टेंडर घोटाले में आए 2 IAS के नाम, एक ने पढ़ा इतिहास, दूसरे ने की MTech
उत्तर प्रदेश और देश के प्रशासनिक गलियारों में उस समय हड़कंप मच गया जब राज्य के एक बहुचर्चित टेंडर घोटाले की जांच की परतें खुलते ही दो बड़े आईएएस अफसरों के नाम खुलकर सामने आ गए। निष्पक्ष जांच एजेंसियों द्वारा की गई शुरुआती पड़ताल में यह बात निकलकर आई है कि करोड़ों रुपये के सरकारी टेंडर को मनचाही कंपनियों और ठेकेदारों को रेवड़ियों की तरह बांटने में इन दोनों प्रशासनिक अधिकारियों की मुख्य भूमिका रही है। सबसे चौंकाने वाली बात इन दोनों अधिकारियों की शैक्षणिक योग्यता और पृष्ठभूमि को लेकर है—जहां एक अधिकारी ने देश के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय से इतिहास (History) विषय में उच्च शिक्षा और महारत हासिल की थी, वहीं दूसरे अधिकारी ने तकनीकी क्षेत्र के शीर्ष संस्थान से एमटेक (MTech) की डिग्री प्राप्त की थी। उच्च शिक्षा और प्रशासनिक जिम्मेदारी के पद पर तैनात होने के बावजूद करोड़ों रुपये के इस घोटाले में नाम आने से न केवल पूरे प्रशासनिक तंत्र पर सवालिया निशान खड़े हो गए हैं, बल्कि यह मामला पूरे प्रदेश में चर्चा का सबसे बड़ा विषय बन गया है।
इतिहास की समझ से लेकर एमटेक की डिग्री तक: जानिए आरोपी आईएएस अफसरों का पूरा प्रोफाइल
टेंडर घोटाले की जांच कर रही स्पेशल इंवेस्टिगेशन टीम (SIT) और विजिलेंस विभाग के सूत्रों के अनुसार, घोटाले में शामिल पहला आईएएस अधिकारी भारतीय प्रशासनिक सेवा में आने से पहले इतिहास का गहन अध्येता रहा है। कला और इतिहास संकाय में बेहतरीन प्रदर्शन के बाद उन्होंने संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) की परीक्षा में शानदार रैंक हासिल की थी। वहीं, घोटाले में फंसा दूसरा आईएएस अधिकारी सिविल सेवा में आने से पहले देश के नामचीन इंजीनियरिंग कॉलेज से एमटेक की डिग्री हासिल कर चुका एक कुशल इंजीनियर था। प्रशासनिक हलकों में यह माना जा रहा था कि एक तरफ जहां इतिहास पढ़ने वाले अधिकारी के पास प्रशासनिक बारीकियों और पूर्व दृष्टांतों की बेहतरीन समझ थी, वहीं एमटेक पास अफसर के पास सरकारी योजनाओं के तकनीकी और डिजिटल क्रियान्वयन की पूरी तकनीकी विशेषज्ञता थी। हालांकि, जांच में यह बात सामने आई है कि इन दोनों अधिकारियों ने अपनी इस उच्च योग्यता का इस्तेमाल जनकल्याण के बजाय टेंडर की शर्तों को खास कंपनियों के अनुकूल मरोड़ने और फर्जीवाड़े के रास्तों को छिपाने में किया।
टेंडर आवंटन में धांधली और करोड़ों रुपये के कमीशन का खेल
जांच रिपोर्ट के अनुसार, यह पूरा टेंडर घोटाला राज्य के एक महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचा (Infrastructure) और विकास परियोजना से जुड़ा हुआ है। आरोप है कि टेंडर जारी करने की प्रक्रिया के दौरान नियमों और पारदर्शिता को पूरी तरह से दरकिनार कर दिया गया। एमटेक की डिग्री रखने वाले अधिकारी ने टेंडर की तकनीकी शर्तों (Technical Eligibility Criteria) में ऐसे जटिल और संदिग्ध बदलाव किए, जिससे केवल वही चुनिंदा कंपनियां पात्र हो सकें जिनसे पहले से साठगांठ की जा चुकी थी। दूसरी तरफ, इतिहास के विद्वान रहे अधिकारी ने प्रशासनिक स्तर पर फाइल नोटिंग्स और मंजूरी की प्रक्रिया को इतनी चतुराई से तैयार किया कि शुरुआती नजर में कोई भी गड़बड़ी पकड़ में न आ सके। टेंडर मंजूर होने के बदले में कथित तौर पर मोटी रकम के कमीशन और बेनामी संपत्तियों में निवेश के सबूत भी वित्तीय जांच एजेंसियों के हाथ लगे हैं, जिसके आधार पर अब आगे की कठोर कानूनी कार्रवाई की तैयारी की जा रही है।
जांच एजेंसियों की ताबड़तोड़ छापेमारी और बेनामी संपत्तियों का खुलासा
घोटाले की भनक लगते ही राज्य सरकार के कड़े रुख के बाद जांच एजेंसियों ने दोनों आईएएस अफसरों के ठिकानों पर एक साथ छापेमारी की। लखनऊ, दिल्ली और अधिकारियों के पैतृक गृह जनपदों में स्थित कई आवासों और दफ्तरों पर की गई इस कार्रवाई में कई महत्वपूर्ण दस्तावेज, डिजिटल एविडेंस, हार्ड ड्राइव्स और करोड़ों रुपये के संदिग्ध लेन-देन के रिकॉर्ड जब्त किए गए हैं। जांच अधिकारियों के अनुसार, दोनों अफसरों ने अपने रिश्तेदारों और करीबी सहयोगियों के नाम पर कई कीमती भूखंड, लग्जरी फ्लैट्स और बेनामी कंपनियां बनाई हुई थीं। जिस तरह से फर्जी बिलों के आधार पर सरकारी खजाने से सरकारी बजट का बंदरबांट किया गया, उसने जांच अधिकारियों को भी हैरान कर दिया है। वर्तमान में दोनों अधिकारियों के बैंक खातों को फ्रीज कर दिया गया है और उनसे कड़ाई से पूछताछ की जा रही है।
जीरो टॉलरेंस की नीति और प्रशासनिक महकमे में कड़ा संदेश
इस बड़े घोटाले में दो वरिष्ठ आईएएस अफसरों के नाम उजागर होने के बाद राज्य सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि भ्रष्टाचार के मामलों में किसी को भी बख्शा नहीं जाएगा, चाहे वह कितने भी ऊंचे पद पर क्यों न बैठा हो। सरकार की 'जीरो टॉलरेंस' नीति के तहत दोनों अधिकारियों के खिलाफ विभागीय जांच शुरू करने के साथ ही उन्हें प्रशासनिक पदों से हटाकर प्रतीक्षारत (Waitlisted) कर दिया गया है। जानकारों का कहना है कि अगर जांच में आरोप पूरी तरह से सिद्ध हो जाते हैं, तो प्रिवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट (PCA) के तहत इन पर मुकदमा चलाकर सेवा से बर्खास्तगी तक की कार्रवाई की जा सकती है। इस कार्रवाई ने पूरे राज्य प्रशासनिक सेवा (PCS) और आईएएस (IAS) कैडर के अधिकारियों में एक सख्त और मजबूत संदेश दिया है कि योग्यता और पद चाहे कितना भी बड़ा हो, कानून से ऊपर कोई नहीं हो सकता।
जनता का भरोसा और प्रशासनिक व्यवस्था में सुधार की तत्काल आवश्यकता
पढ़े-लिखे और जिम्मेदार पदों पर बैठे आईएएस अधिकारियों का इस तरह के आर्थिक अपराधों में नाम आना आम जनता के भरोसे को भारी ठेस पहुंचाता है। जब इतिहास और एमटेक जैसी कठिन और प्रतिष्ठित डिग्रियां हासिल करने वाले नौकरशाह भ्रष्ट आचरण में लिप्त पाए जाते हैं, तो इससे पूरी प्रशासनिक व्यवस्था पर जनता का विश्वास डिगने लगता है। इस पूरी घटना के बाद अब सरकारी टेंडर प्रक्रियाओं को 100% पारदर्शी बनाने, ई-प्रोक्योरमेंट सिस्टम को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से ट्रैक करने और थर्ड-पार्टी ऑडिट कराने की मांग जोर पकड़ रही है। इस घोटाले के सभी दोषियों पर कड़ी कार्रवाई होना इसलिए भी जरूरी है ताकि भविष्य में कोई भी अधिकारी देश के खजाने और जनता के विश्वास के साथ खिलवाड़ करने की हिम्मत न कर सके।