डॉ. कलाम ने छिपाए थे परमाणु परीक्षण, अब पराली जलाने वाले किसान दे रहे सैटेलाइट को चकमा!

डॉ. कलाम ने छिपाए थे परमाणु परीक्षण, अब पराली जलाने वाले किसान दे रहे सैटेलाइट को चकमा!

देश के पूर्व राष्ट्रपति और महान वैज्ञानिक डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने जब साल 1998 में पोखरण में परमाणु परीक्षण किए थे, तब उन्होंने अपनी अद्भुत वैज्ञानिक सूझबूझ और रणनीतिक कौशल से अमेरिकी उपग्रहों यानी सैटेलाइट्स की पैनी नजरों को पूरी तरह से चकमा दे दिया था। उस दौर में यह वाकया दुनिया भर की खुफिया एजेंसियों के लिए एक अनसुलझा रहस्य बन गया था कि कैसे भारत ने दुनिया की सबसे ताकतवर नजरों से बचकर इस ऐतिहासिक मिशन को अंजाम दिया। समय का पहिया घूमा है और आज तकनीक आसमान की बुलंदियों पर है, अंतरिक्ष में घूम रहे हाई-रिजॉल्यूशन सैटेलाइट्स जमीन की एक-एक इंच की तस्वीर कैद करने का दावा करते हैं। लेकिन विडंबना देखिए कि आज उत्तर भारत के खेतों में धान की कटाई के बाद पराली जलाने वाले आम किसान अपनी पारंपरिक सूझबूझ और चातुर्य से इन आधुनिक अमेरिकी और भारतीय उपग्रहों को खुलेआम चकमा दे रहे हैं।

डॉ. कलाम की वह ऐतिहासिक वैज्ञानिक चालाकी जब पोखरण में गूंजा था भारत का डंका

साल 1998 का वह दौर आज भी भारतीय इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है जब देश ने पोखरण की रेगिस्तानी धरती पर परमाणु परीक्षण करके पूरी दुनिया को चौंका दिया था। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा और सीआईए के जासूसी उपग्रह चौबीसों घंटे राजस्थान के उस इलाके पर अपनी सैटेलाइट नजर गड़ाए बैठे थे ताकि भारत की हर एक गतिविधि को ट्रैक किया जा सके। लेकिन डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम और उनकी वैज्ञानिक टीम ने जो रणनीति अपनाई, उसने दुनिया के तमाम सुपरपॉवर देशों की इंटेलिजेंस को फेल कर दिया। भारतीय वैज्ञानिकों ने सैटेलाइट्स के गुजरने के तय समय और एंगल का अध्ययन करके केवल उसी सीमित वक्त में निर्माण और परीक्षण से जुड़े कार्य किए जब ऊपर से गुजर रही आंखें अंधी हो जाती थीं। इसके अलावा वैज्ञानिकों ने सेना की ड्रेस में काम करने की बजाय आम मजदूरों के कपड़े पहनकर काम किया ताकि सैटेलाइट के कैमरों को यह भ्रम रहे कि वहां केवल रेगिस्तानी विकास या सड़क निर्माण का सामान्य कार्य चल रहा है। इस तरह डॉ. कलाम ने अपनी अचूक रणनीति से स्पेस टेक्नोलॉजी को मात देकर भारत को परमाणु संपन्न राष्ट्र बना दिया था।

बदलते दौर की नई कहानी: अंतरिक्ष से झांकते सैटेलाइट्स और किसानों का नया पैंतरा

आज एक तरफ जहां अंतरिक्ष में रिमोट सेंसिंग और थर्मल इमेजिंग सैटेलाइट्स का जाल बिछा हुआ है, जो हर एक खेत के तापमान और धुएं को पकड़ने का दावा करते हैं, वहीं दूसरी तरफ मैदानी इलाकों के अन्नदाता किसान भी कम नहीं हैं। सरकारों और अंतरिक्ष अनुसंधान संगठनों ने पराली जलाने की घटनाओं पर रोक लगाने और किसानों की हरकतों को ट्रैक करने के लिए अत्याधुनिक सैटेलाइट मॉनिटरिंग सिस्टम तैनात कर दिए हैं। जैसे ही कोई किसान अपने खेत में अवशेषों को आग लगाता है, अंतरिक्ष में चक्कर लगा रहा उपग्रह तुरंत थर्मल हॉटस्पॉट डिटेक्ट करके संबंधित जिले के प्रशासनिक अधिकारियों के फोन पर घंटी बजा देता है। लेकिन किसानों ने इन अंतरिक्षीय कैमरों से बचने के लिए अब अपने तौर-तरीके पूरी तरह बदल लिए हैं, जिससे जिला प्रशासन और कृषि विभाग के अधिकारी भी हैरान परेशान हैं।

सैटेलाइट की नजरों से बचने के लिए किसान अपना रहे हैं कौन-कौन से नए और अनोखे तरीके

आधुनिक कृषि प्रधान राज्यों में जब पराली जलाने की समस्या पर प्रशासनिक शिकंजा कसा गया, तो किसानों ने अपनी पारंपरिक बुद्धिमत्ता का इस्तेमाल करते हुए अनोखे तरीके तलाश लिए। अंतरिक्ष के सैटेलाइट्स मुख्य रूप से दोपहर के वक्त या जब वे ठीक आसमान के ऊपर से गुजरते हैं, तब खेतों के तापमान में अचानक होने वाले बदलाव और आग की गर्मी को रिकॉर्ड करते हैं। किसानों ने इस बात को भांप लिया है और अब वे सुबह तड़के सूरज निकलने से पहले या फिर देर शाम ढलने के बाद अंधेरे में पराली के छोटे-छोटे ढेरों में आग लगाते हैं ताकि सैटेलाइट के थर्मल कैमरे उसे सामान्य तापमान या धुंध के रूप में समझें। इसके अलावा कुछ जगहों पर किसान अब पराली को एक साथ खुले में जलाने के बजाय खेतों के कोनों में गड्ढे खोदकर या फिर आंशिक रूप से मिट्टी में दबाकर ठिकाने लगा रहे हैं, जिससे आसमान से आने वाली इंफ्रारेड किरणें सीधे आग के संपर्क में नहीं आ पातीं।

तकनीक और परंपरा की इस लुकाछिपी का पर्यावरण और प्रशासनिक व्यवस्था पर क्या पड़ रहा असर

वैज्ञानिकों और अंतरिक्ष विशेषज्ञों के लिए यह वाकई एक बड़ा वैचारिक विषय बन चुका है कि कैसे मानव बुद्धि आज भी कई मायनों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता और उपग्रह प्रणालियों पर भारी पड़ रही है। सरकारें करोड़ों रुपये खर्च करके स्पेस एजेंसी के माध्यम से रियल-टाइम मॉनिटरिंग और मैपिंग करवा रही हैं ताकि वायु प्रदूषण को रोका जा सके और पराली जलाने की घटनाओं पर तुरंत जुर्माना लगाया जा सके। दूसरी तरफ किसान आर्थिक तंगी, मजदूरों की भारी कमी और कम समय में अगली फसल की बुवाई की मजबूरी के चलते इन तकनीकी जालों से बचने के नए रास्ते ढूंढ लेते हैं। हालांकि इस लुकाछिपी के खेल में अंततः नुकसान हमारे पर्यावरण, खेत की मिट्टी की उर्वरता और दिल्ली-एनसीआर समेत पूरे उत्तर भारत की हवा को उठाना पड़ रहा है, जहां सर्दियों के दिनों में सांस लेना तक दूभर हो जाता है।

समाधान की तलाश: क्या अंतरिक्ष के सैटेलाइट्स और किसानों के बीच की यह जंग कभी खत्म होगी

डॉ. कलाम ने जिस विज्ञान का इस्तेमाल देश की रक्षा और उसके गौरव को बढ़ाने के लिए किया था, आज उसी विज्ञान की अत्याधुनिक शाखाएं समाज के सामने खड़ी एक विकट समस्या का समाधान खोजने में जुटी हैं। सिर्फ सैटेलाइट से नजर रखने और किसानों पर भारी-भरकम जुर्माना लगाने से इस समस्या का स्थायी हल निकल पाना असंभव सा प्रतीत होता है। जब तक सरकार किसानों को धान की कटाई के लिए सुपर सीडर, हैप्पी सीडर और फसल अवशेष प्रबंधन के लिए मुफ्त या रियायत दरों पर आधुनिक मशीनें पूरी तरह उपलब्ध नहीं कराएगी, तब तक मजबूर किसान अंतरिक्ष के कैमरों को चकमा देने के नए तरीके ढूंढते रहेंगे। आवश्यकता इस बात की है कि तकनीक का इस्तेमाल डराने या चालबाजी पकड़ने के बजाय किसानों को सशक्त बनाने और उनकी आर्थिक मदद करने के लिए किया जाए ताकि देश का अन्नदाता भी सुरक्षित रहे और हमारी हवा भी साफ बनी रहे।