बीटेक कोर्स की अवधि 3.5 से 5 साल की होनी चाहिए, यह बात मैं अपने 25 साल के अनुभव से कह रहा
देश के प्रतिष्ठित तकनीकी संस्थानों यानी आईआईटी (IIT) के भीतर और अकादमिक गलियारों में पिछले कुछ समय से चल रहे विवाद और मंथन के बीच एक बेहद वरिष्ठ और अनुभवी शिक्षाविद् का बड़ा बयान सामने आया है। आईआईटी बॉम्बे (IIT Bombay) से जुड़े हालिया विवादों और छात्र समुदाय के बीच तनाव को शांत करने के लिए आईआईटी के एक पूर्व निदेशक ने खुलकर अपनी राय रखी है और इस पूरी समस्या का एक अनूठा और व्यावहारिक समाधान सुझाया है। उनका कहना है कि आज के समय में देश की तकनीकी शिक्षा प्रणाली में कुछ बुनियादी बदलाव करने की सख्त जरूरत है, जिसमें बीटेक (BTech) पाठ्यक्रम की निश्चित अवधि को मौजूदा चार साल से बदलकर साढ़े तीन से पांच साल के बीच लचीला (Flexible Duration) बनाया जाना चाहिए। अपने 25 से अधिक वर्षों के लंबे शैक्षणिक और प्रशासनिक अनुभव के आधार पर उन्होंने यह बात कही है कि जब तक हम छात्रों पर से पढ़ाई का अत्यधिक मानसिक दबाव कम नहीं करेंगे और उनकी व्यक्तिगत क्षमताओं के अनुसार सीखने की छूट नहीं देंगे, तब तक ऐसे परिसरों में तनाव और विवाद की घटनाएं सामने आती रहेंगी। इस विशेष, विस्तृत और इनसाइड रिपोर्ट के माध्यम से हम गहराई से जानेंगे कि पूर्व निदेशक ने इस विवाद पर और क्या-क्या खुलासे किए हैं और उनके इस नए फॉर्मूले से उच्च शिक्षा के क्षेत्र में क्या बड़े बदलाव आ सकते हैं।
आईआईटी बॉम्बे विवाद और उच्च शिक्षण संस्थानों में बढ़ता मानसिक तनाव: क्या है मौजूदा संकट?
हाल के दिनों में आईआईटी बॉम्बे जैसे देश के सर्वोच्च तकनीकी संस्थानों में छात्रों की आत्महत्या, अकादमिक दबाव, मानसिक स्वास्थ्य (Mental Health) और आपसी मतभेदों के चलते जो विवाद खड़े हुए हैं, उन्होंने पूरे देश के बुद्धिजीवियों और अभिभावकों को झकझोर कर रख दिया है। एक तरफ जहां ये संस्थान दुनिया भर में अपनी विश्वस्तरीय इंजीनियरिंग और शोध के लिए जाने जाते हैं, वहीं दूसरी तरफ इनके परिसरों के भीतर छात्रों पर लगातार असाइनमेंट, ग्रेडिंग, प्लेसमेंट और कठिन परीक्षाओं का जो मानसिक बोझ रहता है, वह कई बार युवाओं के लिए असहनीय हो जाता है। इसी संदर्भ में जब मीडिया और शिक्षा विशेषज्ञों ने परिसरों की इस दुखद और तनावपूर्ण स्थिति पर चिंता जताई, तो विभिन्न पूर्व निर्देशकों और शिक्षाविदों ने इसमें सुधार के लिए अपने सुझाव देना शुरू किए। इसी कड़ी में आईआईटी के एक सम्मानित पूर्व निदेशक का यह बयान आया है जिसमें उन्होंने इस पूरी व्यवस्था के मूल ढांचे पर ही सवाल खड़े करते हुए इसके समाधान की बात कही है।
'25 साल के अनुभव से कह रहा हूं': पूर्व निदेशक ने सुझाया बीटेक की अवधि को लचीला बनाने का फॉर्मूला
अपने लंबे शैक्षणिक करियर का हवाला देते हुए पूर्व निदेशक ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि वे पिछले 25 वर्षों से अकादमिक दुनिया के उतार-चढ़ाव और छात्रों के मनोविज्ञान को बहुत करीब से देख रहे हैं। उनका यह मानना है कि वर्तमान में बीटेक की जो कठोर 4-वर्षीय (4-Year Rigid) संरचना चली आ रही है, वह हर छात्र की बौद्धिक गति और मानसिक क्षमता के अनुकूल नहीं बैठती है। कुछ छात्र बहुत तेज होते हैं जो कम समय में अपनी पढ़ाई पूरी कर सकते हैं, जबकि कुछ छात्रों को अपने विषयों को गहराई से समझने, इंटर्नशिप करने या व्यक्तिगत कारणों से थोड़ा अधिक समय चाहिए होता है। इसी को ध्यान में रखते हुए उन्होंने यह क्रांतिकारी सुझाव दिया है कि बीटेक कोर्स की अवधि को न्यूनतम साढ़े तीन साल (3.5 Years) से लेकर अधिकतम पांच साल (5 Years) तक का लचीला बनाया जाना चाहिए। इस व्यवस्था के लागू होने से छात्रों को अपनी गति के अनुसार पढ़ाई करने की पूरी आजादी मिलेगी और वे बिना किसी डिप्रेशन या मानसिक तनाव के अपनी डिग्री पूरी कर सकेंगे।
कॉरपोरेट जगत की मांग और अकादमिक लचीलेपन के बीच संतुलन बनाने की जरूरत
आज का तकनीकी युग बहुत तेजी से बदल रहा है, जिसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), मशीन लर्निंग, डेटा साइंस और रोबोटिक्स जैसे अत्याधुनिक क्षेत्र शामिल हो चुके हैं। ऐसे में केवल चार साल के पारंपरिक पाठ्यक्रम में छात्रों को उन सभी कौशलों में पारंगत करना जो इंडस्ट्री की मांग के अनुरूप हों, कई बार काफी चुनौतीपूर्ण हो जाता है। पूर्व निदेशक ने अपने संबोधन में इस बात पर जोर दिया कि आईआईटी जैसे संस्थानों को अपने पाठ्यक्रम (Curriculum) को और अधिक गतिशील बनाना चाहिए। यदि कोई छात्र किसी एक सेमेस्टर में किसी विशेष प्रोजेक्ट या स्टार्टअप पर काम करना चाहता है, तो उसे अपनी पढ़ाई को थोड़ा खींचने या लचीला बनाने की अनुमति मिलनी चाहिए। यह लचीलापन न केवल छात्रों की व्यावहारिक सीख को मजबूत करेगा बल्कि उन्हें डिग्री पूरी करने के बाद सीधे कॉरपोरेट सेक्टर या उद्यमिता (Entrepreneurship) की दुनिया में कदम रखने के लिए पूरी तरह से मानसिक रूप से तैयार भी करेगा।
छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य और कल्याण को प्राथमिकता देने की उठी जोरदार मांग
आईआईटी बॉम्बे और अन्य प्रीमियम संस्थानों में हालिया घटनाओं के बाद से ही यह बहस छिड़ गई थी कि क्या हमारे ये संस्थान केवल 'रैंकिंग और प्लेसमेंट' की मशीन बनकर रह गए हैं, जहाँ इंसान की भावनाओं और मानसिक स्वास्थ्य की अनदेखी की जा रही है। पूर्व निदेशक के इस बयान ने एक बार फिर इस गंभीर मुद्दे पर रोशनी डाली है कि परिसरों में काउंसलर्स की संख्या बढ़ाई जानी चाहिए, ग्रेडिंग सिस्टम को इतना खौफनाक नहीं बनाया जाना चाहिए कि छात्र खुद को असफलता के गर्त में महसूस करें। शिक्षा का उद्देश्य रटकर पास होना या तनाव में जीना नहीं, बल्कि एक बेहतर इंसान और सक्षम इंजीनियर बनना होना चाहिए। जब तक संस्थानों के नियमों में लचीलापन नहीं लाया जाएगा और मानवीय दृष्टिकोण को प्राथमिकता नहीं दी जाएगी, तब तक ऐसी अप्रिय स्थितियों से पूरी तरह से निपटना मुश्किल बना रहेगा।
भविष्य की शिक्षा नीति के लिए एक आईना: क्या सरकार और संस्थान अपनाएंगे यह सुझाव?
पूर्व निदेशक द्वारा दिए गए इस सुझाव और आईआईटी बॉम्बे विवाद के इस हल को देश भर के शिक्षाविदों, नीति निर्माताओं और आईआईटी परिषदों द्वारा बेहद गौर से सुना जा रहा है। आने वाले समय में राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) और अन्य उच्च शिक्षा सुधारों के तहत यदि पाठ्यक्रमों की अवधि और उनकी संरचना में इस प्रकार के व्यावहारिक बदलाव किए जाते हैं, तो यह लाखों छात्रों के जीवन को संवारने में एक बहुत बड़ा मील का पत्थर साबित हो सकता है। शिक्षा केवल किताबी ज्ञान का नाम नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने की कला और समस्याओं को सुलझाने की क्षमता सिखाती है। यदि हमारे देश के सर्वोच्च संस्थान अपने नियमों में थोड़ा सा लचीलापन लाकर छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य को सुरक्षित कर सकें, तो भारत वास्तव में वैश्विक स्तर पर शिक्षा का सिरमौर बन सकता है।