19 साल के NEET छात्र की कहानी, जब सुप्रीम कोर्ट पहुंचकर 10 मिनट का मांगा समय; फिर मिली MBBS सीट
मेडिकल प्रवेश परीक्षा NEET (National Eligibility cum Entrance Test) पास करना और देश के किसी अच्छे कॉलेज में एमबीबीएस (MBBS) की सीट हासिल करना लाखों छात्रों का सपना होता है। इस कठिन परीक्षा को पास करने के लिए छात्र दिन-रात एक कर देते हैं, लेकिन कई बार किस्मत और सिस्टम की अड़चनें अच्छे खासे होनहार छात्रों के रास्ते में दीवार बनकर खड़ी हो जाती हैं। ऐसी ही एक प्रेरणादायक और संघर्ष से भरी कहानी सामने आई है, जहां 19 साल के एक युवा छात्र ने हार मानने के बजाय देश की सर्वोच्च अदालत सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) तक की लड़ाई लड़ी और सिर्फ 10 मिनट की गुहार लगाकर अपनी काबिलियत के दम पर एमबीबीएस की सीट हासिल कर ली।
तकनीकी खामियों और नियमों के फेर में फंसा भविष्य
यह मामला उस वक्त तूल पकड़ा जब इस होनहार छात्र ने कड़ी मेहनत के बाद नीट की परीक्षा में अच्छे अंक हासिल किए, लेकिन काउंसलिंग या एडमिशन प्रक्रिया के दौरान आई कुछ तकनीकी बाधाओं और प्रशासनिक उलझनों के कारण उसका प्रवेश खतरे में पड़ गया।
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अचानक बंद हुए रास्ते: छात्र और उसके परिवार ने हर संभव स्तर पर अधिकारियों के सामने गुहार लगाई, लेकिन जब काउंसलिंग प्रक्रिया के अंतिम दौर में भी उसे राहत नहीं मिली, तो निराशा हाथ लगी।
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अटूट हौसला: आमतौर पर ऐसी स्थिति में लोग किस्मत को कोसकर बैठ जाते हैं, लेकिन इस 19 वर्षीय छात्र ने कानूनी विशेषज्ञों की सलाह पर देश की सबसे बड़ी अदालत का रुख करने का फैसला किया।
जब सुप्रीम कोर्ट में छात्र ने मांगे सिर्फ '10 मिनट'
यह मामला जब सर्वोच्च अदालत के न्यायधीशों के सामने पहुंचा, तो कानूनी पेचीदगियों के बीच छात्र के वकील ने कोर्ट से गुहार लगाई कि वे सिर्फ 10 मिनट का समय दें ताकि यह साबित किया जा सके कि छात्र हर तरह से योग्य है और उसके साथ तकनीकी गलती के कारण अन्याय हुआ है।
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न्यायमूर्ति की सकारात्मक पहल: अदालत ने छात्र की स्थिति और उसके भविष्य को देखते हुए मामले की गंभीरता को समझा और सुनवाई के लिए विशेष अनुमति दी।
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सटीक दलीलें और न्याय: अदालत के समक्ष रखे गए दस्तावेजों और तथ्यों से यह साफ हो गया कि छात्र की कोई गलती नहीं थी, बल्कि सिस्टम की तकनीकी खामियों की वजह से उसे प्रवेश से वंचित किया जा रहा था। सुप्रीम कोर्ट ने स्थिति का संज्ञान लेते हुए तुरंत राहत दी और कॉलेज प्रशासन को निर्देश जारी किया।
संघर्ष करने वालों की कभी हार नहीं होती
अदालत के इस ऐतिहासिक फैसले के बाद छात्र का रास्ता साफ हो गया और उसे मनचाहे कॉलेज में एमबीबीएस की सीट मिल गई। डॉक्टर बनने का उसका सपना अब हकीकत में बदलने की राह पर है। यह घटना उन तमाम युवाओं के लिए एक मिसाल बन गई है जो छोटी-मोटी बाधाओं या असफलताओं से घबराकर अपनी जंग बीच में ही छोड़ देते हैं। यह साबित करता है कि यदि आपके इरादे पक्के हों और आप सच के लिए लड़ना जानते हैं, तो बड़ी से बड़ी दीवार भी गिराई जा सकती है।