लॉकडाउन : जब देश ने करोड़ों लोगों को बेगाना कर दिया, भुलाये नहीं भूलते वे मंजर

राजमार्गों, दूसरी सड़कों और रेल की पटरियों पर थके-हारे और भूखे-प्यासे लोगों का हुजूम नजर आ रहा था। सैकड़ों किमी लंबी पैदल यात्राओंके चलते छालों से भरे उनके पैर थक चुके थे,

देशवासी एक साल पहले कए गए देशव्यापी लॉकडाउन का मंजर कभी नहीं भूल पाएंगे। अचानक सारे काम-धंधे ठप होने से रोज कमाने-खाने को अभिशप्त करोड़ों प्रवासी मजदूरों को रोटी के लाले पड़ गए थे। उन्हें जहां जैसे हैं वहीं पड़े रहने की हिदायतें दी जा रही थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को 24 मार्च को रात आठ बजे महज चार घंटे बाद तीन हफ्ते के देशव्यापी लॉकडाउन की घोषणा करते समय देश के लगभग 10 करोड़ प्रवासी मजदूरों का ख्याल नहीं आया था। लॉकडाउन की घोषणा के बाद सख्त निर्देश जारी किए जाने लगे। प्रधानमंत्री को शायद यह भी ध्यान नहीं आया कि ‘लॉकडाउन’ और ‘सोशल डिस्टेंसिंग’ जैसे शब्द देश के आम लोगों के पल्ले नहीं पड़ेंगे।

देशव्यापी लॉकडाउन के बाद देश का नजारा दिल को द्रवित करने वाला था। सर पर गठरी और हाथ में झोले लिए मय बच्चों के गुजरात, महाराष्ट्र, दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, पंजाब, हरियाणा के महानगरों से लाखों लोग उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल, ओडिशा, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ स्थित अपने घरों के लिए पैदल ही चल पड़े।

राजमार्गों, दूसरी सड़कों और रेल की पटरियों पर थके-हारे और भूखे-प्यासे लोगों का हुजूम नजर आ रहा था। सैकड़ों किमी लंबी पैदल यात्राओंके चलते छालों से भरे उनके पैर थक चुके थे, लेकिन उन्हें रुकना नहीं था, चलते जाना था, अपने गांव-घर तक। हजारों खुशकिस्मत लोग बसों, ट्रकों, कॉन्ट्रेनरों आदि में गठरियों की तरह ठुंसकर अपने गांव-घर तक पहुँच सके।

लॉकडाउन के हप्तों बाद तक देश के राजमार्गों पर लंबी-लंबी कतारें और हुजूम ही नजर आता था। आजादी के बाद की कम से कम तीन पीढ़ियों ने तो ऐसा नजारा नहीं देखा था। देश के बंटवारे के दौरान भी कुछ ऐसा ही नजारा था। उस समय करोड़ों की तादाद में लहू-लुहान लोग अपना सब कुछ छोड़कर जान बचाने के लिए निकल लिए थे। इस बार भी लोग जान बचाने के लिए ही पैदल निकले थे। रास्ते में प्रवासी मजदूरों को महामारी की दहशत के अलावा पुलिस उत्पीड़न का भी शिकार होना पड़ रहा था। रास्ते में कुछ सामाजिक संस्थाओं के अलावा लोगों को सरकार की तरफ से कोई मदद नहीं मिल रही थी। सत्ता समर्थकों द्वारा प्रवासी मजदूरों को कोरोना फैलाने वाला करार दिया जा रहा था।

प्रवासी मजदूरों के साथ कई राज्यों में पुलिसिया उत्पीड़न भी हो रहा था। उत्तर प्रदेश के बरेली में उनके ऊपर सैनिटाइजर छिड़के गए। बिहार के सिवान में उन्हें एक स्कूल में कैद कर लिया गया। हरियाणा में उन्हें महामारी रोग और प्रबंधन कानून, 1897 और हरियाणा महामारी रोग कोविड-19 नियम के तहत गिरफ्तारी के लिए राज्‍य के इनडोर स्टेडियमों को जेल में तब्दील कर दिया है। देश ने ही उन्हें बेगाना करार दिया था। सत्ता प्रतिष्ठान की ओर से कहा जा रहा था की कोरोना वायरस से लड़ने के लिए सख्त उपाय जरूरी हैं। इसका सामुदायिक फैलाव रोकने के लिए सामाजिक दूरी की भी दरकार है।

इस तरह अचानक बिना मोहलत दिए और बिना आवश्यक प्रबंध किए पुरे देश को लॉकडाउन कर करोड़ों जिंदगियों को भगवान् भरोसे छोड़ दिया गया था। उल्लेखनीय है कि चीन ने सिर्फ वुहान शहर में ही लॉकडाउन किया, जबकि दक्षिण कोरिया, जापान ने कोई लॉकडाउन नहीं किया। इटली, स्पेन, ब्रिटेन और अमेरिका जैसे विकसित देशों में जरूर यह तरीका अपनाया गया। इस मामले में केंद्र सरकार ने दुनिया के अमीर और विकसित देशों की अंधी नकल की थी।

ध्यातव्य है कि 22 मार्च को जनता कर्फ्यू की घोषणा के पहले ही केरल, महाराष्ट्र, पंजाब, बंगाल, दिल्ली की सरकारें हरकत में आ गईं और कई तरह के उपाय कर रही थी। केरल की सरकार ने तो स्वास्‍थ्य क्षेत्र की बेहतरी के लिए 20,000 करोड़ रुपये का आवंटन कर दिया। ममता बनर्जी तो सड़कों पर भी उतरने लगीं। ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक भी रोज संदेश जारी करने लगे। इस दौरान केंद्र सरकार आत्ममुग्ध नजर आ रही थी।

30 जनवरी को देश में कोविड-19 से पहली मौत और 31 जनवरी को विश्व स्वास्‍थ्य संगठन के इसे वैश्विक महामारी घोषित करने के बाद केंद्र सरकार को हरकत में आने में लगभग पौने दो महीने लग गए। इस दौरान वरिष्ठ चिकित्सकों की सलाह को भी नजरंदाज किया गया। लॉकडाउन की घोषणा करने के पहले प्रधानमंत्री ने विपक्षी दलों से भी कोई सलाह-मशविरा नहीं किया।

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