ़ाने के लिए एक नई प्रेरणा मिलेगी।

वैश्विक पहचान और झारखंड की लोक कला का सुनहरा भविष्य

मांदर को GI टैग मिलने के बाद अब वैश्विक स्तर पर झारखंड की आदिवासी संस्कृति की धमक और अधिक तेज हो गई है। जब भी देश-विदेश में लोक संगीत या पारंपरिक नृत्यों का मंच सजेगा, तो झारखंड का मांदर अपनी इस आधिकारिक पहचान के साथ शान से गूंजेगा। राज्य सरकार और सांस्कृतिक विभागों का भी यह प्रयास है कि इस ऐतिहासिक उपलब्धि के बाद मांदर के निर्माण से जुड़े कलाकारों को विशेष प्रशिक्षण, वित्तीय सहायता और बाजार उपलब्ध कराया जाए ताकि यह प्राचीन कला आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित बनी रहे। कर्मा, सरहुल और टूसू जैसे तमाम पर्वों पर जब झूमने वाले कदम मांदर की थाप पर थिरकते हैं, तो यह इस बात का प्रमाण होता है कि संस्कृति की जड़ें कितनी गहरी हैं। यह जीआई टैग झारखंड की उसी सांस्कृतिक विरासत का सबसे बड़ा और चमकदार मुकुट बन गया है।